कर्नाटक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और राज्य सरकार की ओर से स्थायी निवास प्रमाणपत्र (पीआरसी) जारी करने के फैसले को लेकर सियासी टकराव बढ़ गया है। भारतीय जनता पार्टी जहां कांग्रेस सरकार पर पीआरसी के जरिए अपने वोट बैंक को बचाने का आरोप लगा रही है, वहीं सत्तारूढ़ कांग्रेस इसे पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा का प्रयास बता रही है। इसी बीच कांग्रेस ने एसआईआर अभियान को संगठन विस्तार और जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने का बड़ा अवसर भी बना लिया है।
मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही सप्ताह बाद डी.के. शिवकुमार ने 21 जून को कांग्रेस के एक सम्मेलन में कहा था कि दूसरे राज्यों में एसआईआर के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। उन्होंने कहा, “हमारे राज्य में होने वाला एसआईआर हमारे लिए खतरा भी है और अवसर भी। इसलिए हर कार्यकर्ता को लोगों के मतदान के अधिकार की रक्षा करनी होगी।”
हाल ही में कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) के अध्यक्ष बने बी.के. हरिप्रसाद ने इस पूरी प्रक्रिया को “दूसरा स्वतंत्रता आंदोलन” बताया। उनका कहना है कि किसी भी पात्र मतदाता का मतदान का अधिकार नहीं छिनना चाहिए।
पिछले एक महीने में, जब कर्नाटक में एसआईआर की प्रक्रिया शुरू हुई, तब कांग्रेस ने इसे केवल चुनावी प्रक्रिया न मानकर संगठन निर्माण का अभियान बना दिया। दूसरी ओर भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) इस मामले में अपेक्षाकृत पीछे दिखाई दिए।
कांग्रेस ने पहली बार राज्यभर में 54 हजार से अधिक बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) नियुक्त किए। इन एजेंटों का काम मतदाताओं का पंजीकरण कराना, लोगों की मदद करना और पार्टी का जमीनी नेटवर्क मजबूत करना है। इसके अलावा बड़े पैमाने पर नामांकन शिविर लगाए गए। राज्य सरकार ने भी पीआरसी जारी करने की व्यवस्था शुरू की, जो पहले पेशेवर शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए दिए जाने वाले डोमिसाइल प्रमाणपत्र की तर्ज पर है।
कांग्रेस लगातार यह संदेश भी दे रही है कि यदि लोग एसआईआर की प्रक्रिया पूरी नहीं करेंगे तो भविष्य में उन्हें सरकार की गारंटी योजनाओं का लाभ मिलने में परेशानी हो सकती है।
कर्नाटक में इससे पहले मतदाता सूची का ऐसा व्यापक पुनरीक्षण वर्ष 2002 में हुआ था। इस बार एसआईआर के पहले चरण में 5.08 करोड़ मतदाताओं का मिलान 2002 की सूची से किया गया, जबकि करीब 46.5 लाख मतदाता अलग रहे। चुनाव आयोग ने बुधवार को एसआईआर की अवधि दो सप्ताह बढ़ाकर गणना की अंतिम तिथि 8 अगस्त कर दी। प्रारूप मतदाता सूची 17 अगस्त को प्रकाशित होगी, 16 सितंबर तक आपत्तियां दर्ज कराई जा सकेंगी और अंतिम मतदाता सूची 19 अक्टूबर को जारी होगी।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी वी. अंबुकुमार ने 8 जुलाई को कहा कि एसआईआर की पूरी प्रक्रिया चुनाव आयोग के निर्देशों के अनुसार ही कराई जा रही है।
कांग्रेस सक्रिय, भाजपा का विरोध
जून से ही कांग्रेस ने अपने विधायकों और कार्यकर्ताओं को प्रत्येक पात्र मतदाता का नाम दर्ज कराने के लिए मैदान में उतार दिया। मतदाताओं को गणना प्रपत्र भरने में सहायता देने के लिए शिविर लगाए गए। इसके साथ ही 29 जून को राज्य सरकार ने राजस्व विभाग के माध्यम से पीआरसी जारी करने की घोषणा की।
भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस पीआरसी के जरिए अवैध घुसपैठियों और अपने समर्थकों को बचाने की कोशिश कर रही है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र ने इसे शिवकुमार सरकार की “चालाक रणनीति” बताया।
हालांकि कांग्रेस का कहना है कि वह केवल ऐसा दस्तावेज उपलब्ध करा रही है जिसे चुनाव आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया में मान्यता दी है। चुनाव आयोग ने पीआरसी को उन 12 दस्तावेजों में शामिल किया है जिनके आधार पर मतदाता या उसके माता-पिता के जन्म स्थान और जन्म तिथि का सत्यापन किया जा सकता है।
29 जून के सरकारी आदेश में कहा गया है कि पीआरसी और डोमिसाइल प्रमाणपत्र जारी करने के लिए एक समान, पारदर्शी और कानूनी व्यवस्था बनाई जा रही है। प्रमाणपत्र तभी मिलेगा जब जांच के बाद स्थानीय अधिकारी यह संतुष्ट हों कि आवेदक वास्तव में कर्नाटक का स्थायी निवासी है। इसके लिए कर्नाटक में जन्म, माता-पिता या अभिभावकों का कम से कम 10 वर्ष का निवास, राज्य में 10 वर्ष की पढ़ाई, आवासीय संपत्ति का स्वामित्व या मतदाता सूची, आधार, राशन कार्ड और भूमि अभिलेख जैसे सरकारी दस्तावेज आधार बन सकते हैं।
8 जुलाई को केंद्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर पीआरसी व्यवस्था को रोकने के लिए हस्तक्षेप की मांग की।
इस पर हरिप्रसाद ने भाजपा पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के तहत 30 लाख लोगों की पहचान हुई थी, जिनमें 21 लाख हिंदू थे। उनके अनुसार, भाजपा ने वहां यह प्रक्रिया छोड़ दी और अब राजनीतिक लाभ के लिए बांग्लादेशियों का मुद्दा उठा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा असली भारतीय मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर करने की कोशिश कर रही है। उधर, एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने भी तेलंगाना में इसी तरह की पीआरसी व्यवस्था लागू करने की मांग की है।
नामांकन शिविरों पर भी विवाद
कांग्रेस सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर लगाए जा रहे मतदाता नामांकन शिविर भी विवाद का विषय बन गए हैं। भाजपा और जेडी(एस) ने चुनाव आयोग से शिकायत की है कि बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) घर-घर जाकर सत्यापन करने के बजाय सार्वजनिक स्थानों पर ही फॉर्म बांट और जमा कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी का कहना है कि एसआईआर के नियमों के अनुसार प्रत्येक घर का व्यक्तिगत सत्यापन जरूरी है।
कांग्रेस का जवाब है कि चुनाव आयोग ने सार्वजनिक स्थानों पर भी फॉर्म भरने की अनुमति दी है। हरिप्रसाद ने कहा कि कई बीएलओ झुग्गी क्षेत्रों तक नहीं पहुंच पाए, इसलिए सामुदायिक भवनों, मस्जिदों और मंदिरों में शिविर लगाए गए ताकि गरीब और अशिक्षित लोगों को सुविधा मिल सके।
14 जुलाई को कांग्रेस प्रवक्ता रमेश बाबू ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर एसआईआर सहायता केंद्रों की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रक्रिया शुरू होने के दो सप्ताह बाद भी आधे से कम फॉर्म वितरित हुए हैं और सहायता केंद्रों की संख्या पर्याप्त नहीं है। पत्र में कहा गया कि प्रशासनिक कमियां नागरिकों के मतदान अधिकारों को प्रभावित नहीं कर सकतीं। साथ ही मुख्य निर्वाचन अधिकारी के 37,464 मतदाता सहायता केंद्र और 11,856 बीएलओ सहायता केंद्र स्थापित होने के दावे को भी गलत बताया गया।
कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने की कोशिश
कांग्रेस मतदाताओं को यह भी समझा रही है कि भविष्य में मतदाता पंजीकरण का संबंध सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से हो सकता है, जैसा कुछ भाजपा शासित राज्यों में घोषित किया गया है। शिवकुमार लोगों से कह रहे हैं कि जिनके पास मतदाता अधिकार नहीं होगा, उन्हें भविष्य में अवसर, सरकारी गारंटी योजनाएं या पेंशन जैसी सुविधाएं मिलने में कठिनाई आ सकती है।
राज्य के मंत्री एम.बी. पाटिल ने पार्टी बैठकों में दावा किया कि भाजपा एसआईआर के जरिए राज्य की 224 विधानसभा सीटों में से लगभग 100 सीटों का चुनावी समीकरण बदलना चाहती है।
कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष जी.सी. चंद्रशेखर ने बताया कि इसी आशंका को देखते हुए पिछले एक वर्ष में 54 हजार बीएलए नियुक्त किए गए। ये एजेंट कांग्रेस की गारंटी समितियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। राज्य की लगभग 7 हजार ग्राम पंचायतों और 4 हजार नगर वार्डों में पांच-पांच सदस्यों की समितियां बनाई गई हैं। इसके अलावा तालुक और जिला स्तर पर भी समितियां सक्रिय हैं।
उधर, पार्टी के भीतर तैयारियों को लेकर उठी चिंताओं के बाद भाजपा ने भी बीएलए की नियुक्तियां तेज कर दी हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार, अब भाजपा के पास कांग्रेस की तुलना में केवल लगभग 3 हजार बीएलए कम रह गए हैं।
यह भी पढ़ें: नए वोटरों से मांगी जाएगी माता-पिता के SIR जानकारी, चुनाव आयोग का नया नियम क्या है?
भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के ऑनलाइन वोटर रजिस्ट्रेशन पोर्टल ECINET में अब आवेदकों के लिए बदलाव किया गया है। नई वोटर लिस्ट के लिए जारी स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) में अपने माता-पिता की स्थिति का विवरण भी आवेदक को देना होगा। इसमें पोलिंग बूथ नंबर और उस रोल पर मतदाता का सीरियल नंबर भी शामिल है। हालांकि नए पंजीकरण के लिए कानूनी फॉर्म (Form 6) में अभी तक कानून द्वारा तय प्रक्रिया के तहत बदलाव नहीं किया गया है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
