Jammu-Kashmir News: 1990 में सरला भट्ट की मौत के मामले में जम्मू-कश्मीर पुलिस की जांच में यह पूरी तरह साबित हो गया है कि उन्हें जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने कश्मीरी पंडित समुदाय के खिलाफ एक बड़ी आतंकी साजिश और अभियान के तहत मार डाला था।

भट्ट सौरा स्थित शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के नियोनेटोलॉजी विभाग में नर्स थीं। 19 अप्रैल 1990 को श्रीनगर में मल्लाबाग-उमर कॉलोनी रोड पर उनका शव मिला था।

एसआईए ने दाखिल की चार्जशीट

राज्य जांच एजेंसी ने सोमवार को श्रीनगर की एक स्पेशल एनआईए कोर्ट में 737 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की। ​​इसमें जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के तत्कालीन चीफ यासीन मलिक को उनके अपहरण और हत्या का मुख्य आरोपी बताया गया है। अधिकारियों ने इस घटनाक्रम को आतंकवाद के पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर बताया और कहा कि यह जम्मू-कश्मीर में पुराने आतंकी अपराधों की जांच में सबसे अहम कामयाबियों में से एक है।

18 मार्च 2024 को एसआईए को सौंपा गया था मामला

यह मामला जम्मू-कश्मीर के डीजीपी के आदेश पर 18 मार्च 2024 को एसआईए को सौंपा गया था। इस मामले के आरोपियों में मलिक भी शामिल है। वह अभी किसी दूसरे मामले में न्यायिक हिरासत में है और खुर्शीद अहमद चालकू है। वह फरार माना जाता है और ऐसा माना जाता है कि वह पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर भाग गया है। तीन अन्य आरोपी अब्दुल हामिद शेख, मोहम्मद यूसुफ सूफी उर्फ इदरीस और गुलाम मोहम्मद टपलू अब जिंदा नहीं हैं।

चार्जशीट में क्या-क्या कहा गया?

चार्जशीट में कहा गया है कि चश्मदीदों के बयान, मेडिकल और जांच के नतीजे, आतंकी हमले की जिम्मेदारी लेने वाला नोट, इलेक्ट्रॉनिक सबूत, गवाहों के बयान और आसपास के हालात मिलकर सबूतों की एक ऐसी ठोस और भरोसेमंद कड़ी बनाते हैं जिससे साबित होता है कि यह हत्या कोई अलग-थलग घटना नहीं थी, बल्कि जेकेएलएफ के उस सुनियोजित अभियान का हिस्सा थी जिसका मकसद कश्मीरी पंडित समुदाय के खिलाफ हिंसा करके दहशत फैलाना और उन्हें कश्मीर घाटी से जबरन पलायन के लिए मजबूर करना था।

जांच में यह बात सामने आई कि 18 अप्रैल 1990 को भट्ट का अपहरण कर लिया गया था और यासीन मलिक के निर्देश पर जेकेएलएफ से जुड़े चार आतंकियों ने राइफल से गोली मारकर उनकी हत्या करने से पहले उनके साथ मारपीट और उन्हें प्रताड़ित किया था।

जांचकर्ताओं ने आरोप साबित करने के लिए सुरक्षित गवाहों के बयान, चश्मदीदों के बयानों, मेमो, घटनास्थल की पहचान, मेडिको-लीगल एविडेंस, शरीर पर कई जगहों पर गोली लगने और निकलने के निशानों, गंभीर अंदरूनी चोटों और फिजिकल टॉर्चर के सबूतों का सहारा लिया।

घटनास्थल से मिले एक नोट की जांच की गई थी

घटनास्थल से मिले एक नोट की भी जांच की गई। इसमें जेकेएलएफ ने हत्या की जिम्मेदारी ली थी। हालांकि सीएफएसएल दिल्ली यह पक्के तौर पर नहीं बता सकी कि वह लिखावट किस व्यक्ति की है, लेकिन पुलिस का कहना है कि घटना के तुरंत बाद छपी मीडिया रिपोर्टों से उस नोट की पुष्टि होती है।

एसआईए के मुताबिक, सबूतों से यह भी पता चला कि जेकेएलएफ ने सरला भट्ट को मुखबिर के तौर पर गलत तरीके से पेश किया और उन पर आरोप लगाया कि वे 8 अप्रैल 1990 को नरवारा में सुरक्षा बलों की छापेमारी के लिए जिम्मेदार थीं। इस छापेमारी के दौरान जेकेएलएफ के कई आतंकवादी पकड़े गए थे और भागते समय मोहम्मद यासीन मलिक के घायल होने की खबर थी। जांच में यह नतीजा निकला कि यह आरोप सिर्फ एक बहाना था। इसका इस्तेमाल पहले से तय टारगेटेड किलिंग को सही ठहराने के लिए किया गया था।

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने 2008 में अपने ही मामलों के सर्वे के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार की थी। इस रिपोर्ट से पता चला कि 1989 से लेकर तब तक उग्रवादियों ने 209 कश्मीरी पंडितों की हत्या की थी। इनमें से 109 की हत्या अकेले 1990 में हुई थी। कश्मीरी पंडित समूहों का कहना है कि यह संख्या इससे कहीं ज्यादा है।

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जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के पूर्व अलगाववादी नेता यासीन मलिक को 1990 में वायुसेना के चार अधिकारियों की हत्या के मामले में बड़ा झटका लगा है। दो प्रमुख चश्मदीदों ने जम्मू की एक आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (टाडा) अदालत में गवाही दी, जिसमें यासीन मलिक की पहचान उस हमले के मुख्य शूटर के रूप में हुई, जिसमें स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना समेत वायुसेना के चार जवान मारे गए थे और 22 अन्य घायल हो गए थे। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…