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ऐसे हुई थी सर्ज‍िकल स्‍ट्राइक की तैयारी, 10 महीने ट्रेनिंग, ढाई महीने सर्वे-निगरानी

उरी हमले के तुरंत बाद हो रही बैठकों में से एक में प्रधान मंत्री ने कहा था कि दुश्मनों को स्पष्ट संदेश भेजने के लिए एक जवाबी कार्रवाई तत्काल होनी चाहिए।

Author Updated: September 21, 2017 6:07 PM
कमांडो ने कंधे पर रखकर 84 एमएम कार्ल गुस्ताव रॉकेट लॉन्चर और ऑटोमेटिक ग्रेनेड लॉन्चर से हमला किया था। (फोटो-रायटर्स)

पाक अधिकृत कश्मीर में भारतीय जवानों द्वारा किए गए सर्जिकल स्ट्राइक के एक साल पूरे होनेवाले हैं लेकिन अभी तक इसकी पुख्ता जानकारी सामने नहीं आ पाई कि सेना ने कैसे इसकी तैयारी की थी। वैसे माना जा रहा है कि इसकी तैयारी लंबे समय से चल रही थी लेकिन जब पाकिस्तानी आतंकियों ने पिछले साल 18 सितंबर को कश्मीर के उरी सेक्टर में भारतीय सेना के कैम्प पर कायराना हमला किया तो उसके आठ दिनों बाद ही भारतीय सेना ने बड़ी सूझबूझ और युद्ध कौशल से रात के अंधेरे में दुश्मनों के ठिकानों पर लक्षित हमला कर दिया। इस हमले में ना सिर्फ लश्कर के आतंकी मारे गए बल्कि कुछ पाकिस्तानी सैनिक भी मारे गए।

पत्रकार नितिन ए गोखले की किताब ‘सिक्योरिंग इंडिया द मोदी वे: पठानकोट, सर्जिकल स्ट्राइक्स एंड मोर’ के अंश के हवाले से रेडिफ डॉट कॉम के मुताबिक उरी हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और तत्कालीन आर्मी चीफ मेजर दलबीर सिंह सुहाग के बीच लंबी मंत्रणा हुई थी कि दुश्मनों पर हमले कुछ अलग तरह से किए जाने चाहिए। हमले के बाद जब आर्मी चीफ उरी पहुंचे तो उन्होंने पीएम मोदी के मन में चल रही योजनाओं से सेना के नॉर्दर्न कमांड के चीफ लेफिटनेंट जनरल डी एस हुडा को संक्षेप में बताया था। किताब के मुताबिक उरी हमले के बाद से परेशान और चिंतित चल रहे हुडा को तब समझ में आ गया था कि अब समय आ चुका है, जब पिछले पंद्रह महीने से चल रही विशेष सैन्य ट्रेनिंग की परीक्षा ले ली जाय।

उस बैठक में आर्मी चीफ ने नॉर्दर्न कमांड के सीनियर मिलिट्री अफसरों से म्यांमार में हुई क्रॉस बॉर्डर रेड के बारे में भी विस्तार से बताया था, जब 18 भारतीय सैनिकों ने म्यांमार की सीमा में दाखिल होकर नॉर्थ-ईस्ट के आतंकियों पर स्ट्राइक किया था। यानी उसी बैठक में ही इस बात के इशारे दे दिए गए थे कि हम पाकिस्तानी आतंकियों से निपटने के लिए भी क्रॉस बॉर्डर ऐक्शन ले सकते हैं। जनरल दलबीर सिंह ने नॉर्दर्न कमांड से तब कहा था कि हो सकता है कि पीएम म्यांमार जैसी स्ट्राइक जम्मू-कश्मीर में भी करने को कह सकते हैं। हालांकि, भारतीय सेना ने 2015 की सर्दियों में ही इस तरह की योजना के लिए जवानों को ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी थी। दो महीने तक कश्मीर घाटी में सर्दी के दिनों में दो बटालियन को इस तरह के ऑपरेशन से निपटने की ट्रेनिंग दी गई थी। इस ट्रेनिंग ने जवानों को एलओसी पार जाकर लक्षित हमले करने में ना केवल सक्षम बनाया बल्कि उन्हें आधुनिक युद्ध कौशल से भी परिपूर्ण किया।

इस दौरान सेना के अधिकारियों और स्पेशल ट्रेनिंग ले रहे जवानों ने विज्ञान और तकनीकि का भी सहारा लिया। किताब में सैन्य ऑपरेशंस महानिदेशालय के अधिकारी के हवाले से लिखा गया है कि विशेष ट्रेनिंग के दौरान जवानों और अधिकारियों ने दो से ढाई महीने तक सर्वेक्षण का लक्ष्य पूरा किया। इससे पहाड़ों की निगरानी के अलावा घुसपैठ की निगरानी और उसका मुंहतोड़ जवाब देने की तैयारी करने में उन्हें मदद मिली। साल 2016 की गर्मियों में इस तरह की विशेष ट्रेनिंग लेने के लिए दो और बटालियन को तैयार किया गया था। किताब में आर्मी चीफ दलबीर सिंह को कोट करते हुए लिखा गया है कि उरी हमले के तुरंत बाद हो रही बैठकों में से एक में प्रधान मंत्री ने कहा था कि दुश्मनों को स्पष्ट संदेश भेजने के लिए एक जवाबी कार्रवाई तत्काल होनी चाहिए।

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