Kargil War Heroes: कारगिल विजय दिवस के मौके पर देश भर में युद्ध के वीरों को याद किया जाता है और द्रास स्थित वॉर मेमोरियल समेत कई जगहों पर उन्हें सम्मानित किया जाता है लेकिन इस ऐतिहासिक संघर्ष के बीच भारतीय सेना के दो जवान धीरे-धीरे सार्वजनिक स्मृति से ओझल हो गए। ऐसी ही एक कहानी लांस नायक जगसीर सिंह और सैपर मोहम्मद आरिफ की।

कारगिल युद्ध समाप्त होने के कुछ ही समय बाद, 17 सितंबर 1999 को उन्हें पाकिस्तानी सुरक्षाबलों ने बंदी बना लिया था। उन्हें लगभग पांच वर्षों तक पाकिस्तान में हिरासत में रखा गया और 9 अगस्त 2004 को वाघा-अटारी सीमा के रास्ते स्वदेश वापस लाया गया।

कैसे पहुंचे थे पाकिस्तान?

दोनों वीरों के पाकिस्तान पहुंचने की कहानी की बात करें तो कारगिल युद्ध औपचारिक रूप से समाप्त हो चुका था और सेना की इकाइयां सीमा पर डी-माइनिंग (सुरंग हटाने) और अपनी चौकियों को मजबूत करने के काम में लगी थीं। 17 सितंबर 1999 को मुश्कोह सेक्टर में चट्टानों को विस्फोट से उड़ाकर रास्ता बनाने के लिए विस्फोटक ले जाने की जिम्मेदारी जगसीर सिंह और मोहम्मद आरिफ को सौंपी गई थी।

काम के दौरान वे गलती से नियंत्रण रेखा (LoC) पार कर गए, जहां पाकिस्तानी सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया। पाकिस्तान ने कभी भी आधिकारिक तौर पर उनके पकड़े जाने की बात स्वीकार नहीं की। इधर भारतीय रिकॉर्ड्स में दोनों सैनिकों को अपनी रेजीमेंट से ‘भगोड़ा’ (Deserter) घोषित कर दिया गया।

एक गलत फैसले से बढ़ीं परिवार की मुश्किलें

रेजीमेंट से उनके नाम हटा दिए गए, वेतन और भत्ते बंद कर दिए गए और उनके गांवों में पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराई गई। इस एक गलत फैसले की वजह से दोनों सैनिकों के परिवारों को समाज में भारी अपमान और मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

पीछे छूटे परिवारों का संघर्ष और त्रासदी

पंजाब के मुक्तसर जिले के कोट भाई गांव के रहने वाले जगसीर सिंह के घर पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उनकी पत्नी जसविंदर कौर और मां छोटू कौर को सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा। उनके पिता गुरदेव सिंह का निधन उनके बेटे की रिहाई का इंतजार करते-करते हो गया।

जगसीर के लापता होने के दो महीने बाद उनकी बेटी कुलदीप कौर का जन्म हुआ, जिसने बरसों तक अपने पिता को नहीं देखा था।

आरिफ को माना गया मृत और भगोड़ा

दूसरी ओर मेरठ के खरखौदा मुंडाली गांव के मोहम्मद आरिफ की कहानी भी उतनी ही दर्दनाक थी। उनकी शादी 24 फरवरी 1999 को गुड़िया से हुई थी और शादी के कुछ हफ्तों बाद ही वे ड्यूटी पर चले गए थे। बेटे के जाने के सदमे में उनकी मां का निधन हो गया। आरिफ को मृत या भगोड़ा मानकर परिवार ने उनकी पत्नी का पुनर्विवाह करा दिया।

रावलपिंडी की जेल में बिताए 4 साल से ज्यादा का समय

दोनों जवानों को करीब चार साल और तीन महीने तक रावलपिंडी की अडियाला सेंट्रल जेल और आईएसआई से जुड़े गुप्त ठिकानों पर रखा गया। शुरुआती दिनों में उनसे कड़ाई से पूछताछ की गई और उन्हें अकेले अंधेरी कोठरियों में बंद रखा गया।

रिहाई के बाद अपने बयानों में दोनों जवानों ने बताया कि लंबे समय तक एक-दूसरे से बात करने की भी अनुमति नहीं थी। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कुल मिलाकर उनके साथ अत्यधिक अमानवीय अत्याचार नहीं किया गया था। इस दौरान उन्होंने जेल में बंद कुछ भारतीय नागरिकों से भी मुलाकात की, जो गलती से सीमा पार कर गए थे।

कूटनीति से मिली आजादी और ‘कलंक’ से मुक्ति

वर्ष 2003-04 में भारत और पाकिस्तान के बीच शुरू हुई शांति वार्ता के दौरान एक बड़ा मोड़ आया। पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (DGMO) ने भारतीय समकक्ष को दोनों जवानों के उनकी हिरासत में होने की जानकारी दी।

इसके बाद मीडिया रिपोर्ट्स में जब दोनों परिवारों की व्यथा और ‘भगोड़े’ के गलत टैग का मुद्दा उठा, तो तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जनरल एन. सी. विज ने सख्त निर्देश जारी किए। सेना ने दोनों जवानों पर लगा ‘भगोड़ा’ का टैग हटा दिया और जून 2004 से उनके सभी सेवा लाभ बहाल कर दिए।

9 अगस्त 2004 को वाघा बॉर्डर पर एक संक्षिप्त समारोह के दौरान पाकिस्तान ने जगसीर सिंह और मोहम्मद आरिफ को भारत को सौंप दिया। इसके बदले भारत ने 2002 में भारतीय सीमा में आए पाकिस्तानी सैनिक सिपाही सलीम अली शाह और तीन आम नागरिकों को रिहा किया।

वतन वापसी और नई जिंदगी की शुरुआत

वतन लौटने के बाद दोनों सैनिकों का चिकित्सकीय परीक्षण हुआ और फिर उन्हें उनके परिवारों से मिलाया गया। जगसीर सिंह ने पहली बार अपनी बेटी को देखा। सेना ने उनके गांवों में सम्मानजनक स्वागत कार्यक्रम आयोजित किए ताकि समाज को यह संदेश दिया जा सके कि वे भगोड़े नहीं, बल्कि कर्तव्य निभाते हुए बंदी बनाए गए थे।

बाद में जगसीर सिंह सेना से नायक के पद से सेवानिवृत्त हुए और पंजाब पुलिस में सेवाएं दीं। वहीं, मोहम्मद आरिफ को अपनी पत्नी के पुनर्विवाह के बाद उत्पन्न हुई जटिल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

युद्ध के इतिहास में इन दोनों सैनिकों का नाम भले ही गुमनाम नायकों की तरह दर्ज हो, लेकिन उनकी कहानी भारत-पाक संघर्ष के बीच प्रशासनिक भूलों और सैनिकों के अटूट धैर्य की एक बड़ी मिसाल है।

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‘वन्दे मातरम’ ब्रिटेन के कोलोनियल शासन के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा का स्वर है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में कहें तो, “वन्दे मातरम स्पष्टतः और निर्विवाद रूप से भारत का प्रमुख राष्ट्रीय गीत है और महान ऐतिहासिक परंपरा है, हमारे स्वतंत्रता संग्राम से इसका निकट का सम्बन्ध रहा है। इसका स्थान सदा बना रहेगा और दूसरा कोई गीत इसे विस्थापित नहीं कर सकता।” ये शब्द जवहारलाल नेहरू ने 1948 में लोक सभा में भाषण देते हुए कहे थे। पढ़िए पूरी खबर…