पश्चिम बंगाल के एक जाने-माने परिवार ने कोलकाता के कालीघाट काली मंदिर के कीमती सामान वाले तिजोरी की चाबी के कथित तौर पर गायब होने पर सवाल उठाए हैं। यह मामला मंदिर कमिटी के पदेन चेयरमैन द्वारा साउथ 24 परगना के डिस्ट्रिक्ट जज को FIR दर्ज करने के लिए पत्र लिखने के महीनों बाद सामने आया है।

सवर्ण रॉयचौधरी परिवार पहले जमींदार था, जिन्होंने मंदिर को जमीन दान की थी। उन्होंने भी मंदिर की प्रॉपर्टी, दान और ज्वेलरी के मैनेजमेंट और मंदिर मैनेजमेंट कमिटी के गठन से जुड़े कथित मुद्दों पर चिंता जताई है। द इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए परिवार के एक सदस्य देबार्शी रॉयचौधरी ने आरोप लगाया कि मंदिर से जुड़े स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के लॉकर की चाबी 1980 से गायब है। उन्होंने कहा, “अगर मंदिर का कीमती सामान, ज्वेलरी या दूसरी चीज़ें लॉकर में रखी थीं, तो उनका क्या हुआ? परिवार ने यह भी पूछा है कि क्या गायब चाबी के बारे में कोई जांच की गई थी।”

अलीपुर जिला जज को लिखा पत्र

देबार्शी रॉय चौधरी ने चिंताओं को उठाते हुए एक पत्र 16 मार्च को अलीपुर जिला जज को दिया गया था। उन्होंने कहा कि परिवार ने मंदिर की मैनेजिंग कमिटी के एक्स-ऑफिशियो चेयरमैन के तौर पर जज से संपर्क किया।

हालांकि कालीघाट काली मंदिर कमिटी के अध्यक्ष अशोक कुमार बंद्योपाध्याय ने कहा कि वह व्यस्त हैं और इस मामले पर कमेंट नहीं करना चाहते। जबकि कोषाध्यक्ष कल्याण हलदर ने कहा, “चूंकि शिकायत की गई है, इसलिए मैं इस पर कमेंट नहीं करना चाहता, लेकिन इस परिवार की आदत है कि वह अचानक इन मुद्दों को उठा देता है।”

सबसे पुराने धार्मिक स्थलों में से एक है कालीघाट मंदिर

कालीघाट काली मंदिर कोलकाता के सबसे पुराने धार्मिक स्थलों में से एक है। माना जाता है कि यह 200 साल से भी ज़्यादा पुराना है, और इसे 51 शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। यह ऐसा तीर्थ स्थल है, जहां माना जाता है कि देवी सती के शरीर के अंग धरती पर गिरे थे। सरकारी और ऐतिहासिक सोर्स के अनुसार मौजूदा मंदिर का स्ट्रक्चर 1809 में सबर्णा रॉयचौधरी परिवार की देखरेख में पूरा हुआ था।

काली के भक्त संतोष रॉय चौधरी ने 1798 में इसे बनवाना शुरू किया था। परिवार का यह भी दावा है कि कालीघाट में अभी जो मूर्ति पूजी जाती है, वह उनकी कुलदेवी देवी भुवनेश्वरी के मॉडल पर बनी है। देबार्शी ने पूछा, “हमारे परिवार ने काली मंदिर को 595 बीघा जमीन दान की थी, लेकिन अभी सिर्फ़ 19 कोठा ही बचे हैं। बाकी ज़मीन कहां गई? प्रॉपर्टी कैसे ट्रांसफर या बदली गई?”

देबार्शी ने रोज मिलने वाले दान और ज्वेलरी के हिसाब-किताब पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “हर दिन, भक्त मंदिर में पैसे और ज्वेलरी दान करते हैं। इस बात पर साफ-साफ जानकारी होनी चाहिए कि इन दान का पूरा रिकॉर्ड कहां रखा जाता है, कितना इकट्ठा किया जाता है, अकाउंट कैसे संभालकर रखे जाते हैं, और क्या रेगुलर ऑडिट किए जाते हैं।”

मांगा गया हिसाब

देबार्शी ने आरोप लगाया कि ये अकाउंट न तो सरकार के पास हैं और न ही कोर्ट के पास। उन्होंने आगे कहा, “हर दिन कितनी ज्वेलरी और कितने पैसे दान किए जा रहे हैं? अकाउंट्स कहां हैं? ऑडिट्स कहां हैं? ये अकाउंट्स न तो सरकार के पास हैं, न ही सुप्रीम कोर्ट के पास। लोग देवी को दान कर रहे हैं, किसी एक व्यक्ति को नहीं। तो पैसे का कोई रिकॉर्ड क्यों नहीं होना चाहिए?”

मंदिर कमेटी के काम करने के तरीके पर भी सवाल उठाए गए हैं। परिवार के मुताबिक मंदिर कमेटी का आखिरी चुनाव 2014 में हुआ था। देबार्शी ने पूछा, “अगर चुनाव नहीं हुए हैं, तो मंदिर बिना कमेटी के कैसे चल रहा है? जो लोग कमेटी में होने का दावा कर रहे हैं, वे बिना चुनाव के वहां कैसे हैं?” उन्होंने आगे आरोप लगाया कि मंदिर में आने वालों से बहुत ज़्यादा पैसे लिए जा रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि देश के अलग-अलग हिस्सों से कालीघाट मंदिर आए कई लोगों ने परिवार से पैसे की तंगी की शिकायत की थी। उनके मुताबिक कुछ भक्तों से कथित तौर पर 4,000 से 5,000 रुपये, दूसरों से 6,000 रुपये और कुछ मामलों में 10,000 रुपये तक मांगे गए थे।

परिवार ने यह भी प्रस्ताव दिया था कि कालीघाट मंदिर का इतिहास मंदिर परिसर में बंगाली, हिंदी और अंग्रेजी में साफ-साफ दिखाया जाए। हालांकि, कहा जाता है कि इस सुझाव को नजरअंदाज कर दिया गया।

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पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने शनिवार को कहा कि उनकी सरकार परिसर में हुई झड़पों के बाद जादवपुर यूनिवर्सिटी और उसके बाहर राष्ट्रवाद को बहाल करेगी। साथ ही उन्होंने जोर देकर कहा कि राज्य में रहने वाले हर व्यक्ति को वंदे मातरम गाना होगा। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।