इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर कुमार यादव बुधवार को रिटायर होने वाले हैं। उनके खिलाफ दिसंबर 2024 में आरएसएस से संबद्ध एक संगठन के कार्यक्रम में दिए गए विवादास्पद भाषण को लेकर संसद में चल रही महाभियोग की प्रक्रिया चल रही है जो फिलहाल रुक गई है। जस्टिस शेखर यादव को दिसंबर 2019 में अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था और मार्च 2021 में स्थायी न्यायाधीश के रूप में उनकी नियुक्ति की पुष्टि की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट में कथित तौर पर आपत्तियों के बीच, जस्टिस यादव को हाई कोर्ट बेंच में प्रमोट किए जाने से पहले एक सहायक सरकारी वकील के रूप में कार्य करना पड़ा था। अक्टूबर 2018 में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में गठित कॉलेजियम जिसमें न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और मदन बी लोकुर शामिल थे, उन्होंने जस्टिस यादव के प्रमोशन के प्रस्ताव को स्थगित कर दिया था। हालांकि, फरवरी 2019 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश गोगोई की अध्यक्षता में गठित नए कॉलेजियम ने उनकी नियुक्ति की सिफारिश की। इस कॉलेजियम में न्यायमूर्ति एके सिकरी और एसए बोडे शामिल थे।

RSS के कार्यक्रम में विवादित भाषण के कारण जस्टिस यादव पर महाभियोग की कार्यवाही शुरू हुई थी

जिस भाषण के कारण उन पर महाभियोग चलाने की कार्यवाही शुरू हुई, वह जस्टिस यादव द्वारा 8 दिसंबर 2024 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय परिसर में आरएसएस से संबद्ध भारत विकास परिषद द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए दिया गया था। समान नागरिक संहिता पर बोलते हुए न्यायमूर्ति शेखर ने कहा था, “मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि भारत बहुमत की इच्छा के अनुसार चलेगा।” उन पर यह भी आरोप है कि उन्होंने तीन तलाक जैसी प्रथाओं की आलोचना करते हुए मुसलमानों के लिए अपमानजनक शब्द का प्रयोग किया।

सुप्रीम कोर्ट के 13 वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना को पत्र लिखकर सीबीआई से न्यायमूर्ति यादव के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस यादव को तलब किया और कथित तौर पर उनसे सार्वजनिक रूप से माफी मांगने को कहा। हालांकि, न्यायाधीश ने कथित तौर पर इनकार कर दिया और फिर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर कहा कि वे अपने बयान पर कायम हैं।

महाभियोग की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई

13 दिसंबर 2024 को राज्यसभा में विपक्ष के 54 सांसदों ने जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ महाभियोग का नोटिस प्रस्तुत किया था जिसमें उन पर घृणास्पद भाषण देने और सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने का आरोप लगाया गया था। इस पर जस्टिस शेखर यादव को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का समर्थन प्राप्त हुआ। अंततः महाभियोग की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई क्योंकि राज्यसभा सचिवालय ने प्रस्तुत प्रस्ताव में शामिल 54 हस्ताक्षरों में से कुछ में विसंगति का हवाला देते हुए सत्यापन प्रक्रिया शुरू कर दी। साल 2025 के मध्य तक, 44 सांसदों ने अपने हस्ताक्षर प्रमाणित किए जो प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक 50 हस्ताक्षरों से कम थे।

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