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‘पीर‍ियड्स में भी उठवाते थे वजन, लगातार 15-20 द‍िन होती थी ब्‍लीड‍िंग, कचरा बीन कर खाती थी खाना’

'नर्क' से लौटी मह‍िला की आपबीती: 20 घंटे रोज करती थी काम, फिर भी नहीं देते थे पूरी पगार।

प्रतीकात्मक फोटो।

सऊदी अरब से सकुशल स्वदेश लौटने के बाद 38 साल की मंजूषा बेहद राहत महूसस कर रही हैं। पराए मुल्क में हुए जुल्मों को याद करके वह अब भी सिहर उठती हैं। मंजूषा ने बताया कि उन्हें हर रोज 20 घंटे काम करना पड़ता था। इसके बावजूद उन्हें न केवल भूखा रखा जाता था, बल्कि उनकी पिटाई भी की जाती थी। बता दें कि वह इसी हफ्ते 12 अक्टूबर को केरल के तिरुअनंतपुरम जिले स्थित अपने गांव पलोद लौटी हैं। उन्होंने कहा कि वह भविष्य में कभी भी भारत छोड़कर कहीं नहीं जाएंगी।

द न्यूज मिनट की रिपोर्ट के मुताबिक, आठ साल पहले पति की मौत होने के बाद मंजूषा बीते पांच सालों से एक दुकान पर सेल्सगर्ल की नौकरी कर रही थीं। अपनी दो बेटियों के बेहतर भविष्य के लिए इस साल मार्च में वह सऊदी अरब गई थीं। लौटने के बाद उनकी मुश्किलें अब और बढ़ चुकी हैं। कर्जदारों के बोझ तले दबीं मंजूषा अब आया के तौर पर काम कर रही हैं। मंजूषा ने बताया कि बड़ी मुश्किलों से वह किसी तरह सऊदी पहुंचीं। हालांकि, एयरपोर्ट पर उतरने के बाद ही उन्हें इस बात का अंदाजा हो गया था कि वह फंस चुकी हैं। एयरपोर्ट पर उन्हें लेने उनको जानने वाले शख्स और एक सऊदी नागरिक आया था। उनका परिचित शख्स बीच रास्ते ही कार से उतर गया।

मंजूषा ने बताया, ‘मुझे एक तीन मंजिला इमारत में ले जाया गया, जहां 32 लोग रहते थे। इनमें से 16 बच्चे थे। इस घर में मेरे अलावा कोई दूसरा नौकर नहीं था। मुझे बच्चों की देखभाल करनी होती थी। उनके कपड़े धोने होते थे। उनके बड़े मकान की सफाई करनी होती थी और घर का हर काम करना होता था। मेरा काम सुबह छह बजे शुरू होता था और रात दो-तीन बजे खत्म होता था। मैं हर रोज 20 घंटे काम करती थी।’ मंजूषा के मुताबिक, इतने काम के बावजूद पहले महीने में उन्हें सैलरी नहीं दी गई। दूसरे महीने में उनके पिता के खाते में महज 17 हजार रुपये भेजे गए, जबकि उनसे 24 हजार 200 रुपये का वादा किया गया था। इसके बाद मंजूषा के कई बार मिन्नत करने के बाद थोड़े पैसे और दिए गए।

मंजूषा के मुताबिक, न केवल उनका वेतन उन्हें नहीं मिला, बल्कि उन्हें हर तरह के शारीरिक और मानसिक शोषण से गुजरना पड़ा। उन्होंने बताया, ‘मुझसे हर रोज 20 से 30 किलो वजन उठवाया जाता था। पीरियड्स के दौरान भी ये काम कराए जाते थे। शायद इसी वजह से महीने के 15 से 20 दिन तो मुझे ब्लीडिंग होती रहती थी। वे मुझे कभी भी अस्पताल नहीं ले गए। वे कहते थे कि ऐसा होना सामान्य बात है।’ इतने बुरे हालात में भी मंजूषा को 20 घंटे रोज काम कराया जाता था। मंजूषा ने बताया, ‘मैं तो मरने का फैसला कर लिया और एक बार खुद को मारने की कोशिश भी की। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि जब वे कहीं से आते थे तो बिना वजह मुझे लात मारते थे। मैं अक्सर गिर जाती थी और मुझे बुरी तरह से चोट लगती थी।’

मंजूषा ने बताया कि उन्हें जानबूझकर कई दिनों तक भूखा रखा जाता था। आखिरकार एक दिन ऐसा आया कि वह धोने के लिए आईं उनकी जूठी प्लेटों में बचा खाकर काम चलाने लगीं। उन्होंने बताया कि जिंदा रहने के लिए कई बार कचरे से खाना निकालकर खाया ताकि जिंदा रह सकें। इसके बावजूद उन्होंने वापस लौटने की उम्मीद नहीं छोड़ी। मंजूषा ने बताया कि उन्होंने भागने की कोशिश की, लेकिन दो बार पकड़ी गईं। हर बार उन्हें बुरी तरह पीटा गया। तीसरी बार वह किसी तरह भागने में कामयाब रहीं। वहां से निकलने के बाद एक एनजीओ और पुलिसवालों की मदद से मंजूषा वापस लौटने में कामयाब रहीं।

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