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कर्नाटक चुनाव का बजा बिगुल: लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा है बड़ा दांव, ये चार मुद्दे भी रहेंगे हावी

Karnataka Election 2018 Date (कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018): 224 सदस्यों वाले कर्नाटक विधानसभा की करीब 100 सीटें ऐसी हैं, जहां लिंगायत समुदाय का प्रभाव है।

Author March 27, 2018 6:16 PM
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और बीजेपी के सीएम उम्मीदवार बी एस येदुरप्पा।

कर्नाटक में विधान सभा चुनाव की तारीखों का एलान हो चुका है। इसके साथ ही राज्य में आदर्श चुनावी आचारसंहिता भी लागू हो गई है लेकिन कांग्रेस ने इससे पहले ही मास्टरस्ट्रोक जड़ दिया है। राज्य की करीब 21 फीसदी आबादी वाले लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देकर कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार ने केंद्र की बीजेपी सरकार को मुश्किल में डाल दिया है। कांग्रेस को इस राजनीतिक बाजी का न सिर्फ हाल के चुनावों में फायदा हो सकता है बल्कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में भी पार्टी इस मुद्दे को बीजेपी के खिलाफ भुना सकती है। बता दें कि 224 सदस्यों वाले कर्नाटक विधानसभा की करीब 100 सीटें ऐसी हैं, जहां लिंगायत समुदाय का प्रभाव है।

कांग्रेस के इस कदम से बीजेपी में बेचैनी है क्योंकि माना जाता रहा है कि लिंगायत समुदाय बीजेपी का कोर वोटर है लेकिन धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देकर कांग्रेस ने बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की है। इस मुहिम के बाद लिंगायत समुदाय में कांग्रेस के प्रति नरमी भी बढ़ गई है। लिहाजा, हो सकता है कि इस समुदाय को कुछ वोट झटकने में कांग्रेस सफल हो जाए। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने इसकी गंभीरता को भांपते हुए ही सोमवार को सिद्धगंगा मठ पहुंचकर श्री श्री शिवकुमारा स्वामीजी का आशीर्वाद लिया। दलितों से जुड़े मठों में भी अमित शाह के जाने का कार्यक्रम है। दलित पारंपरिक रूप से कांग्रेस के वोट बैंक रहे हैं। इसलिए अमित शाह कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश में हैं। लिंगायत के अलावा निम्न सियासी मुद्दे भी कर्नाटक चुनाव में अहम रोल अदा कर सकते हैं।

कन्नड़ अस्मिता: कांग्रेस ने राज्य के लिए अलग झंडा की मांग कर भी नई सियासी चाल चली है। कन्नड़ अस्मिता की दिशा में कांग्रेस ने दो कदम आगे बढ़ाते हुए बीजेपी के राष्ट्रवाद के मुकाबले स्थानीय अस्मिता को महत्व दिया है। वैसे भी राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के जुमलों से देशभर में एक तरह की नाराजगी का माहौल है। कांग्रेस ने उसे भी भुनाने की कोशिश की है। इसके अलावा सिद्धारमैया सरकार द्वारा कन्नड़ समर्थकों के खिलाफ दंगों के दौरान दर्ज आपराधिक मुकदमों को वापस लेने की रणनीति भी बीजेपी को भारी पड़ रही है।

कृषि संकट: कर्नाटक में अभी भी जल संकट है लेकिन पिछले सालों की तुलना में इस साल यह संकट कम है क्योंकि इस साल अच्छी बारिश हुई थी। हालांकि, किसानों की खुदकुशी का मसला अभी भी गंभीर बना हुआ है। साल 2013 से 2017 के अप्रैल तक राज्य में 3515 किसानों ने खुदकुशी की है। कांग्रेस के लिए यह चिंता की बात है कि उसके शासनकाल यानी 2015-16 में यह आंकड़ा सबसे अधिक रहा है। राज्य की 60 फीसदी आबादी को रोजगार खेतीबाड़ी से ही मिलती है, इसलिए किसानों का मुद्दा इस चुनाव में भी बहुमत लाने में दोनों दलों के लिए अहम हो सकता है।

भ्रष्टाचार: बीजेपी लगातार आरोप लगाती रही है कि कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार आकंठ भ्रष्टाचार में डुबी हुई है। साथ ही यह भी कहती रही है कि करप्शन में कर्नाटक देश में नंबर वन स्थान पर है लेकिन इस मामले में बीजेपी का दामन भी साफ-सुथरा नहीं रहा है। बीजेपी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार बी एस येदुरप्पा खुद भ्रष्टाचार के आरोपों में सत्ता गंवा बैठे हैं और जेल जा चुके हैं। दूसरे मुख्यमंत्रियों पर भी करप्शन के आरोप जग जाहिर हैं। इनके अलावा हालिया नीरव मोदी द्वारा किए गए पीएनबी घोटाले और अमित शाह के बेटे जय शाह के घोटाले को कांग्रेस चुनावी चासनी में परोसना चाहेगी।

जातीय समीकरण: कर्नाटक चुनावों में इस साल भी कोई लहर नहीं है लेकिन चुनाव में जातीय समीकरण हावी रहेंगे। राज्य में लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय का ही राजनीतिक वर्चस्व रहा है। अमूमन सभी सीएम इन्हीं जातियों से हुए हैं। बावजूद जीत दिलाने में अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग की आबादी की बड़ी भूमिका रही है। इनकी आबादी करीब 32 फीसदी है जो राज्य में सबसे ज्यादा है। लिंगायत 17 फीसदी, वोक्कालिगा 18 फीसदी, अलपसंख्यक भी करीब 17 फीसदी है इनमें मुसलमान अकेले 13 फीसदी है। बी एस येदुरपपा लिंगायत समुदाय से रहे हैं इसलिए बीजेपी का प्रभाव इस पर रहा है। एचडी डेवगौड़ा वोक्कालिगा समुदाय से रहे हैं, इसलिए इस पर उनकी पकड़ रही है। कांग्रेस की पकड़ अल्पसंख्यकों, दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों पर रही है। कांग्रेस लिंगायत, अल्पसंख्यक और दलितों-पिछड़ों के सहारे फिर से सत्ता में वापसी चाहती है, जबकि बीजेपी लिंगायत के साथ-साथ वोक्कालिगा और दलितों-पिछड़ों को हिन्दू अस्मिता के नाम पर लामबंद करना चाहती है।

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