पंजाब के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के एक और सिख नेता को बड़ी जिम्मेदारी मिली है। केंद्र सरकार ने बीजेपी नेता हरजीत सिंह ग्रेवाल को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष के पद से नवाजा है। इस फैसले को देखें तो यह सवाल उठता है कि पार्टी पंजाब में जट्ट सिख समुदाय पर फोकस क्यों कर रही है?
इससे पहले पंजाब में पार्टी के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी भी इसी समुदाय से आने वाले केवल सिंह ढिल्लों को दी थी। पंजाब की राजनीति में जट्ट सिख इतने अहम क्यों हैं और क्या वाकई उनका समर्थन बीजेपी को मिल सकता है?
पंजाब में अब तक बीजेपी के लिए यह माना जाता रहा है कि वह शहरी मतदाताओं वाली और विशेषकर हिंदू मतदाताओं के बीच आधार रखने वाली पार्टी है लेकिन ढिल्लों और ग्रेवाल की नियुक्तियों के बाद ऐसा समझा जाना चाहिए कि वह समाज के बाकी तबकों के बीच भी अपना विस्तार कर रही है।
बीजेपी के समर्पित कार्यकर्ता हैं ग्रेवाल
हरजीत सिंह ग्रेवाल की नियुक्ति से बीजेपी ने पार्टी के कार्यकर्ताओं को यह संदेश भी दिया है कि वह मुश्किल के वक्त में उसका साथ देने वाले कार्यकर्ताओं को नहीं भूलती। हरजीत सिंह ग्रेवाल लंबे वक्त से बीजेपी के साथ जुड़े रहे हैं और किसान आंदोलन के दौरान जब पंजाब में बीजेपी के नेताओं का बड़े पैमाने पर विरोध हो रहा था, तब भी वह पार्टी के साथ मजबूती से खड़े रहे।
मालवा से आते हैं ढिल्लों और ग्रेवाल
यहां इस बात को भी समझना जरूरी होगा कि केवल सिंह ढिल्लों और हरजीत सिंह ग्रेवाल दोनों ही मालवा इलाके से आते हैं। 117 विधानसभा सीटों वाले पंजाब में 69 सीटें मालवा के इलाके में हैं। आम आदमी पार्टी को विधानसभा चुनाव में 69 में से 66 सीटों पर जीत मिली थी। ऐसा लगता है कि बीजेपी की कोशिश मालवा क्षेत्र में अपनी मौजूदगी को मजबूत करने की है।
पंजाब में लगभग 58% सिख आबादी है। पंजाब में जट्ट सिखों की कुल आबादी 22 से 25% के बीच है। पंजाब की राजनीति में अधिकतर मुख्यमंत्री जट्ट सिख समुदाय से ही रहे हैं। बीजेपी जानती है कि राजनीतिक रूप से ताकतवर इस वर्ग को साधे बिना पंजाब की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत नहीं की जा सकती।
जट्ट सिख समुदाय पंजाब में खेती-किसानी के काम से जुड़ा हुआ है। इस समुदाय के पास जमीन है और कारोबार भी है इसलिए आर्थिक रूप से संपन्न होने के साथ ही यह राजनीति में भी ताकतवर है।
जट्ट सिख समुदाय से हैं मान, वड़िंग और सुखबीर
पंजाब की राजनीति में मौजूदा वक्त में मुख्यमंत्री भगवंत मान, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल भी जट्ट सिख समुदाय से हैं। यह तीनों ही नेता मालवा बेल्ट से आते हैं। यह माना जा रहा है कि विपक्ष के बड़े नेताओं के इस समुदाय से आने की वजह से बीजेपी भी जट्ट सिख समुदाय के बीच अपना राजनीतिक आधार बढ़ाना चाहती है। इसलिए उसने केवल सिंह ढिल्लों के बाद हरजीत सिंह ग्रेवाल को भी बड़ी जिम्मेदारी देकर इस समुदाय का भरोसा जीतने की कोशिश की है।
बीजेपी ने अब तक यह भी फैसला किया है कि वह पंजाब में अकेले ही चुनाव लड़ेगी। ऐसे में उसके लिए सिख वर्चस्व वाले इस राज्य में सिख चेहरों को आगे करना जरूरी है। बीजेपी की नजर ऐसे नेताओं पर भी है जिनकी सिख समुदाय के साथ ही ग्रामीण मतदाताओं पर भी पकड़ हो।
यह साफ है कि केवल सिंह ढिल्लों और हरजीत सिंह ग्रेवाल की नियुक्तियां काफी सोच-समझकर और एक रणनीति के तहत की गई हैं। बीजेपी गांवों में और सिख समुदाय के बीच तो अपनी पकड़ मजबूत करना ही चाहती है। साथ ही, विपक्ष के द्वारा लगाए जाने वाले सिख विरोधी और हिंदू पार्टी के टैग से भी बाहर निकलना चाहती है।
इसके अलावा पार्टी के पास पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के रूप में भी जट्ट सिख समुदाय से आने वाले बड़े चेहरे हैं।
हालांकि ऐसा नहीं है कि बीजेपी सिर्फ जट्ट सिखों के बीच ही आधार बढ़ा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविदासिया समुदाय के सबसे बड़े डेरे सचखंड बल्लां में जा चुके हैं। रविदासिया समुदाय पंजाब की दलित आबादी में बड़ी हिस्सेदारी रखता है। इसके अलावा हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी लगातार पंजाब के दौरे कर रहे हैं और इसके जरिए उनकी कोशिश पंजाब में ओबीसी मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में एकजुट करने की है।
हिंदू और दलित नेता भी सक्रिय
बीजेपी के पास अश्विनी शर्मा, सुनील जाखड़ जैसे बड़े हिंदू नेता हैं और शहरी क्षेत्र में उसकी थोड़ा-बहुत मौजूदगी भी है। सुनील जाखड़ और अश्विनी शर्मा के जरिये बीजेपी लुधियाना, जालंधर, अमृतसर गुरदासपुर और आदि इलाकों में हिंदू मतदाताओं के बीच सक्रियता बढ़ा रही है। दलित समुदाय के रूप में बीजेपी के पास पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय सांपला, पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री सोमप्रकाश हैं।
बढ़ी है बीजेपी की ताकत
यहां आंकड़ों के जरिए यह समझना जरूरी होगा कि पिछले कुछ चुनावों में पंजाब में बीजेपी की ताकत में इजाफा हुआ है। जैसे 2014 के लोकसभा चुनाव में उसका वोट शेयर 8.70% था जो 2019 में बढ़कर 9.56% हो गया। 2022 के विधानसभा चुनाव में वह अकेले मैदान में उतरी और 6.60 प्रतिशत वोट हासिल किए जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में यह वोट प्रतिशत बढ़कर 18.56% हो गया। भले ही उसे लोकसभा चुनाव में कोई सीट नहीं मिली लेकिन उसने वोट प्रतिशत के मामले में पंजाब की क्षेत्रीय पार्टी शिरोमणि अकाली दल को पीछे छोड़ दिया था।
इस साल मार्च में पंजाब के मोगा में एक रैली को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इसका जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि भाजपा को पंजाब में 19% वोट मिले थे और जहां भी हमें इतने वोट मिलते हैं पार्टी सरकार बनाती है। उन्होंने मणिपुर, त्रिपुरा, उत्तराखंड का उदाहरण देते हुए कहा था कि अब पंजाब की बारी है।
कुल मिलाकर बीजेपी का संदेश स्पष्ट है कि 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले वह हिंदू शहरी मतदाताओं, जट्ट सिख समुदाय और दलित वर्ग के साथ ही बाकी वर्गों को भी साथ लेकर मजबूत सामाजिक गठबंधन बनाना चाहती है, जो पंजाब में उसे बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित कर सके।
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