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कारगिल विजय दिवस: जान‍िए जांबाजों ने कैसे की थी टाइगर चोटी फतह, रक्षा मंत्री ने जीत से पहले ही कर दी थी घोषणा

नौजवान भारतीय अफसर सौरभ कालिया टाइगर चोटी को दोबारा हासिल करने की कोशिश में ही शहीद हुए थे।

Kargil Vijay Diwas 2018: कारगिल युद्ध में भारत के विजय दिवस पर बेंगलुरु में आयोजित एक कार्यक्रम में शहीदों को श्रद्धांजलि देते देशवासी। (पीटीआई फाइल फोटो)

पाकिस्तान और भारत के बीच हुए कारगिल युद्ध के दौरान टाइगर चोटी वो आखिरी मोर्चा था जिसे भारतीय सैनिकों को फतह करना था। टाइगर चोटी को दोबारा हासिल करने की कहानी अपने आप में काफी रोमांचक हैं। पत्रकार हरिंदर बावेजा ने अपनी किताब में भारत की विजय के इस ऐतिहासिक अध्याय का अंदरूनी ब्योरा दिया है। मई 1999 में शुरू हुआ कारगिल युद्ध जुलाई तक चला। तीन महीनों बाद भारतीय सैनिक टाइगर चोटी पर कब्जा के करीब आ चुके थे। लेकिन आखिरी मंजिल पर पहुंचने से पहले भारतीय सेना में असमंजस की स्थिति पैदा हो गई थी। ऊंचाई पर स्थित टाइगर चोटी की तरफ बढ़ रहे भारतीय जवानों को स्पष्ट निर्देश नहीं मिले थे। श्रीनगर स्थित सैन्य मुख्यालय में भी स्थिति अस्पष्ट थी। सेना प्रमुख वीपी मलिक पोलैंड के दौरे पर थे।

कारगिल ब्रिगेड ने कमांडिंग अफसरों से कहा था, “कुछ चूहे घुस आए हैं उन्हें बाहर भगा दो।” उधर तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज ने घोषणा कर दी थी कि सभी घुसपैठिए 48 घंटे में देश की सीमा से बाहर खदेड़ दिए जाएंगे। लेकिन मोर्चे पर तैनात जवानों और अफसरों को पता था कि कुछ भारी गड़बड़ है। भारतीय गश्ती दल में शामिल नौजवान भारतीय अफसर सौरभ कालिया लौट कर नहीं आए। पाकिस्तानियों ने उनका क्षत-विक्षत शव लौटाया था।  कई अन्य जवान 48 घंटे से घायल पड़े हुए थे। मौसम खराब होने के कारण हेलीकॉप्टर काम नहीं कर पा रहा था। घुसपैठिए ऊंचाई पर थे इसलिए उनकी स्थिति मजबूत थी। उनके सेना अचूक निशाने से गोलाबारी कर रही थीं। भारतीय सैनिकों को समझ में आ चुका था कि ये घुसपैठिए आम आतंकवादी नहीं बल्कि पाकिस्तानी सेना के जवान हैं।

टाइगर चोटी पर कब्जे की लड़ाई कारगिल के दौरान लड़ी गई सबसे कठिन लड़ाइयों में एक थी। अभी टाइगर चोटी पर कब्जे की लड़ाई जारी ही थी कि रक्षा मंत्री जॉर्ज ने भारत की विजय की घोषणा कर दी। टाइगर चोटी को वापस हासिल करने की कोशिश कर रहे 18 ग्रेनेडियर के जवानों को जीत हासिल करने में अभी वक्त था। लेफ्टिनेंट बलवान और कैप्टन सचिन निंबालकर के नेतृत्व में भारतीय जवान जब टाइगर चोटी के करीब 50 मीटर दूर रह गए तो रेडियो से ये सूचना मुख्लाय तक पहुंची। दिल्ली पहुंचने तक 50 मीटर की दूरी “वो टाइगर चोटी पर पहुंच चुके हैं” में बदल चुकी थी। रक्षा मंत्री को पंजाब में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ये सूचना मिली।

जीत हासिल करने से पहले की रात भारतीय सैनिक तीखी ढलान वाली चोटी पर रात भर रस्सी के सहारे चढ़ने की कोशिश करते रहे। भारतीय टुकड़ी में छह सैनिक थे। भारतीय सैनिकों को चोटी पर छह पाकिस्तानी सैनिक दिखे। पाकिस्तानियों ने भी भारतीय जवानों को देख लिया। इन छह जवानों में से केवल एक योगिंदर यादव गोली लगने के बाद बच पाए। बाकी पांच शहीद हो गए। इन जवानों के शहीद होने के बाद निंबालकर की टुकड़ी को टाइगर चोटी पर पहुंचने का बीड़ा उठाया। निंबालकर और उनके साथी  जवान बगैर किसी आवाज से टाइगर चोटी पर पहुंचने में कामयाब रहे। पाकिस्तानी उन्हें देखकर चौंक गए। देखते ही देखते भारतीय जवानों ने सात-आठ पाकिस्तानी बंकरों की शिनाख्त कर ली। टाइगर चोटी पर भारतीय और पाकिस्तानी जवान आमने-सामने थे। अब दुश्मन को ऊंचाई का लाभ नहीं हासिल था। आखिरकार भारतीय जवान पाकिस्तानियों पर भारी पड़े। और टाइगर चोटी पर कुछ ही देर बाद तिरंगा लहराने लगा। वो दिन 26 जुलाई था। उसके बाद से ही भारत हर 26 जुलाई को विजय दिवस मनाता है।

 

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