13 दिसंबर 2001 की काली तारीख शायद ही भारत कभी भूल पाए। भारत के दुश्मनों ने इस दिन भारतीय लोकतंत्र के मंदिर ‘भारतीय संसद’ पर हमला किया था। इस हमले को अंजाम देने वाले पाकिस्तानी आतंकियों का मकसद देश की टॉप लीडरशिप को खत्म करना था लेकिन संसद परिसर में तैनात वीर पुलिसकर्मियों ने आतंकियों के मंसूबे को पूरा नहीं होने दिया।

इस हमले को अंजाम देने के लिए आए पांचों आतंकवादियों को संसद की सुरक्षा में तैनात CRPF और दिल्ली पुलिस के जवानों ने मार गिराया। हालांकि इस हमले में दिल्ली पुलिस के पांच सिपाही, सीआरपीएफ की एक महिला कांस्टेबल, संसद के दो कर्मचारी और एक वार्ड स्टाफ और एक माली की जान चली गई।

रणबांकुरे के इस पार्ट में हम आपको बताएंगे लोकतंत्र के मंदिर की सुरक्षा में जान देने वाली  CRPF की महिला कांस्टेबल कमलेश कुमारी के बारे में। राष्ट्रपति ने साल 2002 में गणतंत्र दिवस पर कमलेश कुमारी को मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया।

संसद के गेट नंबर एक पर ड्यूटी कर रही थीं कमलेश

सुबह के करीब 11.40 बजे थे, संसद भवन के आयरन गेट नंबर एक पर कमलेश कुमारी तैनात थीं। यहां वह संसद के वॉच एंड वार्ड स्टॉफ की चेकिंग में मदद कर रही थीं। संसद का ऑयरन गेट नंबर एक उन दिनों सभी VVIPs की एंट्री के लिए इस्तेमाल किया जाता था।

कमलेश अपने काम में व्यस्त थीं, तभी एक सफेद एंबेसडर कार ऑयरन गेट नंबर एक से गुजरी। इस गाड़ी पर लाल बत्ती लगी हुई थी। इसके अलावा संसद और गृह मंत्रालय का स्टिकर लगा हुआ था। आमतौर पर गाड़ी पर लाल बत्ती और इन स्टिकरों का मतलब यह होता था कि गाड़ी किसी VVIP की है लेकिन उस दिन कमलेश कुमारी को कुछ अजीब महसूस हुआ।

यह एंबेसडर गाड़ी जैसे ही आयरन गेट नबंर एक से पास हुई, उसने अपनी स्पीड कम करने के बजाय बढ़ा दी। गेट पर खड़ी कमलेश कुमारी (जिसके पास सिर्फ वॉकी-टॉकी था) ने अपनी सुरक्षा की चिंता किए बिना अपने वॉकी-टॉकी के जरिए और चिल्लाकर अन्य सुरक्षाकर्मियों को आतंकियों के बारे में सूचित किया।

इसी दौरान कमलेश कुमारी गेट नंबर 11 पर तैनात कांस्टेबल सुखविंदर सिंह की तरफ दौड़ीं। उनकी तरफ से चिल्ला-चिल्लाकर दी गई जानकारी ने CRPF को तो अलर्ट किया ही, लेकिन दुर्भाग्य से आतंकी भी इस दौरान सचेत हो गए और उन्होंने कमलेश कुमारी पर फायरिंग शुरू कर दी। कमलेश को इस हमले में कुल 11 गोलियां लगी।

हालांकि कमलेश ने देश के लिए सर्वोच्च शहादत देने से पहले अपने हिस्सा की जिम्मेदारी निभा दी थी। कमलेश ने जिन कांस्टेबल सुखविंदर सिंह को आतंकियों के बारे में सूचना दी थी, उन्होंने एक आतंकी का मार गिराया।

अगर कमलेश कुमारी उसी दिन इतनी फुर्ती न दिखातीं तो शायद आतंकवादी बहुत सारी जानें ले लेते। कमलेश और उनके साखियों ने इस आतंकी हमले को संसद भवन की बिल्डिंग के बाहर तक सीमित कर दिया। जिस समय संसद भवन में हमला उस समय वहां लाल कृष्ण आडवाणी और जसवंत सिंह जैसे दिग्गज मौजूद थे। अगर यह आतंकी हमला कामयाब हो जाता तो भारत की राजनीति पर इसका बहुत गहरा असर पड़ता।

यूपी में हुआ था कमलेश कुमारी का जन्म

कमलेश कुमारी का जन्म 30 जून 1969 को कन्नौज जिले के सिंकदरपुर गांव में हुआ।  वह साल 1994 में CRPF में भर्ती हुईं। शुरुआत में उन्हें इलाहाबाद में पोस्टिंग मिलीं। साल 2001 में उनकी पोस्टिंग CRPF की 88वीं बटालियन में हुई। यह बटालियन उस समय संसद की सुरक्षा में तैनात थीं। कमलेश कुमारी अपने पीछे पति अवधेश यादव और दो बेटियों- ज्योति और श्वेता को छोड़ गईं। साल 2002 में गणतंत्र दिवस पर कमलेश कुमारी के पति अवधेश यादव ने राष्ट्रपति से उनका अशोक चक्र प्राप्त किया।

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पढ़िए कहानी महापराक्रमी सूबेदार जोगिंदर सिंह की (Image Source: Chat GPT)

1962 में चीन के साथ हुए युद्ध से पहले सूबेदार जोगिंदर सिंह द्वितीय विश्व युद्ध और 1947-48 के कश्मीर युद्ध में हिस्सा ले चुके थे। अरुणाचल में जोगिंदर सिंह की प्लाटून को बूमला के साथ रणनीतिक पहाड़ी मोर्चे की रक्षा करने की जिम्मेदारी दी गई थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें।