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Emergency: इंदिरा के मंत्री से बोले थे संजय गांधी- रेडियो पर चलाने से पहले मुझे दिखाओ खबरें, जानिए आपातकाल की पूरी कहानी

आखिर ऐसा क्या हुआ था कि देश में आपातकाल जैसा कड़ा फैसला लेना पड़ा था? क्या राजनारायण आपातकाल के पीछे थे एक बड़ी वजह।

Author नई दिल्ली | June 25, 2019 6:45 PM
25-26 जून, 1975 की मध्‍यरात्रि देश में आपातकाल की घोषणा हुई थी। फोटो: जनसत्ता

इंदिरा गांधी की सरकार ने 25-26 जून, 1975 की मध्‍यरात्रि देश में आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा की थी। इस दौरान बड़ी संख्‍या में नेताओं और आम जनता को जेल में डाल दिया गया था। अखबारों की बिजली काट दी गई थी। रेडियो पर प्रसारित होने वाले समाचार भी सेंसर कर दिए गए थे। खुद इंदिरा गांधी की सत्‍ता पर पकड़ कमजोर हो गई थी और पर्दे के पीछे से उनके बेटे संजय गांधी मनमाने तरीके से फैसले लागू करवा रहे थे। आपातकाल लागू होने के पीछे की कहानी संक्षेप में समझते हैं।

25 जून, 1975: रात 12 बजे आपात काल (इंटर्नल इमरजेंसी) लग गया था। इसके बाद तड़के तीन बजे तक इंदिरा गांधी सोई नहीं थीं। उनके साथ पूर्व नौकरशाह और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे भी थे। रे पर इंदिरा आंख मूंद कर भरोसा करती थीं। कहा जाता है कि आपातकाल लागू करना उनके ही दिमाग की उपज था। इंदिरा को इसका आइडिया उन्‍होंने ही दिया था। फैसला हो जाने के बाद तड़के तीन बजे तक दोनों इस बात पर मंथन कर रहे थे कि राष्‍ट्र के नाम संदेश में कैसे जनता को सरल तरीके से बताया जा सके कि आपातकाल लग गया है, ताकि लोगों मेें खौफ नहीं फैल जाए।

संजय का असर: बैठक खत्‍म कर जब रे जा रहे थे, तब गैलरी में उन्‍हें तत्कालीन गृह राज्य मंत्री ओम मेहता मिल गए। उन्‍होंने बताया कि अखबार के दफ्तरों की बिजली काट दी गई है और हाई कोर्ट में भी ताले लगवाए जा रहे हैं। यह सुनने के बाद सिद्धार्थ शंकर रे चौंक गए। वह बैरंग लौटे। इंदिरा से इस बात की तस्‍दीक करने। पर इंदिरा नहीं मिलीं। 20 मिनट इंतजार किया तो उनके बेटे संजय गांधी आए। रे ने संजय से ओम मेहता के बारे में दी गई जानकारी के बारे में पूछा। संजय भड़क गए। उन्‍होंने कहा- आप लोग सरकार चलाना नहीं जानते। इतने में इंदिरा गांधी भी वहां आ गईं। रे ने सवाल दोहराया। इंदिरा ने उन्‍हें आश्‍वासन दिया कि ऐसा कुछ नहीं होगा। लेकिन, अगले दिन इक्का-दुक्का अखबार ही निकले। यह इस बात का संकेत था कि फैसले प्रधानमंत्री इंदिरा की जगह कोई और ले रहा था। वह ‘और’ शायद संजय गांधी थे।

कैबिनेट की बैठक में सब रह गए सन्‍न: 26 जून को सुबह-सुबह प्रधानमंत्री नेे कैबिनेट की इमरजेंसी बैठक हुई। बैठक में 15 मंत्री शामिल थे। इंदिरा ने जानकारी दी कि आपातकाल लागू कर दिया गया है और जनता दल के जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई सहित कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है। सारे मंत्री सन्‍न रह गए। किसी ने कुछ नहीं कहा। कैबिनेट ने प्रस्‍ताव स्‍वीकार कर लिया। सुबह आठ बजे पर समाचार प्रसारण का वक्‍त था। उसी समय इंदिरा गांधी रेडियो पर आईं। उन्‍होंने हिंदी में कहा- भाइयों और बहनों! राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है। हिंंदी के बाद अंग्रेजी में भी उन्‍होंने देश को यह जानकारी दी।

गुजराल की संजय से मुलाकात: 26 जून की सुबह जब कैबिनट मीटिंग चल रही थी तो बगल के कमरे में संजय गांधी भी बैठे थे। बैठक खत्‍म होने के बाद उन्‍होंने इंद्र कुमार गुजराल से मुलाकात की। गुजराल सूचना एवं प्रसारण राज्‍य मंत्री थे। उन्‍हें संजय ने आदेश दिया- रेडियो पर जो भी खबर जाएगी, उसे पहले मुझे दिखाया जाए। गुजराल ने विरोध किया। उन्‍होंने कहा- वो खबरें गुप्‍त दस्‍तावेज होती हैं। उनके प्रसारण से पहले उन्‍हें कोई नहीं देख सकता। वह (गुजराल) भी नहीं। इस घटना की पुष्‍टि खुद गुजराल ने एक टीवी इंटरव्‍यू में की थी। साथ ही, उन्‍होंने कहा था कि इससे यह बात बिल्कुल साफ हो गई थी कि सत्‍ता मां से बेटे के पास जा चुकी थी।

केशवानंद भारती केस: इंदिरा को न्‍यायपालिका से पहले भी झटका लग चुका था। सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा सरकार के 2 लोकप्रिय फैसलों पर रोक लगा दी थी। इंदिरा ने 14 प्राइवेट बैंकों को सरकारी हाथों में लेने और पुराने राजा-महाराजाओं को मिलने वाली पेंशन खत्म करने का फैसला किया था। कोर्ट ने दोनों ही फैसलों को गलत ठहराया था। इंदिरा सुप्रीम कोर्ट पर पकड़ मजबूत करना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने संविधान का 24वां और 25वां संशोधन करने की ठान ली। 5 नवंबर, 1971 को 24वां संशोधन लाया गया। इस संशोधन के तहत संसद संविधान के किसी भी हिस्से में बदलाव ला सकती है चाहे इससे संविधान की मूल भावना ही क्यों न बदल जाए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद के पास संविधान के मूल अधिकारों में बदलाव लाने का अधिकार नहीं है।

इसके बाद 1972 (अप्रैल) में 25वां संशोधन लाया गया। इससे बैंकों के राष्‍ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स जैसे मुद्दों पर कोर्ट के फैसले पलट दिए गए। इंदिरा सरकार के इन फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट में पहली और आखिरी बार 13 जजों की बेंच ने मामले की सुनवाई की और 24 अप्रैल 1973 को सात बनाम 6 के बहुमत से फैसला सुनाया कि संसद के पास संविधान में बदलाव के असीमित अधिकार नहीं हैं। वह संविधान के मूल ढांचे के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं कर सकती। यह केस केशवानंद भारती केस के नाम से इतिहास में दर्ज हो गया। लेकिन, देश को आपातकाल की तरफ भी ले गया।

सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस की नियुक्ति: इस चर्चित केस में फैसला सुनाने के एक दिन बाद चीफ जस्टिस एस एम सिकरी रिटायर हो गए थे। वरिष्ठता के हिसाब से जस्टिस जेएम शेलट को चीफ जस्‍टिस बनना था। सरकार जस्टिस ए एन रे को चाहती थी। वह वरिष्ठता क्रम में चौथे नंबर पर थे, लेकिन संविधान में असीमित बदलाव के अधिकार के बारे में उनकी राय सरकार से मिलती-जुलती थी। वह चीफ जस्टिस बनाए गए। उन्होंने सरकार के पक्ष में कई फैसले सुनाए।

जय प्रकाश हुए नाराज: इंदिरा सरकार की न्यायपालिका में दखलअंदाजी से जनता पार्टी के कद्दावर नेता जयप्रकाश नरायाण बेहद आहत हुए। उन्होंने इसका कड़ा विरोध भी किया। लेकिन, सरकार का रवैया नहीं बदला। तब उन्होंने सभी सांसदों को खुला पत्र लिख कर अपना विरोध दर्ज किया। फिर उन्होंने सरकार के खिलाफ आंदोलन का ऐलान किया।

राज नारायण आपातकाल के पीछे एक ‘बड़ी वजह’: 1971 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी रायबरेली से 1 लाख से भी ज्यादा वोटों से जीती थीं। उनके खिलाफ राज नारायण ने चुनाव लड़ा था। उन्‍‍‍‍‍‍‍‍होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट में मुकदमा कर दिया। आरोप लगाया कि इंदिरा ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीके अपनाए। शांति भूषण (जो बाद में देश के कानून मंत्री बने) उनके वकील थे। इंदिरा की ओर से जज को प्रभावित करने की भी कोशिश हुई। लेकिन, 12 जून 1975 को कोर्ट ने अपने फैसले में इंदिरा को चुनाव में धांधली करने का दोषी पाते हुए उनके 6 साल के लिए चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया।

फैसला आने के बाद जय प्रकाश नारायण ने अपना आंदोलन और तेज कर दिया। दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली रखी गई। इसमें पूरा विपक्ष इंदिरा के खिलाफ एक ही मंच पर मौजूद था। रैली में करीब 5 लाख लोगों की विशाल भीड़ भी जमा हुई। इंदिरा सब्र नहीं रख सकीं। विपक्ष की एकजुटता और हालात अपने खिलाफ देख इंदिरा ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के पास फाइल भेज दी। उनके दस्‍तखत के साथ ही देश में ‘वाह्य आपातकाल’ (एक्‍सटर्नल इमरजेंसी) लागू हो गया।

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