Kashmir: Education of children in distress - Jansatta
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बदले सरकारी कायदे से वादी के बच्चों की तालीम संकट में

कश्मीर की सत्ता में जो रहे, लेकिन रास्ता तो उन्हीं बच्चों के जरिए निकलेगा जिनके हाथों में बंदूक रहे या कलम। जिनके जहन में हिंदुस्तान बसे या सिर्फ कश्मीर। कश्मीरी बच्चे बेखौफ होकर देश को समझ सकें। पढ़ने के लिए कश्मीर से बाहर निकल सकें। वापस घर लौट कर बताएं कि भारत कितना खूबसूरत मुल्क […]

Author February 26, 2015 10:34 AM
कश्मीर की सत्ता में जो रहे, लेकिन रास्ता तो उन्हीं बच्चों के जरिए निकलेगा जिनके हाथों में बंदूक रहे या कलम।

कश्मीर की सत्ता में जो रहे, लेकिन रास्ता तो उन्हीं बच्चों के जरिए निकलेगा जिनके हाथों में बंदूक रहे या कलम। जिनके जहन में हिंदुस्तान बसे या सिर्फ कश्मीर। कश्मीरी बच्चे बेखौफ होकर देश को समझ सकें। पढ़ने के लिए कश्मीर से बाहर निकल सकें। वापस घर लौट कर बताएं कि भारत कितना खूबसूरत मुल्क है।

यह सवाल इसलिए अहम है कि पांच बरस पहले दिल्ली ने तय किया था कि कश्मीरी बच्चों को देश के हर हिस्से में पढ़ने के लिए रास्ता बनाया जाए। मगर पांच बरस के भीतर ही दिल्ली की नीतियों ने कश्मीरी बच्चों के कश्मीर से बाहर पढ़ने पर ब्रेक लगा दिया। पांच साल पहले तय हुआ था कि सरकार पांच हजार कश्मीरी बच्चों को देश के किसी भी संस्थान में पढ़ने के लिए ट्यूशन फीस और हॉस्टल का किराया देगी जिनके परिवार की आय सालाना छह लाख रुपए से कम होगी। सितबंर 2010 के इस फैसले का असर हुआ। पहली बार 2011 में पांच हजार तो नहीं, लेकिन घाटी के 89 बच्चे सरकारी खर्च पर पढ़ने बाहर भी निकले। ये बच्चे करगिल से लेकर लेह और पुलवामा से लेकर अनंतनाग तक के थे। कश्मीर के 89 बच्चों ने भारत के अलग-अलग इलाकों में पढ़ाई शुरू की।

जिन इलाकों से बच्चे पहली बार घाटी से बाहर निकल कर पढ़ने पहुंचे उनकी खुशी देखकर अगली खेप में जबरदस्त उत्साह घाटी में हुआ। गरीब परिवारों को पहली बार बच्चों को पढ़ाने का रास्ता खुला तो बरस भर के भीतर तादाद 35 से साढ़े तीन हजार पहुंच गई। यानी घाटी के साढ़े तीन हजार बच्चे 2012 में देश के अलग-अलग हिस्सों के शिक्षण संस्थानों में पढ़ने निकले। घाटी में बच्चों को बाहर भेजकर पढ़ाने का सुकून और सुरक्षा दोनों ने घाटी के लोगों का दिल जीता तो 2013 में कश्मीरी बच्चों की संख्या बढ़कर चार हजार पहुंच गई।

खास बात यह थी कि घाटी का जो बच्चा कश्मीर से बाहर निकल कर जिस संस्थान में पढ़ने पहुंचा, उसने वहां के माहौल को जब अनुकूल बताया तो अगली जमात के बच्चों ने जब बारहवीं पास की तो फिर उसी संस्थान में नाम लिखाया जिसमें पहले उसके स्कूल या गांव का बच्चा पढ़ रहा था। असर इसका यह हुआ कि सरकार ने जो नियम घाटी के बच्चों को देश के अलग-अलग संस्थान में भेजने के लिए बनाए थे, वे टूट गए। असल में मनमोहन सरकार ने माना था कि देश में हर शिक्षा संस्थान में सिर्फ दो ही कश्मीरी बच्चों को वजीफे के साथ पढ़ाया जाए। यानी कल्पना की गई कि देश भर में कश्मीरी बच्चे पढ़ने के लिए निकलें। लेकिन दो हालात से दिल्ली कभी वाकिफ रही नहीं। पहली, देश में ढाई हजार शिक्षण संस्थान हंै कहां। और दूसरा, कश्मीर घाटी से पढ़ाई करने के लिए निकले बच्चों के परिजन ही अभी कहां इस मानसिकता में आए हंै कि वे अपने बच्चे को बिलकुल नई जगह पर पढ़ने के लिए भेज दें।

असर इसका यह हुआ कि उन्ही संस्थानों में बच्चों के जाने की तादाद बढ़ी जहां पहले से कश्मीरी बच्चे पढ़ रहे थे। मनमोहन सरकार के दौर में इस नियम को लचीला रखा गया। यानी कितने भी बच्चे किसी संस्थान में पढ़ रहे हैं उन सभी को केंद्र सरकार की ओर से तय विशेष वजीफा दिया गया। अधिकारियों से लेकर शिक्षण संस्थानों तक ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया कि कश्मीर से निकले बच्चे सामूहिक तौर पर रहना चाहते हंै। और अभी भी बच्चे दोस्त बनाने के लिए किसी कश्मीरी को ही खोजते हैं। हालांकि कुछ अर्से में सभी बच्चे आपस में खुल जाते है तो दूसरे प्रांत के बच्चों के साथ दोस्ती करते हैं। लेकिन बच्चों के मां-बाप भी यह चाहते है कि जहां पर पहले से कोई कश्मीरी पढ़ रहा है तो उसी जगह उसके बच्चे का दाखिला हो।

खैर, असर यही हुआ कि कश्मीरी बच्चों को विशेष वजीफा मिलता रहा। लेकिन दिल्ली में सरकार बदली तो झटके में उन्हीं अधिकारियों ने उन्हीं नियमों को कड़ा कर दिया जिन नियमो को कश्मीरी नजरिए से लचीला किया गया था। फिर दिल्ली तो दिल्ली है। उसका नजरिया तो दस्तावेज पर दर्ज नीतियों के आसरे चलता है। 2014 में झटके में मानव संसाधन मंत्रालय ने कश्मीरी बच्चों के वजीफे पर रोक, यह कहते हुए लगा दी कि हर संस्थान को सिर्फ दो बच्चों के लिए ट्यूशन फीस और हॉस्टल फीस दी जाएगी।
अब सवाल था कि 2013 में जो चार हजार बच्चे घाटी से निकल कर देश के 25 संस्थानों में पढ़ाई कर रहे थे, उनमें से सिर्फ 50 बच्चों को ही विशेष वजीफा मिलता। बाकी बच्चों का क्या होगा। जिन हालात से निकल कर घाटी के बच्चे शहरों तक पहुंचे थे, उनके सामने दोहरा संकट आ गया। एक तरफ पढ़ाई शुरू हो चुकी है तो दूसरी तरफ कॉलेज संस्थानों ने बताया कि सरकार उनकी ट्यूशन फीस और हॉस्टल फीस नहीं दे रही है। तो बच्चे क्या करें? शिक्षण संस्थानों ने मानव संसाधन मंत्रालय का दरवाजा खटखटाया। लेकिन मंत्री से लेकर बाबू तक ने जवाब यही दिया कि नियम तो नियम है।

कॉलेजो के सामने मुश्किल यह आ गई कि बच्चों की पढ़ाई सिर्फ स्नातक की थी। सरकार ने ढाई सौ बच्चो को इंजीनियरिंग और ढाई सौ बच्चों को मेडिकल कोर्स करने का भी वजीफा देने की बात कही थी। तो जो बच्चे इंजीनियरिंग और मेडिकल कर रहे थे, अब वे क्या करें? हालांकि किसी शिक्षण संस्थान से अभी तक कोई बच्चा निकाला तो नहीं गया है। लेकिन 15 दिन पहले अलग-अलग कॉलेज और विश्वविद्यालयों के जरिए शिक्षा सचिव मोहंती और मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी को जो चिट्ठी सौंपी गई, उसने कॉलेज प्रबंधन के इस संकट को उभार दिया है कि अगर बच्चों की ट्यूशन फीस और हॉस्टल फीस का भुगतान नहीं होता है तो कश्मीरी बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाएगी।

खास बात यह है कि इन सबके बीच मानव संसाधन मंत्रालय ने तय किया कि वह खुद इस बार श्रीनगर में घाटी के बच्चों के रजिस्ट्रेशन के लिए कैंप लगाएगा। कैंप झेलम में आई बाढ़ से पहले लगाया गया। कैंप में बच्चों के साथ मां-बाप भी पहुंचे। अधिकतर मां-बाप ने उन्हीं कॉलेजों में बच्चों को भेजना चाहा, जहां पहले से कोई कश्मीरी बच्चा पढ़ रहा था। लेकिन अधिकारियों ने साफ कहा, हर कॉलेज में सिर्फ दो ही बच्चों का रजिस्ट्रेशन होगा। यानी एक साथ, एक जगह रजिस्ट्रेशन कराने पर वजीफा नहीं मिलेगा।

अधिकारियों ने तमाम कॉलेज प्रबंधन को कहा कि नियम कहता है कि एक साथ, एक जगह कश्मीरियों को पढ़ाया नहीं जा सकता। मौखिक तौर पर यह साफ कहा कि कश्मीरी बच्चे एक जगह पढंÞेगे तो कानून-व्यवस्था का मामला खड़ा हो सकता है। इस समझ का असर यह हुआ कि घाटी से देश के अलग-अलग हिस्सों में जाने वाले बच्चों की तादाद पुराने हालात में लौट आई। सौ से कम रजिस्ट्रेशन हुए। 2014 में समूची घाटी से सिर्फ 2300 बच्चे ही पढ़ाई के लिए निकले हैं। लेकिन इनमें पैसे वाले भी हैं। यानी घाटी के गरीब परिवारों के सामने का वह संकट फिर आ खड़ा हुआ कि अगर बच्चे तालीम के लिए कश्मीर से बाहर नहीं निकले तो फिर दुबारा उसी आतंक के साए में खुद को न खो दें जिसे 1990 के बाद से लगातार कश्मीर ने देखा-भोगा है।

बीते पांच बरस में दिल्ली की पहल पर करीब दस हजार बच्चे पढ़ाई के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचे। अब दिल्ली की ही नीतियों की वजह से अगर उनमें साढ़े चार हजार बच्चों को पढ़ाई बीच में छोड़कर घाटी लौटना पड़ गया तो फिर सवाल प्रधानमंत्री मोदी के साथ राज्य के मुख्यमंत्री बनने जा रहे मुफ्ती मोहम्मद सईद के हाथ मिलाने भर का नहीं होगा। सवाल हाथ मिलाने के बावजूद दिलों के टूटने का होगा।

 

पुण्य प्रसून वाजपेयी

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