ममता बनर्जी जिन्हें लोग दीदी के नाम से जानते और पुकारते हैं। उनका जन्म 5 जनवरी 1955 को हुआ था। ममता बनर्जी ने अपने दम पर सफलता हासिल की है। मात्र 9 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने शरणार्थी पिता को खो दिया था। एक युवा कांग्रेसी के रूप में शुरुआत करते हुए, उन्होंने राजनीति में तेजी से प्रगति की। उनका मिलनसार व्यक्तित्व लोगों को आकर्षित करता है और उनकी जनकेंद्रित राजनीति उन्हें एक सच्ची जननेता बनाती है। उनकी जरूरतें भी सादी हैं।

साधारण सूती साड़ी, बिखरे बालों का जूड़ा और सिंपल चप्पल पहने यह दुबली-पतली नेता कई शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वियों को परास्त कर चुकी हैं। अथक परिश्रम करने वाली 71 वर्षीय यह जुझारू महिला पश्चिम बंगाल की ममतामयी “दीदी” हैं। जिन्होंने कन्याश्री प्रकल्प, लक्ष्मी भंडार और स्वास्थ्य साथी जैसी महिला-केंद्रित योजनाओं को आगे बढ़ाया है।

पार्टी के भीतर, बूथ स्तर से लेकर निर्वाचित पदों तक महिला नेताओं की एक मजबूत श्रृंखला है। महिलाएं टीएमसी के प्रमुख आंदोलनों में भी अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। चाहे वह सिंगूर हो या नंदीग्राम उन्होंने हर जगह अपनी पार्टी का झंडा ऊंचा किया।

वर्तमान में ममता बनर्जी देश में अपनी पार्टी और सरकार पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाली एकमात्र महिला नेता हैं। वह सत्ता में अपने चौथे कार्यकाल की तलाश में हैं, लेकिन सबसे बड़ी बात है कि उनके आसपास महिला नेताओं का एक प्रमुख समूह है। कोलकाता की गलियों से लेकर दिल्ली के सत्ता गलियारों तक। आइए आज ममता बनर्जी की सेना में शामिल 10 महिला ब्रिगेड को जानने की कोशिश करते हैं।

चंद्रिमा भट्टाचार्य (Chandrima Bhattacharya)

टीएमसी की प्रवक्ता और पार्टी महिला विंग की प्रदेश अध्यक्ष चंद्रिमा भट्टाचार्य मुख्यमंत्री की महिला ब्रिगेड की सबसे वरिष्ठ सदस्यों में से एक हैं वह 70 साल की हैं। ममता सरकार में राज्य मंत्री के रूप में भट्टाचार्य वित्त (स्वतंत्र प्रभार), स्वास्थ्य, परिवार कल्याण, भूमि सुधार और शरणार्थी एवं पुनर्वास जैसे विविध विभागों का प्रभार संभालती हैं।

ममता बनर्जी के शुरुआती समर्थकों में भट्टाचार्य शामिल नहीं थे। जब ममता बनर्जी ने टीएमसी का गठन किया, तब वे कांग्रेस में ही रहे। 2009 में सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के दौरान ही ममता बनर्जी को बंगाल में सीपीआई (एम) को सत्ता से बेदखल करने की ताकत मिली, तभी भट्टाचार्य ममता के करीब आईं और अंततः टीएमसी में शामिल हो गईं।

एक प्रशिक्षित वकील, भट्टाचार्य ने 2011 में दमदम उत्तर से विधायक के रूप में चुनाव लड़ने और जीतने के बाद तक कोलकाता उच्च न्यायालय में एक वकील के रूप में वकालत की।

2016 में भट्टाचार्य इस सीट से CPI(M) के तन्मय भट्टाचार्य से हार गईं। लेकिन, ममता बनर्जी के उन पर भरोसे के प्रतीक के रूप में उन्होंने 2017 के उपचुनाव में भट्टाचार्य को दक्षिण कांथी से मैदान में उतारा। जब वह जीतीं, तो ममता ने उन्हें राज्य मंत्री के रूप में पुनः नियुक्त किया।

शशि पंजा (Shashi Panja)

शशि पंजा पेशे से डॉक्टर हैं। पांजा पूर्व केंद्रीय मंत्री अजीत पांजा की बहू हैं। जिन्होंने कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी के साथ मिलकर टीएमसी की स्थापना की थी। वह 63 साल की हैं।

जब टीएमसी ने 2011 में पहली बार सरकार बनाई, तो ममता ने श्यामपुकुर के विधायक को किसी मंत्रालय के लिए नहीं चुना। लेकिन, 2013 में पांजा को महिला एवं बाल विकास विभाग का राज्य मंत्री बनाया गया। यह निर्णय महत्वपूर्ण साबित हुआ, क्योंकि पांजा ने ममता की पसंदीदा ‘कन्याश्री’ योजना को आगे बढ़ाया।

निवर्तमान सरकार में वह उद्योग, वाणिज्य और उद्यम मंत्री होने के साथ-साथ महिला एवं बाल विकास और सामाजिक कल्याण विभाग की प्रभारी भी थीं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि ममता पांजा की अंग्रेजी और बंगाली दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ की सराहना करती हैं। जिससे वह टीएमसी की शीर्ष प्रवक्ताओं में से एक बन गई हैं। पंजा श्यामपुकुर से दोबारा चुनाव लड़ रही हैं।

काकोली घोष दस्तीदार (Kakoli Ghosh Dastidar)

बारासात से सांसद दस्तीदार भी एक राजनीतिक परिवार से आती हैं और पांजा की तरह पेशे से डॉक्टर हैं। उनके नाना पश्चिम बंगाल के पोस्टमास्टर जनरल थे। उनके चाचा अरुण मोइत्रा एक समय राज्य कांग्रेस के प्रमुख थे, जबकि उनके मामा गुरुदास दासगुप्ता सांसद और सीपीआई के जाने-माने चेहरे थे। दस्तीदार की उम्र 66 साल है।

ममता के सबसे पुराने विश्वासपात्रों में से एक दस्तीदार, युवा कांग्रेस में रहते हुए वामपंथी सरकार के साथ उनके हिंसक टकरावों के दौरान चिकित्सा सहायता के साथ सबसे पहले उनके साथ हुआ करती थी। 1998 में टीएमसी बनाने के लिए उनके साथ चली गईं।

चार बार सांसद रह चुकीं दस्तीदार कई विवादों का सामना कर चुकी हैं। उनका नाम नारदा मामले में सामने आया था। वहीं पार्क स्ट्रीट यौन उत्पीड़न के बारे में उनकी यह टिप्पणी कि इसमें “बलात्कार शामिल नहीं था” बल्कि “एक महिला और उसके मुवक्किल के बीच गलतफहमी थी” उसने बवाल खड़ा कर दिया था।

डोला सेन (Dola Sen)

59 साल की डोला सेन कभी ममता बनर्जी के प्रमुख पर्दे के सहयोगियों में से एक रहीं राज्यसभा सांसद अब मुख्यमंत्री के साथ एक सार्वजनिक चेहरा बन गई हैं।

सेन पहली बार कनोरिया जूट मिल में एक ट्रेड यूनियन नेता के रूप में चर्चा में आईं। जिनकी नक्सलवादी विचारधारा से सहानुभूति थी। इसी जुड़ाव ने उन्हें सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के दौरान ममता बनर्जी के करीब लाया और उन्होंने मेधा पाटकर और वामपंथी बुद्धिजीवियों जैसी राष्ट्रीय हस्तियों को अपने साथ जोड़कर टीएमसी प्रमुख को प्रभावित किया। बाद में जब अन्य सहयोगी अलग हो गए तो सेन टीएमसी में शामिल हो गईं। अब वह इसकी बंगाल इकाई की प्रमुख हैं।

2021 के विधानसभा चुनावों में जब ममता बनर्जी का नंदीग्राम से अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी सुवेंदु अधिकारी के साथ प्रतिष्ठा की लड़ाई थी, तब उन्होंने अपने चुनाव प्रचार की देखरेख के लिए सेन को नियुक्त किया था। ममता हार गईं, लेकिन सेन के प्रयासों की सराहना की गई।

सेन ने 2014 का लोकसभा चुनाव आसनसोल से लड़ा और हार गईं, लेकिन इसके तुरंत बाद टीएमसी ने उन्हें राज्यसभा में भेज दिया और वे उच्च सदन में पार्टी की महत्वपूर्ण आवाजों में से एक बनी हुई हैं।

बीरबाहा हंसदा (Birbaha Hansda)

43 साल की बीरबाहा हंसदा संथाली फिल्म उद्योग में एक जाना-पहचाना चेहरा हैं। हंसदा एक राजनीतिक परिवार से आती हैं। उनके माता-पिता दोनों पूर्व विधायक हैं।

नगर निगम, विधानसभा और लोकसभा चुनावों में तीन बार हारने के बाद वह पहली बार 2021 में विधानसभा के लिए चुनी गईं, लेकिन जीत हासिल करते ही ममता बनर्जी ने उन्हें वन राज्य मंत्री के रूप में नियुक्त कर दिया।

हंसदा का फिल्मी करियर काफी सफल रहा है। जिसमें सुपरहिट फिल्म ‘बरदू’ सहित 19 ज्ञात फिल्में और ‘ऑल इंडिया संथाली फिल्म एसोसिएशन’ से सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के सात पुरस्कार शामिल हैं। हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के इस दावे के विरोध में टीएमसी के प्रदर्शनों में हंसदा सबसे आगे थीं कि उत्तर बंगाल की यात्रा के दौरान ममता सरकार ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया था। हांसदा बिनपुर सीट से चुनाव लड़ रही हैं।

लता बनर्जी (Lata Banerjee)

टीएमसी के दूसरे प्रमुख नेता अभिषेक बनर्जी की मां लता बनर्जी, ममता की भरोसेमंद भाभी हैं (ममता के भाई अमित की पत्नी)। लता की 60 साल की है। टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि जब ममता अपनी मां के साथ घर पर रहती थीं, तब भी लता उनके साथ रहती थीं।

तब से लेकर अब तक ममता के राजनीतिक जीवन के हर चरण में लता लगातार मौजूद रही हैं। चाहे वो रेल मंत्री का कार्यकाल हो या मुख्यमंत्री का। हाल ही में लता, ममता के साथ उनकी विदेश यात्रा पर भी गईं।

बंगाल में स्कूल नौकरियों से जुड़े घोटाले की जांच के दौरान, प्रवर्तन निदेशालय ने लता और उनके पति अमित समेत अन्य लोगों को पूछताछ के लिए तलब किया। यह दंपति ‘लीप्स एंड बाउंड्स’ कंपनी में निदेशक हैं, जो प्रवर्तन निदेशालय की जांच के दायरे में है।

कृष्णा चक्रवर्ती (Krishna Chakraborty)

61 साल की कृष्णा चक्रवर्ती और ममता का रिश्ता चार दशक पुराना है, जो 1984 से शुरू होता है, जब तत्कालीन युवा कांग्रेस नेता ने उन्हें न्यू अलीपुर कॉलेज से चुना था।

उसी वर्ष, जब कांग्रेस ने ममता बनर्जी को जादवपुर से पहली बार लोकसभा उम्मीदवार के रूप में खड़ा किया, तो उनके सामने सीपीआई (एम) के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी थे। चक्रवर्ती हर चुनावी सभा में उनके साथ मौजूद थीं। जब ममता ने चुनाव जीता और दिल्ली आ गईं, तो चक्रवर्ती भी उनके साथ आ गईं और अगले पांच वर्षों तक उनके साथ रहीं।

चक्रवर्ती की शादी के समय ममता मौजूद थीं। और जब चक्रवर्ती गर्भवती थीं, तब वह ममता के साथ रहीं। चक्रवर्ती अक्सर अपने रिश्ते को मां-बेटी के रिश्ते के रूप में बताती हैं।

1998 में जब ममता ने टीएमसी की स्थापना की थी, तब चक्रवर्ती के पास कोई आधिकारिक पद नहीं था। अब वह टीएमसी की महिला शाखा की उपाध्यक्ष, बिधाननगर नगर निगम की अध्यक्ष हैं और किसी भी राजनीतिक रैली में ममता के ठीक बगल में मौजूद रहती हैं। चक्रवर्ती के पति समीर हुगली जिले के पांडुआ से टीएमसी के उम्मीदवार हैं।

महुआ मोइत्रा (Mahua Moitra)

51 साल की महुआ मोइत्रा राजनीति में ममता से बिलकुल अलग हैं। वो ममता की दिल्ली में आवाज हैं और अपनी क्षमता से कहीं ज़्यादा प्रभाव रखती हैं। विदेश में काम कर चुकीं इन्वेस्टमेंट बैंकर मोइत्रा को राहुल गांधी कांग्रेस में लेकर आए थे, लेकिन वह जल्द ही टीएमसी में शामिल हो गईं। 2016 में वह नदिया के करीमपुर से विधायक बनीं और चुनाव जीतीं। हालांकि, ममता बनर्जी ने महसूस किया कि उनकी योग्यताएं दिल्ली के लिए उपयुक्त हैं और इसलिए उन्हें 2019 में कृष्णानगर लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया गया और उन्होंने जीत हासिल की।

इसके कुछ ही समय बाद, मोइत्रा ने संसद में “फासीवाद के सात प्रारंभिक लक्षण” विषय पर अपना भाषण दिया। जिसमें लगातार हो रही आलोचनाओं के बावजूद वे अपने रुख पर अडिग रहीं। तब से वे भाजपा के वर्चस्व वाले सदन में विपक्ष की प्रमुख आवाजों में से एक बनी हुई हैं। मोइत्रा ने नागरिकता संशोधन अधिनियम जैसे मुद्दों पर सरकार को सर्वोच्च न्यायालय में भी चुनौती दी है।

8 दिसंबर 2023 को मोइत्रा को कथित ‘पूछताछ के बदले पैसे’ के मामले में संसद से निष्कासित कर दिया गया था। लेकिन 2024 में टीएमसी ने उन्हें कृष्णानगर से फिर से मैदान में उतारा और वह सांसद के रूप में वापस लौटीं।

मोइत्रा की सबसे बड़ी कमजोरी विवादों को आमंत्रित करने की उनकी प्रवृत्ति रही है। जिसमें एक ऐसा दौर भी शामिल है जब ममता ने पार्टी के सदस्यों के साथ उनके कथित दुर्व्यवहार को लेकर उन्हें नजरअंदाज कर दिया था और टीएमसी के साथी नेता कल्याण बनर्जी के साथ उनका सार्वजनिक विवाद भी शामिल है। हालांकि, मोइत्रा आज भी मजबूती से खड़ी हैं।

सागरिका घोष (Sagarika Ghose) और मेनका गुरुस्वामी (Menaka Guruswamy)

राज्यसभा के ये दोनों सांसद दिल्ली में टीएमसी के उभरते चेहरे हैं। जिन्हें ममता बनर्जी ने उनकी योग्यताओं के आधार पर चुना है। घोष पूर्व पत्रकार और मीडिया जगत की जानी-मानी हस्ती हैं। घोष की उम्र 61 साल है।

वहीं, गुरुस्वामी सुप्रीम कोर्ट के एक प्रतिष्ठित वकील हैं, जिनका नागरिक अधिकारों की रक्षा करने का लंबा इतिहास रहा है। गुरुस्वामी की उम्र 51 साल है। घोष और गुरुस्वामी भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के साथ टीएमसी की हालिया बैठक का हिस्सा थीं, जो दोनों पक्षों के बीच जुबानी जंग में बदल गई।

जहां घोष ने राजनीति में कदम रखते हुए 2024 में राज्यसभा में प्रवेश किया। वहीं गुरुस्वामी ने इसी सप्ताह शपथ ली। संयोगवश, जब घोष पत्रकार थीं, तब एक चर्चा के दौरान लाइव टीवी पर ममता के साथ उनकी तीखी बहस हुई थी। जिसके बाद मुख्यमंत्री शो छोड़कर चली गई थीं।

आसनसोल में ‘फंस’ गए बीजेपी प्रत्याशी कृष्णेंदु मुखर्जी, टीएमसी से ज्यादा चटर्जी और मुखोपाध्याय ने बढ़ाई मुश्किलें

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बीच आसनसोल उत्तर विधानसभा क्षेत्र से एक बेहद दिलचस्प मामला सामने आया है। यहां चुनावी मुकाबले में एक नहीं, बल्कि तीन उम्मीदवार ऐसे हैं जिनका नाम ‘कृष्णेंदु’ है। इस सीट पर कुल 13 उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन एक जैसे नामों की मौजूदगी ने चुनाव को खासा चर्चित बना दिया है और मतदाताओं के बीच संभावित भ्रम को लेकर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। पढ़ें पूरी खबर।