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2017 में पीएमओ में नौकरी के लिए लगाई थी गुहार, आज तक है जवाब का इंतजार- कश्मीर नहीं छोड़ने वाले पंडित अब हो रहे विस्थापन को मजबूर

साल 2017 में प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखे पत्र की एक कॉपी दिखाते हुए वो कहते हैं कि उन्होंने अपनी और अपने भाई की नौकरी के लिए सरकार से गुहार लगाई थी। उस समय दादी खासी बीमार थीं और परिवार के पास उनका इलाज कराने तक के पैसे नहीं थे।

kashmiri pandits26 साल के आशीष गंजू अपनी बहनों शीतल (बाएं) और कोमल के साथ अनंतनाग स्थित अपने घर में। (Express photo: Shuaib Masoodi)

जम्मू-कश्मीर से कश्मीरी पंडितों का पलायन जारी है। इसलिए नहीं की वो असुरक्षित महसूस करते हैं बल्कि इसलिए कि उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। जीविका का कोई अच्छा साधन भी नहीं है। आर्थिक स्थिति खराब होने के चलते इस समुदाय एक तबका केंद्र में पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार से खासा नाराज है। इनमें से एक हैं अनंतनाग में डायलगाम गांव निवासी सुनील भान, जो सरकार के प्रति नाराजगी जाहिर करते हुए कहते हैं कि उन्हें इस सरकार से बहुत उम्मीदें थी, मगर गैर-प्रवासी कश्मीरी पंडित परिवारों की दुर्दशा पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

साल 2017 में प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखे पत्र की एक कॉपी दिखाते हुए वो कहते हैं कि उन्होंने अपनी और अपने भाई की नौकरी के लिए सरकार से गुहार लगाई थी। उस समय दादी खासी बीमार थीं और परिवार के पास उनका इलाज कराने तक के पैसे नहीं थे। भान कहते हैं कि परिवार के पास सिर्फ 10 कनाल जमीन है, जिस पर परिवार के लिए ही खेती हो पाती है। सुनील भान कहते हैं, ‘मैं खुद पत्र देने के लिए दिल्ली गया था।’ ये भी पढ़ें- विस्थापित कश्मीरी पंडितों पर तो सरकार मेहरबान, पर जो मजबूरी में वहीं रहे उन्हें साल रहा टिके रहने का दर्द- पीड़ितों की आपबीती

भान आगे कहते हैं, ‘मगर मुझे इसका कोई जवाब या कोई फोन नहीं आया। ये भी नहीं बताया गया कि नौकरी नहीं है। देश का वो सबसे ऊंचे स्तर का कार्यालय है, इसलिए मैं केंद्र सरकार या राज्य में किसी और से क्या उम्मीद कर सकता? और आज ये सरकार घाटी में फिर से कश्मीरी पंडितों को बसाने पर विचार कर रही है। उन्हें उन लोगों के बारे में कुछ करना चाहिए जो कभी कश्मीर छोड़कर नहीं गए।

वहीं अनंतनाग डिग्री कॉलेज से आर्ट्स में ग्रेजुएट और गंजू परिवार से आने वाले 26 वर्षीय अशीष कहते हैं, ‘हम सांस्कृतिक रूप से पिछड़े हैं और हम अपने समुदाय से भी अलग-थलग हैं। ब्याह या निधन के दौरान हमारे पड़ोसी ही हैं जो हमारे रिश्तेदारों के आने तक हमारा साथ देते हैं। जब किसी की निधन हो जाता है तो वो मुस्लिम पड़ोसी हैं जो हमारे साथ रात भर बैठते हैं। तैयारियां करते हैं और यहां तक श्मशान घाट तक शव को ले जाने में हमारा साथ देते हैं। हम अपना त्योहार जैसे शिवरात्रि और दिवाली अपने पड़ोसियों के साथ मनाते हैं।’

आशीष ने गरीब पंडित परिवारों की सहायता के लिए कश्मीरी पंडित हेल्पिंग हैंड्स नाम का एक संगठन बनाया है। हाल में उन्होंने जिला आयुक्त को याचिका दी कि वे प्रशासन से श्मशान और मंदिरों में दीवारें और शेड बनाने के लिए कहें। ये भी पढ़ें- गलत मत समझना, डर नहीं है, पर नौकरी के लिए छोड़ना होगा कश्मीर- नौजवान कश्मीरी पंडित ने बयां किया दर्द

हालांकि 26 वर्षीय अशीष आज अच्छी नौकरी की तलाश में हैं। वो कहते हैं, ‘मैं यहां से जाने पर गंभीरता से विचार कर रहा हूं। मुझे गलत मत मसझना… ऐसा सुरक्षा कारणों से नहीं है। हमें ऐसी कोई समस्या नहीं है। मैं यहां से जाने की सोच रहा हूं क्योंकि मुझे नौकरी की जरुरत है। सरकारी नौकरियां हमारे लिए नहीं हैं और जो निजी क्षेत्र की नौकरियां उपलब्ध हैं, उनमें पैसा बहुत मिलता है।’

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