राजस्थान में हाल ही में हुई मातृ मृत्यु के मामलों की जांच कर रही राज्य सरकार की आठ सदस्यीय विशेषज्ञ समिति ने अपनी रिपोर्ट में कई गंभीर खामियों की ओर इशारा किया है। समिति के अनुसार, हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की पर्याप्त देखभाल नहीं की गई, इलाज से जुड़े मेडिकल रिकॉर्ड अधूरे मिले और अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था (infection control mechanisms) में भी कमियां पाई गईं।

इस बीच, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी असरहीन ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन और इन घटनाओं के बीच संभावित संबंध को लेकर जानकारी मांगी है। ऑक्सीटोसिन का इस्तेमाल प्रसव कराने और डिलीवरी के बाद बहुत ज्यादा रक्तस्राव रोकने के लिए किया जाता है। राजस्थान ड्रग टेस्टिंग लैब की जांच में ऑक्सीटोसिन के एक बैच में सक्रिय तत्व नहीं मिलने की पुष्टि हुई है।

वहीं, ऑक्सीटोसिन बनाने वाली जैक्सन लेबोरेटरीज की पंजाब और हिमाचल प्रदेश स्थित इकाइयों के लाइसेंस भी रद्द कर दिए गए हैं। जांच में दवा की गुणवत्ता संबंधी जरूरी परीक्षणों के रिकॉर्ड नहीं मिलने और डेटा में गड़बड़ी के संकेत मिले हैं। उधर, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी सीजेरियन ऑपरेशन के बाद महिलाओं की तबीयत बिगड़ने और हुई मौतों के मामलों पर राजस्थान सरकार से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।

राजस्थान में गर्भवती महिलाओं की मौतों का मामला

मई 2026 में कोटा में सीजेरियन डिलीवरी के दौरान पांच महिलाओं की मौत हो गई थी जबकि सात अन्य को इलाज के दौरान कई अतिरिक्त स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा। इसके अलावा कुछ महिलाओ को किडनी फेल होने के बाद डायलिसिस की जरूरत पड़ गई थी। इसके बाद जून में बीकानेर में छह महिलाओं की किडनी फेल होने की खबर सामने आने के बाद दो अन्य महिलाओं की मौत हो गई। जून में ही जोधपुर के पावटा में सी-सेक्शन में जाने के बाद दो अन्य महिलाओं की तबियत काफी खराब हो गई थी। राजस्थान सरकार ने इन मौतों का आपस में कोई संबंध होने से इनकार किया है।

जून के आखिर में सबमिट की गई इस रिपोर्ट में 8 सदस्यों वाले विशेष पैनल ने हाई-रिस्क प्रेगनेंसी के प्रबंधन में हुई प्रक्रियागत लापरवाहियों को जिम्मेदार ठहराया है। रिपोर्ट में कहा गया, ”लगभग सभी मामलों में मरीजों के लक्षण अलग-अलग थे। दवाओं से किसी तरह की रिएक्शन या शॉक होने की संभावना बेहद कम है। समिति का मानना है कि ऑक्सीटोसिन में सक्रिय औषधीय तत्व (एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट) की अनुपस्थिति को इन मौतों का कारण नहीं माना जा सकता।”

इंडियन एक्सप्रेस ने इस रिपोर्ट को रिव्यू किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं की मृत्यु अलग-अलग चिकित्सीय कारणों से हुई और सभी मामलों को जोड़ने वाला कोई एक साझा कारण सामने नहीं आया। हालांकि, रिपोर्ट में हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की कमजोर निगरानी, इलाज से जुड़े रिकॉर्ड का अधूरा होना, मरीज या परिजनों से उपचार के लिए आवश्यक सूचित सहमति (इनफॉर्म्ड कंसेंट) लेने में कमी और अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था की खामियों को गंभीर लापरवाही बताया गया है।

राजस्थान की प्रमुख स्वास्थ्य सचिव गायत्री राठौड़ ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा, ”इन मौतों के पीछे कई कारण जिम्मेदार रहे हैं और समिति ने अस्पतालों में इलाज संबंधी प्रोटोकॉल को और बेहतर बनाने की सिफारिश की है। कोटा के दोनों अस्पतालों में ऐसे मामले आते रहते हैं क्योंकि यहां सबसे जटिल मरीजों को रेफर किया जाता है। दुर्भाग्य से ये मौतें एक ही अवधि में अधिक संख्या में हुईं, इसलिए इसने ज्यादा ध्यान आकर्षित किया।”

रिपोर्ट में क्या-कुछ चला पता

12 महिलाओं की मौत या गंभीर रूप से बीमार होने के मामलों के क्लीनिकल रिकॉर्ड की समीक्षा पर आधारित इस रिपोर्ट में एम्स (AIIMS) की अलग से गठित छह सदस्यीय समिति की रिपोर्ट का भी विश्लेषण किया गया।

राज्य सरकार की समिति के अनुसार, एम्स की रिपोर्ट में ऑपरेशन थिएटर (OT) की संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था, नसबंदी प्रक्रियाओं, ऑपरेशन के बाद गंभीर मरीजों की निगरानी, दवाओं की सुरक्षा निगरानी (फार्माकोविजिलेंस), दवाओं के भंडारण और उनके इस्तेमाल की प्रक्रिया को लेकर कई गंभीर चिंताएं जताई गई हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इन कमियों को गंभीरता से लेते हुए अस्पतालों में तय प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। राज्य स्तरीय समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि सभी मामलों में मौत का कारण अलग-अलग था और किसी एक वजह को सभी मौतों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। रिपोर्ट के अनुसार:

रिपोर्ट के अनुसार, कोटा के जेके लोन अस्पताल में एक महिला की मौत पहले से मौजूद हृदय रोग के कारण हुई, जबकि दूसरी महिला की जान प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव (पोस्टपार्टम हेमरेज) से उत्पन्न मुश्किलों के चलते गई।

रिपोर्ट के अनुसार, कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक महिला की मौत डिसेमिनेटेड इंट्रावास्कुलर कोएगुलेशन (DIC) के कारण हुए पल्मोनरी एम्बोलिज्म से हुई। डीआईसी ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर की रक्त के थक्के (क्लॉट) बनाने की प्रक्रिया असामान्य रूप से सक्रिय हो जाती है। इस मामले में फेफड़ों की धमनी में थक्का बनने से महिला की मौत हो गई।

इसी अस्पताल में दूसरी महिला की मौत हाइपोवोलेमिक शॉक से हुई। यह ऐसी गंभीर स्थिति है, जिसमें अत्यधिक रक्तस्राव के कारण शरीर के कई अंग, विशेषकर किडनी, काम करना बंद कर देते हैं।

वहीं, तीसरी महिला की मौत कोरियोएम्नियोनाइटिस के कारण हुई। जांच में सामने आया कि समय से पहले प्रसव रोकने के लिए गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स) पर लगाए गए टांके के बाद संक्रमण फैल गया जिससे भ्रूण को घेरे रहने वाली झिल्लियों और एम्नियोटिक द्रव में संक्रमण हो गया।

रिपोर्ट में अस्पतालों में रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। इसमें मरीजों की मेडिकल हिस्ट्री, दिए गए इलाज, रक्तचाप (ब्लड प्रेशर), नाड़ी (पल्स रेट) जैसी जरूरी निगरानी संबंधी जानकारी का पर्याप्त रिकॉर्ड नहीं मिलने की बात कही गई है। समिति ने कहा कि ये कमियां केवल क्लीनिकल केस नोट्स तक सीमित नहीं थी बल्कि ऑपरेशन थिएटर के रिकॉर्ड और नर्सिंग दस्तावेजों में भी पाई गईं। रिपोर्ट में अस्पतालों में रिकॉर्ड-रखरखाव की व्यवस्था को तत्काल मजबूत करने की सिफारिश की गई है।

इस ममले से जुड़े एक शख्स ने कहा, ”रिपोर्ट में कहा गया कि रिकॉर्ड में इन जांचों का कोई उल्लेख नहीं है। इसलिए यह माना जा रहा है कि नियमित जांचें नहीं की गईं। ”

कमेटी को यह भी पता चला कि अस्पतला पहले से प्रिंटेड क्लिनिकल नोटस और ट्रीटमेंट ऑर्डर्स का इस्तेमाल कर रहे थे। कमेटी ने कहा, ‘इस तरह काम करने का तरीका मरीज की व्यक्तिगत जरूरतों के अनुरूप इलाज (इंडिविजुअलाइज्ड पेशेंट केयर) के स्वीकृत मानकों के अनुरूप नहीं है।’ ”

रिपोर्ट में मरीज या उनके परिवार वालों से सूचित सहमति (informed consent) लेने की प्रक्रिया में भी गंभीर कमियां पाई गईं। समिति ने कहा, ”सहमति लेने की प्रक्रिया को और मजबूत करने की जरूरत है ताकि हर प्रक्रिया से जुड़े जोखिम, लाभ, उपलब्ध विकल्प और संभावित जटिलताओं के बारे में मरीज या परिजनों को स्पष्ट रूप से बताया जाए और इसे ठीक तरह से डॉक्युमेंटेड किया जाए।”

समिति ने यह भी पाया कि ये कमियां इन अस्पतालों में सामान्य कार्यप्रणाली का हिस्सा बन चुकी थीं। रिपोर्ट में कहा गया, ”प्रसूति संबंधी आपातकालीन देखभाल, ऑपरेशन के बाद मरीजों की निगरानी और हाई-रिस्क गर्भावस्थाओं के प्रबंधन से जुड़े कुछ प्रोटोकॉल की समीक्षा और उनमें सुधार किए जाने की जरूरत है।”

रिपोर्ट में कौन-कौन सी कमियां बताई गईं

एम्स की विशेषज्ञ समिति में एक माइक्रोबायोलॉजी विशेषज्ञ भी शामिल थे। इस रिपोर्ट के आधार पर राज्य स्तरीय समिति ने कहा कि अस्पताल में फैले संक्रमण को इन मौतों का कारण साबित करने वाला कोई ठोस सबूत नहीं मिला। हालांकि, अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत बताई गई। एम्स समिति ने भी संक्रमण नियंत्रण तंत्र में कई कमियों की ओर ध्यान दिलाया था।

राज्य समिति ने यह भी पाया कि अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता, स्टॉक और उपयोग की निगरानी के लिए प्रभावी व्यवस्था नहीं थी। रिपोर्ट में दवाओं और अन्य चिकित्सा सामग्री की खरीद, भंडारण, रखरखाव, वितरण और निगरानी के लिए स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) लागू करने की सिफारिश की गई है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि उपलब्ध क्लीनिकल रिकॉर्ड में किसी भी मरीज को जरूरत के अनुसार अतिरिक्त ऑक्सीटोसिक या यूटेरोटोनिक दवाएं दिए जाने का कोई उल्लेख नहीं मिला।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि रक्त और रक्त उत्पादों (ब्लड प्रोडक्ट्स) के सुरक्षित स्टोरेज और चढ़ाने (इन्फ्यूजन) के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल का भी अभाव है।

राजस्थान सरकार की जांच समिति के अध्यक्ष और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) राजस्थान के सहायक मिशन निदेशक डॉ. टी. शुभमंगला से इस मामले पर प्रतिक्रिया के लिए संपर्क किया गया लेकिन उन्होंने फोन कॉल का जवाब नहीं दिया।

फेडरेशन ऑफ ऑब्स्टेट्रिक एंड गायनेकोलॉजिकल सोसाइटीज ऑफ इंडिया (FOGSI) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. ऋषिकेश पई ने कहा, ”जब तक डेथ रिव्यू कमेटी यह निर्णायक रूप से साबित नहीं कर देती कि इन मौतों का कारण खराब गुणवत्ता वाला ऑक्सीटोसिन था तब तक यही माना जाएगा कि ये हाई-रिस्क प्रेगनेंसी से जुड़ी जटिलताओं के कारण हुईं। ऐसे बड़े अस्पतालों में, जहां सबसे जटिल मरीजों को रेफर किया जाता है, इस तरह के आंकड़े असामान्य नहीं माने जाते।”

उन्होंने कहा कि यह पता लगाने का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना यह होगा कि क्या मातृ मृत्यु दर (Maternal Mortality Rate) में अचानक बढ़ोतरी हुई है। आंकड़ों के अनुसार, कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में वर्ष 2025 में 14 मातृ मौतें दर्ज हुई थीं जबकि इस साल अब तक तीन मौतें हुई हैं। वहीं जेके लोन अस्पताल,कोटा में वर्ष 2025 में 25 मांओं की मौतें हुई थीं और इस साल अब तक चार महिलाओं की मौत दर्ज की गई है।

राजस्थान में मातृ मृत्यु दर पर केंद्र सख्त

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने राजस्थान सरकार से राज्य के कई सरकारी अस्पतालों में सीजेरियन ऑपरेशन के बाद महिलाओं में विकसित होने वाली जटिलताओं पर एक विस्तृत रिपोर्ट मांगी है, जिनमें से कुछ मामलों में मौतें भी हुई हैं।