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जब JRD टाटा ने स्‍टाफ संग साफ किया था विमान का टॉयलेट, काउंटर से हटाई थी धूल

कुछ सालों में, एयर इंडिया ने अपनी हाई क्लास की ऑन-बोर्ड सर्विस के लिए अच्छी प्रतिष्ठा विकसित की, जिससे इसके वैश्विक प्रतिस्पर्धियों ने प्रशंसा और ईर्ष्या के बारे में चर्चा की थी।

जेआरडी टाटा (फाइल फोटो)।

जेआरडी टाटा, टाटा एयरलाइन्स के लिए पूरी तरह समर्पित थे। जेआरडी टाटा ने देश की पहली वाणिज्यिक विमान सेवा ‘टाटा एयरलाइंस’ की शुरुआत की, जो आगे चलकर ‘एयर इंडिया’ बन गई। वह इसके चेयरमैन बने। बावजदू इसके उनकी रूचि उसमें कम नहीं हुई। एक बार तो जेआरडी टाटा ने अपने क्रू के साथ भी काम किया और उन्होंने एयरक्राफ्ट के गंदे टॉयलेट को साफ किया। द टाटा ग्रुप: टॉर्चबेयरर्स से ट्रिलब्लैज़र तक, नई किताब के मुताबिक 1953 में राष्ट्रीयकरण के बाद जेआरडी टाटा राष्ट्रीय वाहक के अध्यक्ष नियुक्त किए गए, उसके बाद वह एयर इंडिया के परिचालन पहलुओं का सूक्ष्म प्रबंधन करते थे। “एक बार तो उन्होंने एक गंदे एयरलाइन काउंटर को देखा, तो उन्होंने एक डस्टर मांगकर सबको शर्मिंदा कर दिया और खुद धूल साफ की। एक बार उन्होंने अपनी शर्ट की बाजू चढ़ाकर एक कैबिन क्रू की एयरक्राफ्ट का टॉयलेट साफ करने में मदद की थी। अंदरूनी सजावट में एयर हॉस्टेस की साड़ियों के रंग, एयर इंडिया होर्डिंग्स पर लिखे हुए शब्द से लेकर प्लेन में टॉयलेट पेपर की उपलब्धता तक को उन्होंने अपने हाथ में ले लिया था।” इस किताब में टाटा ग्रुप की 25 कंपनियों का इतिहास है।

“वह विशेष रूप से चिंतित थे कि एयर इंडिया इंटरनेशनल के उच्च मानकों को राष्ट्रीयकरण से प्रतिकूल रूप से प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए। अगले 25 साल में व्यक्तिगत प्रतिबद्धता के माध्यम से उन्होंने एयर इंडिया में सेवा के उच्च मानकों को बनाए रखा, जिसने यात्रियों के बीच एक उत्कृष्ट प्रतिष्ठा का आनंद लिया।” टाटा एयरलाइंस की उल्लेखनीय सफलता की कहानी आज की एयरलाइंस के लिए बिजनेस मैनेजमेंट सबक रखती है, जो साल दर साल घाटे का सामना कर रही हैं। किताब के मुताबिक, 1932 में स्थापित एयरलाइन ने ऑपरेशन के पांचवें साल में 6 लाख रुपये का लाभ कमाया था और 99.4% पर समय बद्धता बनाए रखी थी।

“कुछ सालों में, एयर इंडिया ने अपनी हाई क्लास की ऑन-बोर्ड सर्विस के लिए अच्छी प्रतिष्ठा विकसित की, जिससे इसके वैश्विक प्रतिस्पर्धियों ने प्रशंसा और ईर्ष्या के बारे में चर्चा की थी। 1950 के दशक में, जब ब्रिटिश एयरवेज ने एक जेट सेवा शुरू की जो यात्रा के कुछ घंटों में कटौती कर रही थी, यात्रियों ने एयर इंडिया के धीमी प्रोपेलर संचालित विमान से उड़ना पसंद किया, क्योंकि उन्हें इस पर ज्यादा लाड प्यार मिल रहा था। इस किताब को शशांक शाह ने लिखा है।

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