भारत को आजाद कराने में कई क्रांतिकारी युवाओं ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। हर साल 15 अगस्त को जब हम आजादी का जश्न मनाते हैं तो भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद और सुभाष चंद्र बोस जैसे महान क्रांतिकारी युवाओं को जरूर याद करते हैं, लेकिन कई क्रांतिकारी युवा ऐसे हैं जिन्होंने भगत सिंह जैसा ही बलिदान देश के लिए दिया, लेकिन गुमनामी में चले गए। उन्हें बहुत ही कम भारतवासी जानते हैं। ऐसे ही गुमनामों में से एक हैं करतार सिंह सराभा जिन्हें पंजाब के बाहर बहुत कम लोग जानते होंगे।

करतार सिंह सराभा का जन्म पंजाब के लुधियाना में 24 मई 1896 को एक जाट सिख किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम मंगल सिंह और माता का नाम साहिब कौर था। बचपन में ही उन्होंने अपने पिता को खो दिया था जिसके बाद उनका पालन पोषण उनके दादा ने किया। गांव की पाठशाला में उन्होंने शुरुआती पढ़ाई की। इसके बाद लुधियाना के मालवा खालसा हाई स्कूल में अपनी स्कूलिंग पूरी की।

अमेरिका में प्राप्त की उच्च शिक्षा

स्कूलिंग पूरी करने के बाद करतार सिंह सराभा उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए अमेरिका चले गए। सैन फ्रांसिस्को में बर्कले यूनिवर्सिटी में उच्च शिक्षा ग्रहण की। वहां पढ़ाई के दौरान उन्होंने भारतीय प्रवासियों के साथ होने वाले भेदभाव को देखा और अप्रैल 1913 में गदर पार्टी का गठन किया। इसी नाम से एक वीकली अखबार निकाला गया। इस अखबार की कमान करतार सिंह को ही सौंप दी गई।

करतार सिंह के अंदर आजादी की पहली लौ कब जली?

अमेरिका में भारतीयों के साथ होने वाले नस्लीय भेदभाव को देखकर उन्हें अंग्रेजों से नफरत होने लगी और यहीं से उनके अंदर आजादी की लौ जगी। अमेरिका में रहते हुए करतार सिंह की मुलाकात लाला हरदयाल से हुई। वह वहां पहले से ही अमेरिका में रहकर ही भारत को आजादी दिलाने के लिए अभियान चला रहे थे। हरदयाल ने अपने अभियान में करतार सिंह को भी जोड़ लिया।

भारत आकर अंग्रेजों के खिलाफ छेड़ा विद्रोह

प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के समय करतार सिंह हिंदुस्तान लौट आए और लुधियाना में एक पार्टी का गठन किया। इसमें सभी क्रांतिकारियों ने हिस्सा लिया। यहां के सुझाव पर रास बिहारी बोस पंजाब आकर क्रांतिकारियों के संगठन के अगुआ बन गए। इसके बाद अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह छेड़ दिया गया। 21 फरवरी 1915 को विद्रोह की तारीख तय की गई थी, लेकिन किसी गद्दार ने उनकी योजना की जानकारी अंग्रेजों को दे दी। इसके बाद अंग्रेजों ने बहुत खोजबीन के बाद करतार सिंह को गिरफ्तार कर लिया।

महज 19 साल की उम्र में दी गई फांसी

करतार सिंह के साथ-साथ 24 क्रांतिकारी गिरफ्तार किए गए। उन सभी के खिलाफ राजद्रोह, डकैती और कत्ल का मुकदमा चलाया गया। कोर्ट ने करतार सिंह समेत सभी क्रांतिकारियों को खतरनाक विद्रोही मानते हुए फांसी की सजा सुनाई। करतार सिंह और 6 क्रांतिकारियों को 16 नवंबर 1915 को फांसी दी गई। जिस वक्त करतार सिंह को फांसी दी गई, उस वक्त वह महज 19 साल के थे।

भगत सिंह ने माना था अपना गुरु

करतार सिंह सराबा को भगत सिंह अपना हीरो मानते थे। जिसका जिक्र खुद भगत सिंह की मां विद्यावती ने किया था। उन्होंने बताया था कि, जब भगत सिंह को गिरफ्तार किया गया था, उस वक्त उनके जेब से शहीद करतार सिंह की तस्वीर निकली थी। भगत सिंह ने करतार सिंह की फोटो अपनी मां को दिखाते हुए कहा था कि, यह मेरे हीरो हैं।

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भारत को आजादी दिलाने में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन लंबे समय तक चला था। अभी तक आजादी से जुड़े एक से बढ़कर एक किस्से आपने सुने होंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं 1920 के दशक में बर्लिन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े क्रांतिकारियों और दूसरे देशों के साम्राज्यवाद-विरोधी नेताओं का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। यहां पढ़ें पूरी खबर…