27 जुलाई को मध्य प्रदेश की एक सत्र अदालत ने 2022 में खरगोन में रामनवमी के दौरान हुई हिंसा के मामले में 11 आरोपियों को बरी कर दिया। इस हिंसा में खरगोन के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ चौधरी समेत दो दर्जन से ज्यादा लोग घायल हुए थे और एक व्यक्ति की मौत हुई थी।
हिंसा के बाद प्रशासन ने प्रभावित इलाकों में 16 मकानों को यह कहते हुए गिरा दिया था कि उनमें अनियमितताएं थीं। इस मामले में 65 केस दर्ज किए गए थे। उस समय के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था, “मध्य प्रदेश की धरती पर दंगाइयों के लिए कोई जगह नहीं है… उन्हें छोड़ा नहीं जाएगा। उनके खिलाफ सबसे सख्त कार्रवाई की जाएगी।”
लेकिन चार साल बाद इन मामलों की जांच और कानूनी कार्रवाई की स्थिति यह है कि कई मामले एक-एक करके कमजोर पड़ रहे हैं या बिना किसी प्रगति के अटके हुए हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की अदालत के रिकॉर्ड की पड़ताल से यह सामने आया है।
अब तक जिन तीन दंगा मामलों में मुकदमे की सुनवाई पूरी हुई है, उन सभी में आरोपियों को बरी कर दिया गया है। इनमें 27 जुलाई को फैसला सुनाया गया मामला भी शामिल है। खरगोन पुलिस के मुताबिक, चार मामलों में आरोपियों का पता नहीं चल पाने और पर्याप्त सबूत न मिलने के कारण केस बंद कर दिए गए हैं। वहीं 38 एफआईआर की जांच अभी जारी है। इनमें करीब 85 आरोपी अब भी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं।
20 मामले अभियोजन पक्ष की ओर से सबूत पेश किए जाने के चरण में हैं और इनमें गवाहों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं।
सत्र अदालतों में जिन मामलों में आरोपियों को बरी किया गया, उनमें तीन अलग-अलग न्यायाधीशों ने अभियोजन पक्ष की इस नाकामी की ओर इशारा किया कि वह यह साबित नहीं कर सका कि अपराध किसने किए थे। अदालतों ने यह भी सवाल उठाया कि आरोपियों को इन मामलों में शामिल कैसे किया गया और यह भी पाया कि फॉरेंसिक सबूतों ने पेट्रोल बम के इस्तेमाल के दावों का ही खंडन किया।
जब अभियोजन विभाग से पूछा गया कि क्या सरकार इन बरी किए जाने के फैसलों के खिलाफ अपील करेगी, तो विभाग ने कहा कि पहले फैसले की समीक्षा की जाएगी।
गवाह मुकर गए, जांच में भी कई खामियां
- 13 जून, 2025
बरी किए जाने वाला पहला मामला 13 जून 2025 को सामने आया। यह खरगोन के भटवाड़ी मोहल्ले में महेश और विजयलक्ष्मी महाजन के पुश्तैनी मकान को जलाए जाने से जुड़ा था। अभियोजन पक्ष का कहना था कि सोएब, वसीम, सलीम खान (अब मृत) और एक नाबालिग ने साजिश रची और पेट्रोल बम का इस्तेमाल कर मकान में आग लगा दी। परिवार ने नुकसान का अनुमान 90,000 रुपये लगाया था।
मामले में 14 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। इनमें से किसी ने भी यह नहीं कहा कि उसने आरोपियों को आग लगाते हुए देखा था। महेश महाजन ने कहा कि उन्हें आग लगने की जानकारी किसी और से मिली थी। विजयलक्ष्मी ने बताया कि घटना के समय वह मनावर में अपने माता-पिता के घर थीं। दूसरे गवाहों ने भी कहा कि उन्हें आग लगने की जानकारी तब मिली, जब उन्हें बताया गया कि दंगे हो गए हैं।
छठे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कैलाश प्रसाद मारेकम की अदालत ने कहा कि “इनमें से किसी भी गवाह ने अदालत के सामने यह बयान नहीं दिया कि आरोपियों ने दंगे में हिस्सा लिया था या घटना को अंजाम दिया था।”

फैसले में जांच को लेकर सबसे गंभीर सवाल उठाए गए। जांच अधिकारी सब-इंस्पेक्टर शंकुतला दुड़वे ने अदालत को बताया कि आरोपियों को “उपलब्ध सबूतों के आधार पर” गिरफ्तार किया गया था। न्यायाधीश ने पूछा कि वह सबूत क्या था, जबकि एफआईआर दर्ज किए जाने के समय आरोपियों को अज्ञात व्यक्ति बताया गया था।
फैसले में कहा गया कि जांच अधिकारी ने अपनी मुख्य गवाही में यह कहीं नहीं बताया कि “एक अज्ञात आरोपी की संख्या बढ़कर कई आरोपियों तक कैसे पहुंची।” अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है कि “आपराधिक साजिश कब, कहां या कैसे रची गई।”
इलेक्ट्रॉनिक सबूत भी अभियोजन पक्ष के काम नहीं आए। आगजनी की घटना की फुटेज होने की बात कहकर एक पेन ड्राइव जब्त की गई थी, लेकिन उसे अदालत में कभी चलाकर नहीं दिखाया गया। न्यायाधीश ने कहा कि अभियोजन पक्ष “पेन ड्राइव से कोई लाभ नहीं ले सकता।” अदालत ने यह भी कहा कि अगर इसे चलाया भी जाता तो इससे अभियोजन का मामला मजबूत नहीं होता, क्योंकि पेन ड्राइव पेश करने वाले महेश ने अपनी गवाही में उसके बारे में कोई बयान नहीं दिया और गवाह के रूप में मुकरने के बाद उन्होंने फुटेज में किसी भी आरोपी की पहचान करने से इनकार कर दिया।
इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सबूत के रूप में स्वीकार करने से संबंधित भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी के तहत जरूरी प्रमाणपत्र भी पेश नहीं किया गया। अभियोजन पक्ष ने ऐसा कोई सबूत भी नहीं दिया कि पेन ड्राइव को कभी पुलिस के कंप्यूटर पर चलाया गया था या किसी ने उसमें मौजूद लोगों की पहचान की थी।
तस्वीरों का मामला भी कुछ ऐसा ही रहा। तस्वीरों के लिए वैष्णवी नाम की एक महिला ने धारा 65बी का प्रमाणपत्र दिया था, लेकिन अभियोजन पक्ष ने उसे गवाह के तौर पर अदालत में पेश ही नहीं किया। न्यायाधीश ने यह भी कहा कि तस्वीरें लेने वाले उपकरण से जुड़ी जरूरी जानकारी, जैसे मोबाइल फोन नंबर, भी उपलब्ध नहीं थी।
फॉरेंसिक जांच ने भी आगजनी के आरोप को कमजोर कर दिया। जांचकर्ताओं ने सागर की प्रयोगशाला में तीन चीजें भेजी थीं – कांच की एक बोतल, मकान से मिले जले हुए लकड़ी के टुकड़े और जला हुआ लोहे का गैस चूल्हा। फैसले में फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया कि “किसी भी वस्तु में ज्वलनशील पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन (पेट्रोल/डीजल/केरोसिन तेल) के अवशेष नहीं मिले।”
- 14 अक्टूबर, 2025
दूसरा मामला खरगोन के आनंद नगर इलाके में मेहरून बी के परिवार पर हुए हमले का था। इसमें 14 अक्टूबर 2025 को आरोपियों को बरी कर दिया गया। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, 10 अप्रैल 2022 की रात करीब 11 बजे मेहरून और उनका परिवार घर में सो रहा था, तभी उनके घर पर पत्थर फेंके गए। मेहरून ने कहा कि उन्होंने 10-11 हमलावरों को देखा था। जांच के दौरान कपिल उर्फ गोलू वर्मा के रूप में पहचाने गए एक व्यक्ति ने कथित तौर पर तलवार से उन पर हमला किया, जिससे उन्हें चोटें आईं। उनकी बेटी जुबैदा पर भी कथित तौर पर पत्थर से हमला किया गया।
पुलिस ने इस मामले को हत्या के प्रयास के रूप में दर्ज किया। मौके से दो पत्थर और करीब 2 फुट 10 इंच लंबी एक तलवार बरामद की गई। कपिल वर्मा, सोनू वर्मा और सचिन वर्मा के खिलाफ आरोप लगाए गए। तलवार मिलने के बाद मामले में आर्म्स एक्ट की धारा भी जोड़ी गई।
तीसरे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश राजकुमार यादव की अदालत में सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 10 गवाह पेश किए। मेहरून समेत सभी गवाहों ने कहा कि वे आरोपियों की पहचान नहीं कर सके।
जब्ती और नुकसान से जुड़े पंचनामों पर हस्ताक्षर करने वाले पंच गवाह मेहराज भी अपने बयान से मुकर गए। उन्होंने अदालत में कहा कि उन्हें घटना के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और उन्हें यह भी नहीं पता कि उन्होंने किन कागजों पर हस्ताक्षर किए थे।
14 अक्टूबर 2025 को दिए अपने फैसले में न्यायाधीश यादव ने आपराधिक मामलों में सबूत से जुड़े स्थापित सिद्धांतों को आधार बनाया। उन्होंने खास तौर पर इस “मूलभूत” सिद्धांत का उल्लेख किया कि “अभियोजन पक्ष को आरोपी के खिलाफ अपराध को संदेह से परे साबित करना होता है।” उन्होंने यह भी कहा कि दोषसिद्धि “संदिग्ध सबूत या केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर नहीं की जा सकती।”
सत्र अदालत ने “सच हो सकता है” और “सच होना ही चाहिए” के बीच के अंतर को भी सामने रखा। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष घर में जबरन घुसने, हत्या के प्रयास, जुबैदा पर हमले या संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपों को साबित नहीं कर सका।
- 27 जुलाई, 2026
तीसरा मामला इन तीनों में सबसे बड़ा था। इसमें इबादत, सादिक, अब्दुल्ला, साहेब उर्फ शाहिब, शेरयार, फैजल, आजम, शब्बीर, इमरान, मुस्ताक और राजिक समेत 11 लोगों को दंगा, आगजनी, घर में जबरन घुसने और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत लगे आरोपों से बरी कर दिया गया।
अभियोजन पक्ष का कहना था कि 10 अप्रैल 2022 की शाम 6 बजे से रात 9 बजे के बीच पत्थरों, तलवारों और पेट्रोल बम से लैस भीड़ ने भटवाड़ी इलाके के मकानों पर हमला किया और घरों तथा मोटरसाइकिलों में आग लगा दी।
सुनवाई के दौरान 11 प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज किए गए। इनमें से आठ गवाहों ने, जिनमें शिकायतकर्ता और घायल लोग भी शामिल थे, अभियोजन पक्ष की कहानी का समर्थन नहीं किया। 27 जुलाई 2026 को चौथे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश मुकेश नाथ ने अपने फैसले में दर्ज किया कि “इन आठ गवाहों में से किसी ने भी किसी आरोपी की पहचान नहीं की… उनकी गवाही में किसी भी आरोपी के खिलाफ कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया।”
इन गवाहों को पक्षद्रोही घोषित किए जाने के बाद अदालत ने कहा कि “अभियोजन पक्ष को उनसे कोई लाभ नहीं मिला।” अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि “अपराध में आरोपियों की संलिप्तता न तो सामने आई और न ही किसी भी तरह साबित हुई।”
वैष्णवी जैन ही एकमात्र ऐसी गवाह थीं, जिन्होंने सभी 11 आरोपियों की पहचान करने का दावा किया था। लेकिन उनकी गवाही भी जांच में टिक नहीं सकी। उनके अपने पिता दिनेश जैन और भाई आकाश जैन ने अदालत में कहा कि दंगाइयों ने “चेहरे कपड़े से ढक रखे थे।”
आकाश ने कहा कि उसने चार-पांच लोगों को देखा था, लेकिन उनके चेहरे ढके होने के कारण वह उनकी पहचान नहीं कर सका। दिनेश ने कहा कि उन्होंने 500 से 600 मीटर की दूरी से भीड़ को देखा था। वह उन लोगों को पहले से नहीं जानते थे और इसलिए यह निश्चित तौर पर नहीं बता सकते कि आरोपी कौन थे।
न्यायाधीश ने कहा कि इतनी दूरी से किसी व्यक्ति को पीछे से पहचान पाना “स्वाभाविक, संतोषजनक या विश्वसनीय” नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब गवाह खुद यह स्वीकार कर चुका हो कि दंगाइयों के चेहरे ढके हुए थे। जांच में कुछ ऐसी कमियां भी थीं, जिनका कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। वैष्णवी का नाम लिखित शिकायत या एफआईआर, दोनों में प्रत्यक्षदर्शी के रूप में नहीं था। दोनों दस्तावेज दंगे के दो दिन बाद दर्ज किए गए थे। अदालत ने कहा कि इस देरी का “कोई स्पष्टीकरण नहीं” दिया गया। वैष्णवी का बयान घटना के 51 दिन बाद दर्ज किया गया था।
एफआईआर में उन 11 आरोपियों में से केवल छह के नाम थे, जिन पर बाद में मुकदमा चला। बाकी पांच आरोपियों के नाम बाद में जोड़े गए। फैसले में कहा गया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि उनके नाम कब और क्यों जोड़े गए।
सागर की प्रयोगशाला की रिपोर्ट ने भी पुलिस के मामले को मजबूत नहीं किया। जांच में जब्त बोतल के टुकड़ों और जली हुई सामग्री में “ज्वलनशील पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन (पेट्रोल/डीजल/केरोसिन)” के कोई अवशेष नहीं मिले।
अभियोजन पक्ष के सामने चुनौती
खरगोन कोतवाली थाने के निरीक्षक बीएल मंडलोई दंगा मामलों की निगरानी कर रहे हैं। उनके साथ 10 अधिकारियों की टीम है। शुरुआती जांच के बाद गठित एसआईटी को भंग किए जाने के बाद यह जिम्मेदारी उन्हें मिली है।
करीब 85 आरोपी अब भी “फरार” क्यों हैं, इस सवाल पर मंडलोई कहते हैं, “हमें दिक्कत यह आ रही है कि आरोपियों के नाम आम हैं। उनके पिता का नाम या पता उपलब्ध नहीं है। घटनाएं 13 जगहों पर हुई थीं और हम बिना पुख्ता जानकारी के किसी को आरोपी नहीं बना सकते। हमें सीसीटीवी फुटेज और सीडीआर (कॉल डिटेल रिकॉर्ड) की जानकारी से चेहरों का मिलान करना पड़ता है।”
मुकदमों की धीमी रफ्तार के बारे में मंडलोई कहते हैं, “कम से कम 23 मामलों में सागर की राज्य फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला से रिपोर्ट अभी आनी बाकी है। हम उन्हें जल्द मंगाने की कोशिश कर रहे हैं।”
खरगोन के पुलिस अधीक्षक रविंद्र वर्मा कहते हैं कि मुकदमों की सुनवाई तेज करने की पूरी कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा, “मैं सभी मामलों की स्थिति की समीक्षा कर रहा हूं और सभी मामलों में आरोपियों का पता लगाने की कोशिश कर रहा हूं।”
जिन मामलों की सुनवाई खरगोन जिला अदालत में हो रही है, उनमें दो विशेष लोक अभियोजक शिकायतों की पैरवी कर रहे हैं। इनमें से एक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “गवाह इसलिए मुकर गए क्योंकि वे सभी एक ही इलाके में रहते हैं और अब अपनी जिंदगी में आगे बढ़ना चाहते हैं।” उन्होंने कहा कि कुछ गवाहों को सुरक्षा दी जा सकती है, लेकिन “सैकड़ों लोगों” को सुरक्षा देना संभव नहीं है।
दंगा मामलों से जुड़े एक सहायक जिला अभियोजन अधिकारी (एडीपीओ) ने बताया कि वह और उनके सहयोगी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में चल रहे मामलों की निगरानी कर रहे हैं, जहां आरोपपत्र दाखिल किए जाने हैं।
उन्होंने कहा, “कम से कम 15 मामलों में, जिनकी मैं निगरानी कर रहा हूं, आरोपी अब भी पकड़े नहीं गए हैं और सभी निवासी वहां से जा चुके हैं। इन मामलों में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल किए जाने का खतरा है।”
एक सत्र अदालत से जुड़े दूसरे एडीपीओ ने कहा, “हमारे पास ऐसे उचित कक्ष या कार्यालय तक नहीं हैं, जहां हम सुनवाई से पहले किसी गवाह को बुलाकर उसके बयान के बारे में समझा सकें। वे ठीक से बयान नहीं दे पाते और उनकी गवाही में महत्वपूर्ण विरोधाभास आ जाते हैं। कम से कम दो-तीन मामलों में, जिनकी मैं निगरानी कर रहा हूं, आरोपी अपने पुराने बयान तक याद नहीं कर पाए।”
एडीपीओ का कहना है कि इसके लिए गवाहों को पूरी तरह जिम्मेदार भी नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने कहा, “हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे चार साल तक मामले से पूरी तरह अलग रहें और फिर एक रात हुई हिंसा की छोटी-छोटी बातें याद रख पाएं।”
जिंदगी रुक गई, लेकिन जिंदगी चलती रही
27 जुलाई को जिन 11 लोगों को बरी किया गया, उनका मामला हिंसा के दौरान दर्ज किए गए शुरुआती आपराधिक मामलों में से एक था। इन 11 लोगों ने जमानत मिलने से पहले 462 से 827 दिन तक जेल में बिताए।
इनमें से ज्यादातर लोग स्कूल की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए थे। गिरफ्तारी से पहले वे मोटरसाइकिल ठीक करने, सब्जियां बेचने, ठेला चलाने या दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करने जैसे काम करते थे। जेल से बाहर आने के बाद वे फिर से इन्हीं कामों में लौट गए हैं। लेकिन अब उनके ऊपर बढ़ते कर्ज हैं और घर का खर्च चलाना भी मुश्किल होता जा रहा है।
परिवारों का कहना है कि त्योहारों के समय मुश्किल सबसे ज्यादा बढ़ जाती है। 27 वर्षीय एक आरोपी के रिश्तेदार ने कहा, “जब भी हमें ढोल की आवाज सुनाई देती है, घर में हर कोई रिश्तेदारों के यहां चला जाता है। उन आवाजों से हमें उस रात की याद आती है, जब सब कुछ बदल गया था।”
आरोपियों में सबसे उम्रदराज व्यक्ति अब 70 वर्ष से अधिक उम्र के हैं। उनके परिवार के मुताबिक, जेल जाने के बाद से वह मानसिक रूप से परेशान हैं। एक रिश्तेदार ने कहा, “उनकी जमानत तीन बार खारिज हुई और उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उनके साथ यह सब क्या हो रहा है।”
42 वर्षीय एक आरोपी के जेल में रहने के दौरान उसके चार बच्चों को स्कूल छोड़ना पड़ा, क्योंकि परिवार फीस नहीं भर सकता था। एक रिश्तेदार ने बताया कि परिवार को पड़ोसियों की मदद पर भी निर्भर रहना पड़ा। एक मोटरसाइकिल मैकेनिक के तीन बच्चों को भी स्कूल बदलना पड़ा, क्योंकि परिवार पिछले स्कूल का खर्च नहीं उठा पा रहा था।
एक अन्य आरोपी की उम्र उस समय 22 साल थी। वह नगरपालिका में सफाई कर्मचारी के रूप में अपनी ड्यूटी पूरी करके लौटा ही था कि उसे उठा लिया गया। परिवार के एक सदस्य ने बताया, “उसके पिता गंभीर रूप से बीमार थे। परिवार की करीब 50,000 रुपये की बचत इलाज में खत्म हो गई। बेटे के घर लौटने से पहले ही पिता की मौत हो गई।”
दंगे के समय एक आरोपी की उम्र 23 साल थी। जब वह जेल में था, तभी उसकी पत्नी ने बेटे को जन्म दिया। अब वह परिवार का खर्च चलाने के लिए ठेले पर सब्जियां बेचता है। एक अन्य आरोपी के रिश्तेदारों का कहना है कि हिरासत में लेते समय उसका हाथ टूट गया था और उसे करीब 70 कैदियों वाली बैरक में रखा गया था। परिवार के एक सदस्य ने कहा, “जब भी हम उससे मिलने जाते थे, वह रोता था। ठीक से सोने के लिए भी पर्याप्त जगह नहीं थी।”
