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विस्थापित कश्मीरी पंडितों पर तो सरकार मेहरबान, पर जो मजबूरी में वहीं रहे उन्हें साल रहा टिके रहने का दर्द- पीड़ितों की आपबीती

जो कश्मीरी पंडित विस्थापित हुए उनपर तो सरकारें मेहरबान रहीं। हालांकि कुछ ऐसे भी परिवार थे जो इन हिंसक घटनाओं के बाद भी कश्मीर छोड़कर नहीं गए और उन्होंने अपने घरों में ही रहना पसंद किया। आज इन परिवारों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है।

kashmiri pandits26 साल के आशीष गंजू अपनी बहनों शीतल (बाएं) और कोमल के साथ अनंतनाग स्थित अपने घर में। (Express photo: Shuaib Masoodi)

जम्मू-कश्मीर में अनंतनाग वो जिला रहा है जहां साल 1986 में सांप्रदायिक समस्या ने अपना रंग शुरू कर दिया था और जिले में अधिकतर पंडित परिवार तब अपना घर छोड़ने को मजबूर हो गए, जब चार साल बाद सरकार ने कश्मीरी पंडितों के खिलाफ उभरती स्थिति से अपना नियंत्रण खो दिया। जो कश्मीरी पंडित विस्थापित हुए उनपर तो सरकारें मेहरबान रहीं। हालांकि कुछ ऐसे भी परिवार थे जो इन हिंसक घटनाओं के बाद भी कश्मीर छोड़कर नहीं गए और उन्होंने अपने घरों में ही रहना पसंद किया।

आज इन परिवारों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। कश्मीरी पंडितों के खिलाफ हिंसक घटनाओं के बाद जिन कश्मीरियों ने अपना घर नहीं छोड़ा, उनमें से एक रानीपोरा गांव भी शामिल हैं। जहां गंजू परिवार की तीन पीढ़ियां रह रही हैं।

गंजू परिवार के अशोक कुमार गंजू (58) अपना दर्द बयां करते हुए बताते हैं, ‘हमारे पास घर छोड़ने के लिए संसाधन नहीं थे और ना ही जम्मू में जिंदगी की नई शुरुआत करने के लिए पूंजी। एक और पहलू यह भी था कि मेरे माता-पिता इस गांव और अपने घर को छोड़ना नहीं चाहते थे। हम उनके बिना नहीं जा सकते थे। इसिलए हमने भगवान और हमारे मुस्लिम पड़ोसियों पर भरोसा किया, जो खूब रोए और कहा कि वो हमें जाने नहीं देंगे। यह उनका हमारे लिए प्यार और स्नेह था। इसलिए हम रुके रहे और पड़ोसियों ने हमारा बहुत साथ दिया। उस समय हमारे द्वारा लिया गया सही समय था।’ कुमार आगे कहते हैं कि ‘मगर आज हमें लगता है कि वो सही निर्णय नहीं था।’ ये भी पढ़ें- गलत मत समझना, डर नहीं है, पर नौकरी के लिए छोड़ना होगा कश्मीर- नौजवान कश्मीरी पंडित ने बयां किया दर्द

उनकी 86 वर्षीय मां लक्ष्मी श्री उस घटना को याद करते हुए कहतीं हैं, ‘विस्थापित पंडितों की तरफ तो सभी राजनीतिक दलों का ध्यान गया। उन्हें सरकारी मुआवजे का लाभ मिला। उन्हें शिक्षा और रोजगार में कोटा मिला। जो लोग यहीं रह गए वो अदृश्य हो गए।’

श्रीनगर स्थित कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के प्रमुख संजय टिकू कहते हैं कि 800 से कम पंडित परिवार आज घाटी में रहते हैं। उनके अनुमान के मुताबिक साल 1989 में यह संख्या 77,653 थी।

संजय टिकू कहते हैं कि आज भी पंडित परिवारों का घाटी छोड़कर जाना जारी है। इसलिए नहीं कि वो असुरक्षित महसूस करते हैं बल्कि इसलिए की उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। जीविका का कोई साधन नहीं है। वे सरकारी नौकरी नहीं करते हैं और कोई निजी नौकरी नहीं है। अब अगर युवा पीढ़ी का कोई व्यक्ति बाहर नौकरी पाना लेता है तो वो अपने माता-पिता को अपने साथ ले जाता है। ये भी पढ़ें- 2017 में पीएमओ में नौकरी के लिए लगाई थी गुहार, आज तक है जवाब का इंतजार- कश्मीर नहीं छोड़ने वाले पंडित अब हो रहे विस्थापन को मजबूर

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