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कमलनाथ सरकार का हेल्थ वर्कर्स को फरमान- कम से कम एक पुरुष की कराओ नसबंदी, वरना गंवानी पड़ेगी नौकरी

राज्य के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) ने शीर्ष जिला अधिकारियों, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों (सीएचएमओ) से 'जीरो वर्क आउटपुट' देने वाले पुरुष स्वास्थ्य कर्मचारियों की पहचान करने को और 'नो वर्क नो पे' सिद्धांत लागू करने को कहा है। हालांकि यह आदेश अब वापस ले लिया गया है।

Author Edited By रवि रंजन भोपाल | Updated: February 21, 2020 3:37 PM
कमलनाथ सरकार ने स्वास्थ्य कर्मचारियों को कम से कम एक पुरुष की नसबंदी कराने का फरमान जारी किया है। (फाइल फोटो)

परिवार नियोजन कार्यक्रम में पुरुषों की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में कदम उठाते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने मेल मल्टी पर्पस हेल्थ वर्कर (MPHWs) को फरमान जारी किया है। फरमान में कहा गया है कि जो भी हेल्थ वर्कर 2019-20 में नसबंदी के लिए एक भी आदमी को जुटाने में विफल रहे, उनका वेतन वापस लिया जाए और उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्त दे दी जाए।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण -4 की रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य में केवल 0.5 प्रतिशत पुरुषों ने ही नसबंदी करवाया है। इसी रिपोर्ट का हवाला देते हुए राज्य के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) ने शीर्ष जिला अधिकारियों, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों (सीएचएमओ) से ‘जीरो वर्क आउटपुट’ देने वाले पुरुष स्वास्थ्य कर्मचारियों की पहचान करने को और ‘नो वर्क नो पे’ सिद्धांत लागू करने को कहा है। साथ ही मिशन यह भी कहा कि अगले महीने (2019-20 साल) के दौरान एक भी पुरुष नसबंदी नहीं करवाने वाले कर्मचारियों के खिलाफ यह सख्त कदम उठाए जाएं।

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11 फरवरी राज्य के एनएचएम मिशन निदेशक द्वारा जारी सर्कुलर में कहा गया है कि अगर स्थिति में सुधार नहीं होता है, तो एमपीएचडब्ल्यू की अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सिफारिश करने वाले प्रस्तावों को जिला कलेक्टरों के माध्यम से भोपाल में एनएचएम मुख्यालय भेजा जाएगा। यहां से इसे आगे की कार्रवाई के लिए स्वास्थ्य निदेशालय भेजा जाएगा। सर्कुलर में कहा गया है कि सभी एमपीएचडब्ल्यू को जिलों में शिविर आयोजित करने पर कम से कम पांच से 10 “इच्छुक लाभार्थियों” को जुटाना चाहिए।

पिछले पांच वर्षों में राज्य में नसबंदी कराने वाले पुरुषों की संख्या लगातार घट रही है। 20 फरवरी 2020 तक 2019-20 साल में सिर्फ 3,397 पुरुषों की नसबंदी हुई। वहीं इस दौरान महिलाओं की संख्या 3.34 लाख रही। साल 2015-16 में 9,957 पुरुषों की नसबंदी हुई थी। वहीं इसके बाद 2016-17 में यह संख्या 7270, 2017-18 में 3,719 और 2018-19 में 2925 रही।

एनएचएम की उप निदेशक डॉ. प्रज्ञा तिवारी के अनुसार, परिवार नियोजन कार्यक्रम में पुरुषों की “लगभग कोई भागीदारी नहीं” है। उन्होंने कहा, “हम यह नहीं कह रहे हैं कि आप पुरुषों की नसबंदी के लिए जबरदस्ती करें। हम चाहते हैं कि वे लोगों को प्रेरित करें। ऐसे कई लोग हैं जो अपने परिवार को सीमित करना चाहते हैं लेकिन उनमें जागरूकता की कमी है। यह उनका काम है। यदि आप पूरे एक वर्ष में एक भी व्यक्ति को प्रेरित नहीं कर सकते हैं तो यह आपकी कार्य के प्रति लापरवाही को दर्शाता है। ऐसे में करदाताओं के पैसे को वेतन पर खर्च करने का क्या फायदा?”

तिवारी ने कहा कि सहायक नर्स दाइयों (एएनएम) के विपरीत एमपीएचडब्ल्यू की निगरानी तब तक नहीं थी जब तक कि उन्होंने पिछले साल अक्टूबर में परिवार नियोजन कार्यक्रम का प्रभार लेने के बाद “अच्छे से निगरानी” शुरू नहीं की। जो अच्छा करते हैं, उन्हें पुरस्कृत किया जाता है।

अपडेट: कमलनाथ सरकार ने अपना यह फैसला वापस ले लिया है। मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलवट ने कहा कि राज्य सरकार ने स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा पुरुष नसबंदी टारगेट को पूरा करने और ऐसा न करने पर कार्रवाई करने के आदेश वापस ले लिया है। इसके साथ ही मध्य प्रदेश सरकार ने आदेश जारी करने वाली राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के राज्य निदेशक छवी भारद्वाज को हटा दिया है और राज्य सचिवालय में स्पेशल ड्यूट ऑफिसर के पद पर तैनात कर दिया है।

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