K.Annamalai Tamil Nadu Politics: तमिलनाडु की रानजीति में कुछ समय से पहले तक चर्चा इस बात पर थी कि क्या के.अन्नामलाई राज्य BJP का उत्थान कर पाएंगे या नहीं। चुनाव नतीजों में बीजेपी की उम्मीदों पर फिर पानी और नई सरकार के गठन के अब सवाल यह है कि क्या अन्नामलाई का मन बीजेपी से उखड़ गया है, और क्या बीजेपी उन्हें कोई बड़ा राजनीतिक मौका देगी या नहीं।
मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि पूर्व आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई ने दिल्ली में बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, यह कदम भावनात्मक रूप से टूटने से कहीं अधिक एक ऐसी योजना का अंतिम परिणाम है जो महीनों से चुपचाप चल रही थी, लेकिन मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय सत्ता में आए।
बीजेपी के लिए क्या है अहमियत
के. अन्नामलाई पिछले 6 साल से बीजेपी के सदस्य हैं और वे पार्टी के महत्वाकांक्षी प्रयोगों वाले नेता माने जाते थे। वे युवा, वाक्पटु, ऊर्जावान, मीडिया के प्रति सजग और प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले थे। उन्हें वह अतिरिक्त लाभ भी प्राप्त था, जो भारतीय राजनीति में अक्सर पूर्व सिविल सेवकों को दिया जाता है। अन्नामलाई एक ऐसे व्यक्ति के आत्मविश्वास से बोलते थे जिसने कभी जिलों और पुलिस बलों की कमान संभाली हो।
नए मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय जिस प्रकार फिल्मों को समझते थे, उसी प्रकार अन्नामलाई फिल्मों, टेलीविजन और पत्रकारों को भी समझते थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि वे यह समझते थे कि तमिलनाडु में पार्टियां नेताओं के लोकप्रिय होने से पहले शायद ही कभी लोकप्रिय होती हैं।
बीजेपी में रहते हुए भी अलग पहचान
बीजेपी के भीतर अन्नामलाई हमेशा कुछ अलग ही नजर आते थे। राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी से जुड़े कई नेताओं के विपरीत, उन्होंने शायद ही कभी सीधे-सीधे धार्मिक ध्रुवीकरण के आधार पर अपनी पहचान बनाई हो। उनके भाषण अक्सर शासन, भ्रष्टाचार, प्रशासन, विकास, तमिल आकांक्षाओं और राजनीतिक सुधारों पर केंद्रित होते थे। यहां तक कि जब वे हिंदुत्व की भाषा का प्रयोग करते थे, तब भी वह अक्सर विशिष्ट तमिल राजनीतिक शब्दावली में लिपटी होती थी।
AIADMK के साथ टकराव
जे जयललिता को एक श्रेष्ठ हिंदुत्व नेता बताने वाले उनके प्रसिद्ध बयान ने उनकी राजनीतिक सूझबूझ और सीमाओं दोनों को उजागर किया। यह बयान द्रविड़ युग की एक महान हस्ती को बीजेपी के नजरिए से देखने का एक प्रयास था लेकिन इसके विपरीत उनके इस बयान ने जयललिता के करीबी सहयोगियों वीके शशिकला और एआईएडीएमके के वरिष्ठ नेताओं के बीच गुस्सा पैदा कर दिया था।
इन नेताओं ने उन पर उस राजनीतिक परंपरा को ही गलत समझने का आरोप लगाया, जिसे वे आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे। इस विवाद ने अन्नामलाई की राजनीति की एक प्रमुख विशेषता को भी उजागर किया। वे अक्सर वैचारिक सीमाओं की रक्षा करने की बजाय राजनीतिक क्षेत्र का विस्तार करने में अधिक रुचि रखते हैं। इसी गुण ने उन्हें भाजपा के रणनीतिकारों के लिए आकर्षक बना दिया।
क्यों चुनी राजनीतिक राह?
के.अन्नामलाई के करीबी लोग उन्हें एक पारंपरिक पार्टी नेता से ज़्यादा एक राजनीतिक उद्यमी के रूप में देखते हैं। उन्होंने पुलिस सेवा से इस्तीफा इसलिए नहीं दिया क्योंकि वे किसी पार्टी की तलाश में थे, बल्कि इसलिए दिया क्योंकि वे एक व्यापक मंच की तलाश में थे। 2023 के एक साक्षात्कार में अन्नामलाई को बताया कि पुलिस अधिकारी के रूप में सेवा करते समय उन्हें राजनेताओं से बहुत एलर्जी थी। उन्होंने तब कहा था कि राजनीति उन्हें इसलिए आकर्षक लगी क्योंकि इसमें सिविल सेवा की तुलना में लक्ष्यों को तेजी से प्राप्त करने की संभावना थी।
उनकी अधीरता अभी भी स्पष्ट है। मित्र उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में वर्णित करते हैं जो उन संरचनाओं में बने रहने के लिए संघर्ष करते हैं, जिन पर उनका नियंत्रण नहीं है। दूसरी ओर समर्थक इसे नेतृत्व कहते हैं लेकिन आलोचक इसे बेचैनी कहते हैं। दोनों ही बातें सही हो सकती हैं।
विजय के उदय ने अन्नामलाई का बिगाड़ा खेल
राज्य की सियासत में टीवीके के विजय के उदय ने समीकरण को जटिल बना दिया है। वर्षों से बीजेपी नेताओं का मानना था कि तमिलनाडु एक गैर-द्रविड़ विकल्प की प्रतीक्षा कर रहा था। अन्नामलाई को वह विकल्प माना जा रहा था। फिर विजय का आगमन हुआ। बीजेपी उम्मीद कर रही थी, कि राज्य में सत्ता विरोधी लहर का फायदा अन्नामलाई को मिल सकता था लेकिन यह फायदा विजय जैसे एक नेता ने लपक लिया। उनकी सांस्कृतिक पहुंच कहीं अधिक थी और लोकप्रियता काफी ज्यादा थी। पीढ़ीगत बदलाव की चाह रखने वाले कई मतदाताओं के लिए अन्नामलाई के सवाल पूरा करने से पहले ही विजय जवाब बन गए।
अन्नामलाई को खोना होगा बड़ा झटका
कई बीजेपी नेताओं का तर्क है कि दिल्ली ने तमिलनाडु को गलत समझा। उनका कहना है कि संगठनात्मक असफलताओं के बावजूद अन्नामलाई एनडीए के सबसे बड़े जन-प्रेरक नेताओं में से एक रहे। उनका तर्क है कि उन्हें अक्सर राज्य स्तरीय प्रचारक के रूप में देखा जाता था, जबकि साथ ही उनसे राज्य स्तरीय प्रदर्शन की भी उम्मीद की जाती थी। बीजेपी के अंदरूनी हलकों में अन्नामलाई का दिल्ली को दिया गया संदेश व्यापक रूप से सरल माना गया।
इसमें अन्नामलाई ने राज्य की राजनीति में पूर्ण अधिकार और पर्याप्त समय दें या मुझे जाने दें। बीजेपी के लिए दोनों ही विकल्पों को चुनना आसान नहीं है। बीजेपी ने अन्नामलाई पर काफी उम्मीदें टिका रखी हैं। एक वरिष्ठ नेता ने इस स्थिति की तुलना एक ऐसे खिलाड़ी को खोने से की, जिसे पूरी तरह से फ्रेंचाइजी प्रणाली के तहत प्रशिक्षित किया गया हो। एक नेता ने हाल ही में कहा, “वह हमारा निवेश हैं। आप उन्हें किसी और के लिए खेलते हुए नहीं देखना चाहेंगे।”
असल समस्या ढांचागत है। तमिलनाडु राष्ट्रीय दलों के लिए वर्चस्व स्थापित करने के सबसे कठिन राज्यों में से एक बना हुआ है। अन्नामलाई ने स्वयं एक बार इसकी वजह बताई थी। उन्होंने कहा था कि क्षेत्रीय दल हर सुबह केवल तमिलनाडु के बारे में सोचते हैं। राष्ट्रीय दल भारत के बारे में सोचते हैं। इस विषमता ने आधी सदी से तमिलनाडु की राजनीति को परिभाषित किया है और संभवतः अन्नामलाई के अगले निर्णय को भी यही प्रभावित करेगा।
एक अलग पार्टी बनाने की भी चल रही चर्चा
अन्नामलाई के समर्थकों का ये विश्वास है कि अगर वे एक नई पार्टी बनाते हैं, तो उसका जनाधार बीजेपी, कांग्रेस, वामपंथी दलों, वीसीके और पीएमके से कहीं अधिक व्यापक होगा। वे उनके व्यक्तिगत समर्थन, भाषण कला, सोशल मीडिया पर उनकी व्यापक पहुंच, आईपीएस पृष्ठभूमि और जाति एवं जिला सीमाओं से परे उनकी लोकप्रियता का हवाला देते हैं। हालांकि, ये खूबियां वोटों में तब्दील होंगी या नहीं, यह कहना अभी असंभव है।
अन्नमलाई के एक करीबी सहयोगी ने कहा, “अगर उनकी पार्टी चुनाव लड़ती है, तो उनका वोट शेयर 10% से शुरू होगा। हालांकि उनकी नई पार्टी संगठनात्मक रूप से डीएमके से काफी छोटी रह सकती है, लेकिन अन्नामलाई की व्यक्तिगत लोकप्रियता का स्तर संभवतः उन्हें डीएमके के संभावित उत्तराधिकारी और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन से काफी आगे रखेगा। उभरते राजनीतिक परिदृश्य में, यह उन्हें अन्य अधिकांश दूसरी पीढ़ी के नेताओं की तुलना में विजय के अधिक करीब लाएगा।”
तमिलनाडु में कई प्रभावशाली नेताओं का उदय हुआ है लेकिन उनमें से अधिकांश हाशिये पर ही सिमट कर रह गए। फिर भी अन्नामलाई को खारिज करना भी उतना ही जल्दबाजी होगी। उनकी राजनीतिक रुचि केवल उनकी लोकप्रियता के कारण नहीं है। बल्कि मौजूदा श्रेणियों में सहजता से फिट होने से उनका इनकार ही उन्हें राजनीतिक रूप से दिलचस्प बनाता है। वे न तो पूरी तरह से हिंदुत्ववादी नेता हैं और न ही द्रविड़ नेता, न ही बाहरी हैं और न ही अंदरूनी।
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तमिलनाडु के पूर्व भाजपा अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव बीएल संतोष से मंगलवार को मुलाकात की और उनसे अपने इस्तीफे पर बात की। यह चर्चा गृह मंत्री अमित शाह के साथ उनकी मुलाकात के साथ समाप्त हुई। ये मुलाकातें अन्नामलाई के राजनीतिक भविष्य को लेकर चल रही अटकलों के बीच हो रही हैं। पढ़िए पूरी खबर…
