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BEYOND THE NEWS: केरल में हिंदूवादी मोर्चे का भविष्‍य तय करेगा लोकल बॉडी चुनाव

सोमवार को पहले चरण में कुल 14 में से 7 जिलों में वोटिंग हुई। इस बार का चुनाव राजनीतिक रूप से ज्‍यादा अहम है। इसकी वजह यह है कि भाजपा ने पिछड़े समुदाय के संगठनों के साथ समझौता किया है।

Author तिरुअनंतपुरम | November 3, 2015 01:26 am
केरल में 2016 में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में यह लोकल बॉडी इलेक्‍शन काफी अहम माना जा रहा है। खासतौर से बीजेपी के लिए, जो कि वहां पैर पसारने की जमकर तैयारी कर रही है।

केरल में लोकल बॉडीज के चुनाव शुरू हो गए हैं। सोमवार को पहले चरण में कुल 14 में से 7 जिलों में वोटिंग हुई। इस बार का चुनाव राजनीतिक रूप से ज्‍यादा अहम है। इसकी वजह यह है कि भाजपा ने पिछड़े समुदाय के संगठनों के साथ समझौता किया है। खास कर वेल्‍लापल्‍ली नटेसन के नेतृत्‍व वाले संगठन श्री नारायण धर्म परिपालन योगम (एसएनडीपी) के साथ। यह हिंदू इजहावा का संगठन है। इस समुदाय के लोग पारंपरिक रूप से माकपा (सीपीएम) के वोटर्स रहे हैं। लेकिन इस बार भाजपा के हाथ मिला लेने के बाद कांग्रेस और माकपा दोनों परेशान हैं।

भाजपा और नटेसन मु के साथ मिलने से चुनावी समीकरण एकाएक बदल गए। ऐसे चुनाव आम तौर पर स्‍थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं। लेकिन हिंदू संगठन से भाजपा के हाथ मिलाने के बाद कांग्रेस और माकपा के लिए हिंदुत्‍व मुद्दा बन गया है। माकपा ने अपने स्‍टार कैंपेनर वी.एस. अच्‍युतानंदन के जरिए मुख्‍य निशाना नटेसन को ही बनाया है। बीते तीन हफ्तों में किसी भी दूसरे मुद्दे की तुलना में नटेसन के अतीत और उनके कथित घोटालों की ही सबसे ज्‍यादा चर्चा हुई है।

भाजपा भी स्‍थानीय मुद्दों के बजाय बीफ विवाद, दादरी में मुस्लिम की हत्‍या जैसे मुद्दे उठा रही है। इस चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए खास मायने रखते हैं। अगले साल की शुरुआत में केरल में विधानसभा चुनाव होने हैं। अगर भाजपा इस चुनाव में अच्‍छा प्रदर्शन करती है तो इसका श्रेय एसएनडीपी से समझौते को भी जाएगा। नतीजतन विधानसभा चुनाव में बड़े पैमाने पर हिंदू संगठनों से गठबंधन करने की नीति पर भाजपा आगे बढ़ सकती है। एसएनडीपी योगम भी खुद को हिंदू संगठन से राजनीतिक दल में बदल सकता है। यानी नटेसन अपनी पार्टी बना कर चुनाव में उतर सकते हैं।

कांग्रेस के नेतृत्‍व वाले सत्‍ताधारी गठबंधन यूडीएफ के लिए इस चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करना वित्‍त मंत्री केएम मणि के लिए खास तौर पर जरूरी है। अगर यूडीएफ की अच्‍छी सीटें आ गईं तो मणि बलि का बकरा बनने से बच जाएंगे। यूडीएफ कमजोर पड़ी तो मुख्‍यमंत्री ओमन चांडी का कद भी पार्टी के अंदर घटेगा। वैसे भी वह इन चुनावों को राज्‍य सरकार के कामकाज पर जनता की रायशुमारी के तौर पर प्रचारित करते रहे हैं। कुल मिला कर यह चुनाव केरल में एक नए, तीसरे मोर्चे के भविष्‍य को लेकर संकेत देगा।

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