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कर्नाटक चुनाव हारी तो सूनामी जैसी भयानक हो जाएगी बीजेपी की बगावत!

2014 में जब फिर एंटी करप्शन मुहिम में बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए की व्यापक जीत हुई और केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनी तब कहा जाने लगा कि अब 15 सालों तक कोई उन्हें हिला नहीं सकता लेकिन चार साल के अंदर ही सरकार और पार्टी दोनों के अंदरखाने बेचैनी है।

दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय में बीजेपी संसदीय दल की मीटिंग में पीएम नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह (फोटो- पीटीआई 23-03-18)

दिनेश त्रिवेदी

तीन दशक तक सक्रिय राजनीतिक जीवन में मैंने एक बात सीखी है कि कभी भी राजनीतिक भविष्य की भविष्यवाणी की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर 1977 में जब मोरारजी देसाई की पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी, तब किसी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि देश की सबसे बड़ी राजनीतिक हस्ती प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को छोटे से राजनीतिक कद के शख्स राजनारायण के हाथों इस तरह हार का मुंह देखना पड़ेगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ जय प्रकाश नारायण द्वारा शुरू किए गए आंदोलन के बाद ही 1977 में केंद्र में जनता दल की सरकार बन सकी थी। इसी आंदोलन ने बाबू जगजीवन राम, अटल बिहारी वाजपेयी, चौधरी चरण सिंह, जॉर्ज फर्नांडीस जैसे नेताओं का सितारा बुलंद किया। लेकिन दो साल बाद ही चौधरी चरण सिंह की सरकार के साथ ही गैर कांग्रेसी सरकार का पतन अंतर्विरोधों के चलते हो गया। 1980 में जब लोग यह सोच रहे थे कि अब इंदिरा गांधी की वापसी नहीं होगी तब कांग्रेस ने 350 सीटें जीतते हुए सत्ता में जबर्दस्त वापसी की थी और जनता दल मात्र 31 सीटों पर सिमट गया था।

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साल 1989 में भी ऐसी ही स्थितियां पनपी थीं जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी बोफोर्स घोटाले में फंसे तब एंटी करप्शन मूवमेंट की वजह से केंद्र में दूसरी बार गैर कांग्रेसी सरकार वीपी सिंह के नेतृत्व में बनी। इस सरकार को बीजेपी का भी समर्थन हासिल था, पर दो साल बाद फिर से कांग्रेस सत्ता में लौटी। जन मोर्चा की इस सरकार में भी चौधरी देवीलाल, अरुण नेहरू, मुफ्ती मोहम्मद सईद, मधु दंडवते, आरिफ मोहम्मद खान, जॉर्ज फर्नांडीस, पी. उपेन्द्र, आई के गुजराल जैसे नेताओं की भविष्य निखरा मगर अंतर्विरोधों के चलते उनकी सरकार गिर गई।

इसी तरह पश्चिम बंगाल में भी किसी ने कल्पना नहीं की थी कि साल 2011 में अकेली ममता बनर्जी सीपीआईएम की बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार को पदच्यूत कर देंगी। पांच साल पहले ही 2006 में सीपीआईएम ने यहां जबर्दस्त जीत का परचम लहराया था। हालात ऐसे बदले कि सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य अपनी सीट जादवपुर भी नहीं बचा पाए और उन्हें अपनी ही सरकार में रहे पूर्व मुख्य सचिव मनीष गुप्ता द्वारा हार का सामना करना पड़ा था। इससे पहले कहा जाता था कि बंगाल अभेद्य किला है मगर वहां भी राजनीतिक मिथक टूटे।

साल 2014 में जब फिर एंटी करप्शन मुहिम में बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए की व्यापक जीत हुई और केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनी तब कहा जाने लगा कि अब 15 सालों तक कोई उन्हें हिला नहीं सकता लेकिन चार साल के अंदर ही सरकार और पार्टी दोनों के अंदरखाने बेचैनी है। सरकार तो संसद तक नहीं चलवा सकी और इसका दोष कांग्रेस के माथे मढ़ दिया।

मैं फिर कहता हूं कि कभी भी राजनीतिक भविष्यवाणी की कोशिश नहीं करनी चाहिए। हालांकि, राजनीति की घड़ी खुद 360 डिग्री पर घूमती है। आज की मोदी सरकार की ही तरह 1989 के चुनावों में भी कांग्रेस देशभक्ति की बात करती थी और प्रिंट मीडिया में बड़े-बड़े इश्तहार छपवाती थी “मेरी धड़कन हिन्दुस्तान’। उस वक्त विपक्ष के खिलाफ कांग्रेस नकारात्मक प्रचार करती थी और विपक्ष को सांप, बिच्छू, बेबी डॉल और लड़ता हुआ मुर्गा कहती थी। उस वक्त बीजेपी विपक्ष का ताकतवर और अहम हिस्सा थी। आज बीजेपी विपक्ष के लिए उसी तरह से सांप-बिच्छू, कुत्ते-बिल्ली का शब्द का इस्तेमाल कर उसे नजरअंदाज करना चाहती है।

तो इस कहानी का नैतिक सार यह है कि कभी भी चुनावी नतीजों की भविष्यवाणी नहीं करनी चाहिए। अगर कांग्रेस दोबारा कर्नाटक विधान सभा का चुनाव जीतने में सफल रहती है तो बीजेपी में बड़ी बगावत होगी। यह बगावत सुनामी तूफान जैसा होगा और बगावत करने वालों में वे लोग शामिल होंगे जिन्होंने 2014 में जीत के लिए पार्टी का दामन थामा था। ऐसे लोगों को किसी भी पार्टी या विचारधारा से कोई मतलब नहीं होता है, वे बस हर हाल में जीतना जानते हैं। बीजेपी में दलित सांसदों के विद्रोह और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा किए गए वादों को पूरा नहीं करने के बाद जन मानस के बीच उपजे मनोभाव इसी तरफ इशारा कर रहे हैं। जब सत्ताधारी दल से जनता को निराशा हाथ लगती है तो आम आदमी एकजुट होकर सरकार के विरोध में अपना मत डालता है, बिना यह सोचे-समझे और जाने-बुझे कि उसके वोट से किन्हें फायदा हो सकता है। ऐसे समय में आम आदमी सत्ताधारी दल को सिर्फ सबक सिखाना चाहता है। यानी एक बात फिर साबित हुई है कि आप चाहे जैसे भी सत्ता हासिल कर लें लेकिन जनता का भरोसा जीतना आपके लिए बहुत जरूरी है।

बीजेपी के अंदरखाने सबकुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है और बीजेपी के अंदरखाने से ज्यादा एनडीए दलों के अंदर बेचैनी है। बीजेपी के सहयोगी दल बदलते मौसम का रुख भांपने की कोशिश में हैं। बदलते मौसम को भांपने की कला में एनडीए के सहयोगी दल लोजपा के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान तथाकथित तौर पर माहिर हैं। दलित मुद्दे पर पासवान सरकारी रुख से नाराज हैं।  एनडीए के अन्य घटक दल पहले ही बीजेपी को झटका दे चुके हैं। इनमें शिव सेना और टीडीपी प्रमुख हैं। अब पूरी दुनिया की निगाह कर्नाटक विधान सभा चुनाव पर टिकी है। कर्नाटक एक राजनीतिक तोता है। राजा की जान इस तोते में बसती है। अगर तोता की जान बचेगी तो राजा सकुशल रहेंगे, अन्यथा कुछ भी संभव है। हालांकि, कर्नाटक का फैसला मई के बीच में आएगा लेकिन मैं फिर कहता हूं, जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा था कि भारतीय राजनीति की भविष्यवाणी की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

(लेखक, दिनेश त्रिवेदी, पश्चिम बंगाल के बैरकपुर से तृणमूल कांग्रेस के सांसद हैं)

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