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अद्भुत: हिन्दू लिंगायत मठ का प्रमुख बनेगा 33 साल का मुस्लिम युवा

मठ प्रमुख ने कहा कि 10 नवंबर, 2019 को शारिफ ने 'दीक्षा' ली। हमने उसे पिछले तीन वर्षों में लिंगायत धर्म और बासवन्ना की शिक्षाओं के विभिन्न पहलुओं पर प्रशिक्षित किया है।

लिंगायतवाद की परंपरा 12 वीं शताब्दी के कर्नाटक में समाज सुधारक और दार्शनिक बासवन्ना द्वारा स्थापित की गई थी। (Wikimedia Commons)

उत्तर-कर्नाटक के गडग जिले में स्थित एक लिंगायत मठ ने मुस्लिम युवक को अपना प्रमुख बनाने की तैयारी में है। 26 फरवरी को 33 साल को हो रहे दीवान शारिफ रहमानसब मुल्ला ने कहा कि वह बचपन से ही 12 वीं शताब्दी के समाज सुधारक बसवन्ना की शिक्षाओं से प्रभावित थे। वे सामाजिक न्याय और सद्भाव के अपने आदर्शों को आगे बढ़ाने की दिशा में काम करेंगे।

टीओआई की रिपोर्ट के अनुसार, यह लिंगायत मठ गडग जिले के आसुती गांव में है और इसका नाम मुरुगराजेंद्र कोरानेश्वरा शांतिधाम मठ है। यह कलुरुरागी के खजूरी गांव में स्थित 350 साल पुराने कोरानेश्वर संस्थान मठ से जुड़ा हुआ है। चित्रदुर्ग के श्री जगद्गुरु मुरुगराजेंद्र के 361 मठों में उनकी रैंक है। कर्नाटक और महाराष्ट्र के अलावा इस मठ के लाखों अनुयायी हैं। शारिफ आसुती गांव स्थित मठ के प्रमुख बनेंगे।

खजूरी मठ के प्रमुख मुरुगराजेंद्र कोरानेश्वर शिवयोगी ने कहा, “बसवा के दर्शन यूनिवर्सल हैं और हम सभी जाति और धर्म के अनुयायियों को गले लगाते हैं। उन्होंने 12 वीं शताब्दी में सामाजिक न्याय और सद्भाव का सपना देखा था और उनकी शिक्षाओं का अनुसरण करते हुए मठ ने सभी के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं।”

आसुति में शिवयोगी के प्रवचनों से प्रभावित होकर शारिफ के पिता स्वर्गीय रहिमनसब मुल्ला ने गांव में एक मठ स्थापित करने के लिए दो एकड़ जमीन दान की थी। शिवयोगी ने कहा कि असुति मठ अब 2-3 साल से काम कर रही है और परिसर का निर्माण जारी है।

मठ प्रमुख ने कहा, ” शारिफ बसवा के दर्शन के लिए समर्पित है और उन सिद्धांतों पर चल रहा है। उसके पिता भी एक सच्चे अनुयायी थे और उन्होंने हमसे ‘लिंगा दीक्षा’ प्राप्त किया था। 10 नवंबर, 2019 को शारिफ ने ‘दीक्षा’ ली। हमने उसे पिछले तीन वर्षों में लिंगायत धर्म और बासवन्ना की शिक्षाओं के विभिन्न पहलुओं पर प्रशिक्षित किया है।”

शारिफ ने कहा कि वह बचपन से ही बसवा की शिक्षाओं के प्रति आकर्षित थे। उन्होंने कहा, “मैंने पड़ोस के मेनासगी गांव में आटा चक्की चलाया और अपने खाली समय में बसवन्ना और 12 वीं शताब्दी के अन्य भगवान शिव के अन्य साधकों द्वारा लिखे गए वचनों को लोगों के बीच सुनाया। मुरुगराजेंद्र स्वामीजी ने मेरी छोटी सेवा को पहचान लिया और मुझे अपने सानिध्य में ले लिया। मैं बसवन्ना और मेरे गुरु द्वारा बताए गए रास्ते पर आगे बढ़ूंगा।”

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