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किसान आंदोलन मामले में शीर्ष अदालत की सरकार को फटकार, कानूनों पर अमल टाले केंद्र नहीं तो हम लगाएंगे रोक

सुप्रीम कोर्ट ने तीन कृषि कानूनों को लेकर किसानों के विरोध प्रदर्शन से निबटने के तरीके पर सोमवार को केंद्र को आड़े हाथ लिया। अदालत ने कठोर टिप्पणी करते हुए कहा कि किसानों के साथ केंद्र की बातचीत के तरीके से वह ‘बहुत निराश’ है।

farmerकिसान अपनी मांगों को लेकर धरना देते हुए। फाइल फोटो।

मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे, न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामासुब्रह्मण्यम के पीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए यहां तक संकेत दिया कि अगर सरकार इन कानूनों पर अमल खुद स्थगित नहीं करती है तो अदालत उन पर रोक लगा सकती है।

जजों ने कहा कि वे सरकार को पहले ही काफी वक्त दे चुके हैं। अदालत ने कहा कि इस विवाद का समाधान खोजने के लिए वह अब एक समिति गठित करेगी। इन मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट संभवत: मंगलवार को अपना आदेश सुनाएगा। संभव है कि न्यायालय इस गतिरोध को दूर करने के इरादे से देश के किसी पूर्व प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति गठित कर दे।

इस संबंध में बाद में न्यायालय की वेबसाइट पर यह सूचना अपलोड की गई है। इस सूचना में कहा गया है, ‘इन मामलों को 12 जनवरी को आदेश के लिए सूचीबद्ध किया जाए।’ उच्चतम न्यायालय ने आशंका व्यक्त की कि कृषि कानूनों के खिलाफ यह आंदोलन अगर ज्यादा लंबा चला तो यह हिंसक हो सकता है और इसमें जान माल का नुकसान हो सकता है। न्यायालय ने कहा, ‘हम नहीं चाहते कि हमारे हाथों पर किसी का खून लगे।’

जब अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कानूनों को स्थगित करने की बाबत जजों द्वारा आदेश पारित करने की हड़बड़ी को लेकर सवाल उठाया तो नाराज जज बोले-मिस्टर अटॉर्नी जनरल, हम पहले ही आपको काफी समय दे चुके हैं, कृपया संयम के बारे में हमें उपदेश मत दीजिए। महान्यायवादी तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि शीर्ष अदालत ने सरकार द्वारा इस स्थिति से निबटने के संबंध में ‘काफी सख्त टिप्पणियां’ की हैं।

इस पर पीठ ने कहा-हमारा यह कहना ही सबसे निरापद बात थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले में कृषि कानूनों और किसानों के आंदोलन के संबंध में वह हिस्सों में आदेश पारित करेगी। पीठ ने इसके साथ ही पक्षकारों से कहा कि वे शीर्ष अदालत द्वारा गठित की जाने वाले पीठ के अध्यक्ष के लिए पूर्व प्रधान न्यायाधीश आरएम लोढा सहित दो-तीन पूर्व प्रधान न्यायाधीशों के नामों का सुझाव दें।

इस मामले की सुनवाई शुरू होते ही पीठ ने टिप्पणी की-यह सब क्या हो रहा है? राज्य आपके कानूनों के खिलाफ विद्रोह कर रहे हैं। हम बातचीत की प्रक्रिया से बेहद निराश हैं। हम आपकी बातचीत के बारे में कोई छिटपुट टिप्पणियां नहीं करना चाहते लेकिन हम इस प्रक्रिया से बहुत निराश हैं। शीर्ष अदालत तीनों कृषि कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली और दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाले किसानों को हटाने के लिए दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने कहा कि इस समय वह इन कानूनों को खत्म करने के बारे में बात नहीं कर रही है।

पीठ ने कहा-यह बहुत ही संवेदनशील स्थिति है। हमारे सामने एक भी ऐसी याचिका नहीं है जो इन कानूनों को लाभकारी बता रही हो। हम अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ नहीं हैं। आप हमें बताएं कि क्या सरकार इन कृषि कानूनों को स्थगित रखने जा रही है या हम ऐसा करें। हमें यह कहते हुए दुख हो रहा है कि केंद्र इस समस्या और किसान आंदोलन को नहीं सुलझा पाया। अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने दलील दी कि किसी भी कानून पर उस समय तक रोक नहीं लगाई जा सकती जब तक अदालत यह नहीं महसूस करे कि इससे मौलिक अधिकारों या संविधान की योजना का हनन हो रहा है।

पीठ ने कहा-हमारी मंशा यह देखने की है कि क्या हम इस सबका कोई सर्वमान्य समाधान निकाल सकते हैं। इसीलिए हमने आपसे (केंद्र) पूछा कि क्या आप इन कानूनों को कुछ समय के लिए स्थगित रखने के लिए तैयार हैं। लेकिन आप समय निकालना चाहते थे। हमें नहीं पता कि आप समाधान का हिस्सा हैं या समस्या का? शीर्ष अदालत ने कहा कि यह मामला दिन प्रतिदिन बिगड़ रहा है और लोग आत्महत्या कर रहे हैं। अदालत ने इस समस्या के समाधान के लिए समिति गठित करने का अपना विचार दोहराते हुए कहा कि इसमें सरकार और देश भर के किसान संगठनों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा ।

पीठ ने कहा-अगर समिति की सलाह होगी तो वह इन कानूनों के अमल पर रोक लगा देगा। किसान इन कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं और वे अपनी आपत्तियां समिति के समक्ष रख सकते हैं। साथ ही पीठ ने सख्त लहजे में कहा कि अगर सरकार खुद इस पर अमल नहीं स्थगित करेगी तो उसे इस पर रोक लगानी होगी।

यही नहीं, इन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों की यूनियनों से भी पीठ ने कहा-आपका भरोसा है या नहीं, लेकिन हम सुप्रीम कोर्ट हैं और हम अपना काम करेंगे। पीठ ने कहा कि उसे नहीं मालूम कि आंदोलनरत किसान कोविड-19 महामारी के लिए निर्धारित मानकों के अनुरूप उचित दूरी का पालन कर रहे हैं या नहीं लेकिन वह उनके लिए भोजन और पानी को लेकर चिंतित हैं।

पीठ ने यह भी आशंका जताई कि इस आंदोलन के दौरान शांतिभंग करने वाली कुछ घटनाएं भी हो सकती हैं। पीठ ने कहा कि इन कानूनों के अमल पर रोक लगाए जाने के बाद भी आंदोलनकारी किसान अपना आंदोलन जारी रख सकते हैं क्योंकि अदालत किसी को यह कहने का मौका नहीं देना चाहती कि उसने विरोध की आवाज दबा दी। शीर्ष अदालत ने कहा कि बातचीत सिर्फ इसलिए टूट रही है क्योंकि केंद्र चाहता है कि इन कानूनों के हरेक उपबंध पर चर्चा की जाए जबकि किसान चाहते हैं कि इन्हें खत्म किया जाए।

जजों ने कहा-हम किसी भी कानून तोड़नेवाले को संरक्षण देने नहीं जा रहे हैं। हम जान माल के नुकसान को बचाना चाहते हैं। कानून व्यवस्था का मुद्दा उठाए जाने पर पीठ ने टिप्पणी की कि इन मुद्दों को पुलिस देखेगी। विरोध प्रदर्शन का अधिकार बरकरार है और गांधीजी ने सत्याग्रह किया था। वह आंदोलन कहीं ज्यादा बड़ा था। अटॉर्नी जनरल ने जब पीठ से कहा कि सरकार और किसानों के बीच अगले दौर की बातचीत 15 जनवरी को होने वाली है और इस नाते अदालत को तत्काल कोई आदेश पारित नहीं करना चाहिए तो पीठ ने कहा-हमें नहीं लगता कि केंद्र ठीक से इस मसले को ले रहा है। हमें ही आज कोई कार्रवाई करनी होगी।हमें नहीं लगता कि आप प्रभावी हो रहे हैं।

पीठ ने कहा कि अगर कानून को स्थगित कर दिया जाए तो बातचीत से कोई रास्ता निकल सकता है। न्यायमूर्ति बोबडे ने कहा-मुझे जोखिम लेने दीजिए और कहने दीजिए मुख्य न्यायाधीश चाहते हैं कि वे (आंदोलनकारी किसान) वापस अपने घर लौटें। इन कानूनों को लेकर केंद्र और किसान यूनियनों के बीच आठ दौर की बातचीत के बावजूद कोई रास्ता नहीं निकला है क्योंकि केंद्र ने इन कानूनों को समाप्त करने की संभावना से इनकार कर दिया है। जबकि किसान नेताओं का कहना है कि वे अंतिम सांस तक इसके लिए संघर्ष करने को तैयार हैं और ‘कानून वापसी’ के साथ ही उनकी ‘घर वापसी’ होगी।

किसान संगठन बोले, किसी समिति में शामिल नहीं होंगे

कृषि कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जरिए गठित किसी भी कमेटी का हिस्सा बनने से किसानों ने इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हुई सुनवाई में कहा कि सरकार और किसानों के बीच अब तक की बातचीत से कोई हल नहीं निकला है, इसलिए अदालत इस मसले के हल के लिए एक कमेटी का गठन कर सकती है। लेकिन किसानों ने ऐसे किसी भी कमेटी का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया है।

सोमवार शाम को किसान संगठनों की बैठक के बाद एक बयान जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि किसानों की समस्या को समझने और सोमवार को अदालत में सुनवाई के दौरान दिल को सुकून देने वाले शब्दों के लिए वो सुप्रीम कोर्ट के आभारी हैं। कृषि कानूनों पर फिलहाल रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के सुझाव का भी स्वागत करते हैं, लेकिन किसान अपने व्यक्तिगत स्तर पर और सामूहिक रूप से सुप्रीम कोर्ट के जरिए नियुक्त किसी भी कमेटी का हिस्सा बनने के लिए तैयार नहीं हैं।

किसान नेताओं के मुताबिक, उनके वकीलों ने सोमवार को अदालत में स्पष्ट रूप से कह दिया था कि किसानों से विचार विमर्श किए बगैर उनको किसी भी कमेटी के गठन पर अपनी सहमति देने का कोई अधिकार नहीं है। किसानों ने अपने वकीलों से लंबी बातचीत की और सर्वसम्मति से वो इसी नतीजे पर पहुंचे हैं कि सरकार के अड़ियल रवैए के कारण वो किसी भी कमेटी का हिस्सा नहीं बनेंगे।

इससे पहले किसान नेताओं ने कहा कि यदि सरकार अथवा सुप्रीम कोर्ट तीन नए कृषि कानूनों को लागू करने पर रोक लगा देता है, तब भी वे अपना आंदोलन जारी रखेंगे। किसानों से सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कानूनों को पूरी तरह निरस्त करे।
हरियाणा भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा, किसान चाहते हैं कि कानूनों को पूरी तरह वापस लिया जाए।

यदि सरकार या सुप्रीम कोर्ट कानूनों के कार्यान्वयन पर रोक लगा भी देता है, तब भी आंदोलन चलता रहेगा। भारतीय किसान यूनियन (मनसा) के अध्यक्ष भोग सिंह मनसा ने कहा कि कानूनों पर रोक लगाने का कोई फायदा नहीं है। आंदोलन तब तक चलता रहेगा, जब तक इन कानूनों को निरस्त नहीं कर दिया जाता या भाजपा सरकार का कार्यकाल पूरा नहीं हो जाता।
पंजाब किसान यूनियन के अध्यक्ष रुल्दु सिंह मनसा ने कहा कि आंदोलन कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग के साथ शुरू हुआ था और यह तभी खत्म होगा जब हम अपनी लड़ाई जीत लेंगे। क्रांतिकारी किसान यूनियन के अध्यक्ष दर्शन पाल ने कहा कि किसान नेता अपने वकीलों के साथ विचार-विमर्श कर रहे हैं।

किसानों के समर्थन में अभय चौटाला का इस्तीफा

केंद्र सरकार द्वारा कृषि कानून वापस नहीं लिए जाने के विरोध में इनेलो विधायक अभय चौटाला ने हरियाणा विधानसभा से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने यह इस्तीफा 27 जनवरी से मान्य करने का आग्रह किया है। इनेलो विधायक इस समय ऐलनाबाद विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। अभय चौटाला ने करीब एक सप्ताह पहले सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान यह एलान किया था कि वह किसानों के हित में इस्तीफा देने से भी पीछे नहीं हटेंगे।

विधानसभा में इस समय अभय चौटाला ही इनेलो के एक मात्र विधायक हैं। सोमवार को हरियाणा विधानसभा के अध्यक्ष ज्ञान चंद गुप्ता को लिखे पत्र में अभय ने कहा है कि चौधरी देवीलाल ने हमेशा किसानों के लिए संघर्ष किया है। आज की परिस्थितियों में उसी विरासत का मैं रखवाला हूं। किसानों पर आए इस संकट की घड़ी में मेरा यह दायित्व है कि मैं हर संभव प्रयास करूं जिससे यह धरोहर सहजता से आने वाली पीढ़ी को जा सके ताकि किसानों के भविष्य और अस्तित्व पर आए खतरे को टाला जा सके।

चौटाला ने कहा कि इन कानूनों का देशभर में व्यापक विरोध हो रहा है। और आंदोलन को अब तक 47 से भी अधिक दिन हो गए हैं। कड़ाके की ठंड में लाखों की संख्या में किसान दिल्ली को चारों तरफ से घेरे बैठे हैं। ठंड के कारण 60 से ज्यादा किसान शहीद भी हो चुके हैं। इस संबंध में सरकार द्वारा किसानों से औपचारिक वार्तालाप के आठ दौर हो चुके हैं परंतु सरकार ने इन तीनों काले कानूनों को वापस लेने के बारे में कोई सहमति नहीं दिखाई है।

सरकार ने जिस प्रकार की परिस्थितियां बनाई हैं उन्हें देखते हुए ऐसे नहीं लगता कि विधानसभा के एक जिम्मेवार सदस्य के रूप में मैं कोई ऐसी भूमिका इन परिस्थितियों में निभा सकूं। इस समय किसानों के हित सर्वोपरि हैं। एक संवेदनहीन विधानसभा में मेरी मौजूदगी कोई महत्व नहीं रखती है। इन सभी हालातों को देखते हुए यदि भारत सरकार इन तीन काले कानूनों को 26 जनवरी 2021 तक वापस नहीं लेती है तो इस पत्र को विधानसभा से मेरा त्याग पत्र समझा जाए।

सरकार के लिए मुसीबत बने कृषि कानून : केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए कृषि कानून हरियाणा सरकार के गले की फांस बन गए हैं। प्रदेश के आधा दर्जन से अधिक विधायक खुलकर किसानों के साथ आ गए हैं। विपक्षी दल कांग्रेस के विधायक खुलेआम किसानों के टैंट में जाकर उनका समर्थन कर रहे हैं। अभय चौटाला द्वारा विधायक पद से इस्तीफा दिए जाने के साथ ही जजपा के विधायक जोगी राम सिहाग ने भी कहा है कि अगर किसान चाहेंगे तो वह इस्तीफा देने में देर नहीं लगाएंगे।

सरकार में लाभ के पद पर तैनात दादरी से निर्दलीय विधायक सोमबीर सांगवान ने पहले पशुधन विकास बोर्ड के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया और उसके बाद सरकार से समर्थन वापस ले लिया। सोमबीर सांगवान भी खुलकर किसानों के साथ चल रहे हैं।
हरियाणा सरकार में एक अन्य अध्यक्ष धर्मपाल गोंदर भी किसानों का समर्थन करने का ऐलान कर चुके हैं। इससे पहले महम से निर्दलीय विधायक बलराज कुंडू भी सरकार से समर्थन वापस लेकर किसान आंदोलन में कूद चुके हैं।

सरकार हमें भूमिहीन मजदूर बनाना चाहती है : टिकैत

भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि केंद्र सरकार हमें भूमिहीन बनाकर मजदूर के रूप में देखना चाहती है। ताकि हम किसान नहीं कहलाकर खेतों में काम करने वाले मजदूर बनकर जीवन गुजर-बसर करें। उन्होंने कहा कि परंपरागत खेती को खत्म कर ठेके की खेती को सरकार आगे बढ़ाना चाहती है ताकि किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर बन जाए। फिर किसान केवल वोट बैंक बनकर रह जाए।

टिकैत ने कहा कि अब तक किसान अपनी जमीन पर अपनी जोत का मालिक था। लेकिन सरकार के नए कानून से वह ऐसा नहीं कर पाएगा। खेती का लाभ बड़े पूंजीपति ले जाएगा। हम किसान केवल मजदूरी करेंगे। भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता टिकैत ने निजी बातचीत में कहा कि भारत ही ऐसा देश है जो कृषि प्रधान है। यहां 70 फीसद जनता कृषि पर आश्रित है लेकिन किसानों की छवि पहले से ही कमजोर और दयनीय रही है।

नए कानून से यह स्थिति और विकट होने वाली है। आत्महत्याओं का दौर अब तक साहूकारों और बैंक के कर्जों, प्राकृतिक मार, सूखा और बाढ़ के चलते था लेकिन अब यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के ठेके प्रणाली या कृषि पर हो रहे एकाधिकार के चलते बढ़ेगा। न्यूनतम समर्थन मूल्य पिछले 70 सालों से किसानों की संजीवनी थी।

सरकार तय समय पर अनाजों की खरीद का एक दर घोषित करती थी और किसान उस मूल्य पर अपना अनाज सरकार को बेच देता था। अपनी देनदारी पूरा करता था लेकिन नए कानून में न्यूनतम समर्थन मूल्य को ही खत्म कर दिया गया है। सरकार केवल आश्वासन दे रही है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पहले की तरह जारी रहेगा। हमारी मांग है कि पहले की तरह कानून में यह चीज लिखित होनी चाहिए न कि मौखिक। हमें फैक्टरी में काम करने वाले मजदूर बनाने की सरकार की नीति समझ में नहीं आ रही है। अगर ठेके पर खेती से बाहरी कंपनियों को मुनाफा हो रहा है तो उस ठेकेदार को हमें भी समझाने के लिए भेजे सरकार ताकि हम किसानी को खुद से आगे बढ़ा सके।

टिकैत ने सरकार के अड़ियल रवैए पर चिंता जताते हुए कहा कि अगर सरकार तानाशाह बनी रही तो वह दिन दूर नहीं जब भारत कृषि प्रधान देश से मजदूर प्रधान देश के रूप में जाना जाएगा। यहां के अन्नदाता जीवन यापन ही कर पाएंगे, ऐसे भी भारत में कई ऐसी जाति जनजातियां मौजूद है जो मजदूर या घुमक्कड़ जाति के रूप में सालों से जीवन यापन करते हैं और जिनकी कोई पहचान नहीं है। किसानों की भी अब यही स्थिति सरकार चाहती है। खेती बाड़ी में लगे किसान की पहचान भी कमोवेश ऐसे ही बनाने की है। इसी का विरोध करने के लिए हम सड़क पर शांतिपूर्वक तरीके से बैठे हैं और सरकार को इस बात का आगाह कर रहे हैं कि वे अपनी इस कानून को वापस लेकर हमें किसानी के रूप में पहचान बरकरार रखने के लिए दे।

राकेश टिकैत का कहना है कि किसानों से गन्ना लिया जा रहा है और भुगतान बिल पर जीरो लिखा पर्ची दिया जा रहा है। इसका मतलब यह है कि अभी सरकार गन्ना की कीमत तय नहीं कर फैसला अपने हाथ में ले रही है। भुगतान बाद में होगा और कीमत बाद में तय होगी। इसलिए हम सरकार से बातचीत का रास्ता अख्तियार करते हुए तब तक धरने पर बैठे रहेंगे जब तक हमारी मांगे मान नहीं ली जाती है।

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