कारगिल में लाइन ऑफ़ कंट्रोल (LoC) पर आखिरी गांव हुंडुरमान एक बार फिर चर्चा में है। इस गांव के दो बच्चे 20 मार्च को खेलने निकले थे लेकिन वापस नहीं लौटे। 5 वर्षीय ज़ुल्करनैन अली और उनके 6 वर्षीय चचेरे भाई अली अकबर हुंडुरमान में खेलने के लिए निकले थे। दोनों लड़के खेलते समय शिंगो नदी के तेज बहाव वाले पानी में फिसल गए। अकबर की बॉडी एक दिन बाद हुंडुरमान में नदी से बरामद कर ली गई, लेकिन ज़ुल्करनैन का पता नहीं चल सका। शुक्रवार शाम को बॉर्डर पार से एक व्हाट्सएप कॉल में परिवार को बताया गया कि बॉडी को LoC के पार बाल्टिस्तान के गंगानी गांव में बरामद कर लिया गया है और दफना दिया गया है।

डूबकर दो लड़कों की मौत

अकबर के 38 वर्षीय पिता मोहम्मद हुसैन एक सरकारी स्कूल में टीचर हैं। उन्होंने कहा कि ज़ुल्करनैन कभी नदी की तरफ नहीं जाता था। उन्होंने कहा, “वे तीन बच्चे थे- ज़ुल्करनैन, मेरी बहन का बेटा और एक और लड़का, जो काफ़ी बड़ा था। बड़ा लड़का बच गया लेकिन ये दोनों डूब गए।”

कारगिल में यह पहली ऐसी दुखद घटना नहीं है। अल मेहदी स्काउट्स चलाने वाले और शिंगो और सुरू नदियों में लाशों को ढूंढने में मदद करने वाले जाविद अली कहते हैं, “कम से कम 10 से 12 मामले ऐसे हैं जहां हमें लाशें नहीं मिलीं। लाशें तेज़ बहाव में बहकर पाकिस्तान चली जाती हैं। यहां तेज बहने वाली नदियां हैं।” मुझे निजी तौर पर पिछले साल की कई घटनाएं याद हैं। एक कार एक्सीडेंट हुआ था और पांच लोग डूब गए थे। हम सिर्फ़ दो को ही निकाल पाए जबकि तीन लाशें बॉर्डर पार बह गईं। अकसर सोशल मीडिया से ही हमें पता चलता है कि वहां लाशें मिली हैं।

एक्सचेंज पॉइंट खोलने की हो रही मांग

शिंगो नदी द्रास से कारगिल की ओर बहती है और सुरू नदी ज़ांस्कर से कारगिल तक जाती है। ये दोनों नदियां हुंडुरमान के पास मिलती हैं, जिससे बहाव और स्पीड बढ़ जाती है। 2011 की जनगणना के अनुसार हुंडुरमान की आबादी 200 से थोड़ी ज़्यादा है, जो LoC के इस तरफ का आखिरी गांव है। बॉर्डर के उस पार गंगानी नाम का एक और छोटा सा गांव है। 1971 से पहले हुंडुरमान और गंगानी पाकिस्तान के कंट्रोल वाले एक ही गांव का हिस्सा थे। 1971 की लड़ाई में भारत ने हुंडुरमान पर कब्ज़ा कर लिया। दोनों गांवों में ऐसे लोग हैं जो आपस में रिश्तेदार हैं। लाशों को घर भेजने का कोई तरीका न होने की वजह से, कारगिल के लोग हुंडुरमान में एक एक्सचेंज पॉइंट खोलने की मांग कर रहे हैं।

कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के पॉलिटिकल लीडर और एक्टिविस्ट सज्जाद हुसैन कहते हैं, “70 से ज़्यादा सालों से लद्दाख और बाल्टिस्तान के बीच बंटे परिवार फिर से एक नहीं हो पाए हैं। यह अलगाव ज़िंदगी से भी आगे तक फैला हुआ है। जो लोग किसी हादसे की वजह से नदी के उस पार बहकर दूसरी तरफ चले जाते हैं, उनकी लाशें अक्सर कभी अपने वतन वापस नहीं लौट पातीं।”

विदेश मंत्री एस जयशंकर और पाकिस्तानी विदेश मंत्री से सज्जाद हुसैन ने दखल देने की अपील की। उन्होंने कहा, “इन लाशों को उनके परिवारों तक इज्जत से पहुंचाने के लिए एक तय एक्सचेंज पॉइंट बनाया जाना चाहिए।”

ज़ुल्करनैन की लाश 40 दिन बाद मिली और उनके पिता का कहना है कि परिवार ने अपने बच्चे को बाल्टिस्तान में दफ़नाने की मंज़ूरी दे दी थी। उन्होंने कहा, “चालीस दिन बीत चुके थे और उन्होंने हमें बताया कि उसे वहीं दफ़नाना बेहतर होगा। हम मान गए।” ज़ुल्करनैन के पिता कहते हैं, “हमने फ़ोटो भेजी थीं और उन्हें बताया था कि उस दिन उसने क्या कपड़े पहने थे। उन्होंने कहा है कि उन्होंने बॉडी ले ली है और उसे दफ़ना दिया है। लेकिन मैंने अभी तक अंतिम संस्कार की कोई फ़ोटो नहीं देखी है। मैं तस्वीरों का इंतज़ार कर रहा हूं।”

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