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करगिल विजय दिवस: 17000 फीट की दुर्गम बर्फीली ऊंचाई पर चढ़कर दुश्मन का किला पलभर में दिया था भेद, सेना ने नाम रखा था ‘शेर शाह’

विक्रम ने अपने दोस्त और साथी अधिकारी, अनुज नैय्यर के साथ मिलकर जबरदस्त लड़ाई लड़ी और दुश्मन को पीछे हटने को मजबूर कर दिया। इस हमले में उन्होंने करीब पांच पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया।

kargil vijay diwas, indian army captain vikram batraविक्रम बत्रा ने 1996 में सीडीएस परीक्षा पास कर आईएमए में दाखिल हुए थे। (फाइल फोटो)

26 जुलाई 2020, आज करगिल विजय दिवस की 21वी वर्षगांठ है। इस मौके पर देश अपने वीर सपूतों को याद कर रहा है। ऐसे में करगिल युद्ध के जाबांज और परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा को कोई कैसे भूल सकता है। करगिल की लड़ाई में विक्रम बत्रा अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए मां भारती के चरणों में शहीद हो गए थे।

करगिल युद्ध जब शुरू हुआ तब विक्रम की यूनिट को वहां जाने का आदेश मिला। उन्होंने 1 जून, 1999 को ड्यूटी के लिए रिपोर्ट किया। 18 दिन बाद, 19 जून, 1999 को उन्हें युद्ध में अपनी पहली बड़ी लड़ाई में प्वाइंट 5140 पर फिर से कब्जा करने का आदेश मिला। दुश्मन को ऊंचाई का फायदा होने के बावजूद, विक्रम और उनके साथियों ने दुश्मन पर  जबरदस्त हमला किया। उन लोगों ने दुश्मन के कैंप को नष्ट दिया गया और उनके सैनिकों को मार गिराया। 13 जेएंडके राइफल्स ने एक निर्णायक जीत हासिल की।

इससे क्षेत्र पर भारत की पकड़ को मजबूत किया। इसके बाद विक्रम को एक और महत्वपूर्ण ऑपरेशन के लिए जाने का आदेश मिला। उन्होंने बेस कैंप से ही अपने घर फोन किया। उनके पिता 20 जून बेटे के उस फोन का भूल नहीं पाते हैं। विक्रम ने अपने चिंतित माता-पिता से कहा कि मैं एक दम फिट हूं, आप चिंता नहीं करें। वह आखिरी बार था जब उन्होंने अपने घर बात की थी।

विक्रम का अगला ऑपरेशन कारगिल के दौरान किए गए सबसे कठिन पर्वतीय युद्ध अभियानों में से एक था। इसमें 17000 फीट ऊंचाई वाले प्वाइंट 4875 पर कब्जा करना था। इस चोटी की बर्फीले ढलानें 80 डिग्री खड़ी थीं। जबकि पाकिस्तानी सैनिक 16000 फीट की ऊंचाई पर तैनात थे। 7 जुलाई की रात, विक्रम और उनके साथियों ने कठिन चढ़ाई शुरू की।

दुश्मन को इस बात की भनक लगी कि दुर्जेय शेर शाह ( यह विक्रम का कोड नाम था) आ गया है। उन्होंने अपने हमले को तेज कर दिया था। उन्होंने ऊपर से मोर्टार और ऑटोमेटिक हथियारों से हमले तेज कर दिए। वे जानते थे कि शेरशाह कौन था।

विक्रम ने अपने दोस्त और साथी अधिकारी, अनुज नैय्यर के साथ मिलकर जबरदस्त लड़ाई लड़ी और दुश्मन को पीछे हटने को मजबूर कर दिया। इस हमले में उन्होंने करीब पांच पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया। इस बीच उनके सीने में गोली लग गई। इसके बाद भी कैप्टन विक्रम बत्रा ने हिम्मत नहीं हारी और दुश्मन को ललकारा। भले ही इस लड़ाई में वह शहीद हो गए लेकिन उन्होंने भारत को इस चोटी पर जीत दिला दी।

युद्ध में उनके साथी, कैप्टन अनुज नैय्यर भी दुश्मन के बंकरों को साफ करते समय शहीद हो गए। विक्रम बत्रा का जन्म हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुआ था। वह अपने माता पिता की जुड़वा संतान में बड़े बेटे थे। उनके पिता गिरधारी लाल बत्रा सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल थे। वह बचपन से पढ़ाई के साथ ही गेम्स में काफी एक्टिव थे। वह नॉर्थ इंडिया के बेस्ट एनसीसी कैडेट भी रहे। कराटे में ग्रीन बेल्ट के साथ ही वह नेशनल लेवल पर टेबल टेनिस भी खेला।

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