scorecardresearch

सफर तिरंगे का

हमारा राष्ट्रीय ध्वज स्वतंत्रता संग्राम काल में निर्मित किया गया था।

सफर तिरंगे का

भारत के राष्ट्रीय ध्वज में 1906 से लेकर 1947 तक अलग-अलग बदलाव आए हैं। आज जो हमें ध्वज दिखता है वह पहले वाले से काफी अलग है। हमारा राष्ट्रीय ध्वज स्वतंत्रता संग्राम काल में निर्मित किया गया था। 1857 में स्वतंत्रता के पहले संग्राम के समय भारत का राष्ट्रीय ध्वज बनाने की योजना बनी थी, लेकिन वह आंदोलन असमय ही समाप्त हो गया था और उसके साथ ही वह योजना भी बीच में ही अटक गई थी। वर्तमान रूप में पहुंचने से पहले भारतीय राष्ट्रीय ध्वज अनेक पड़ावों से गुजरा है। कुछ ऐतिहासिक पड़ाव इस प्रकार हैं:

प्रथम चित्रित ध्वज 1904 में स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता ने बनाया था। 7 अगस्त, 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कोलकाता में इसे कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था। इस ध्वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था। ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे और नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए थे। बीच की पीली पट्टी पर वंदेमातरम् लिखा गया था।

दूसरा ध्वज पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था। कुछ लोगों की मान्यता के अनुसार यह 1905 में हुआ था। यह भी पहले ध्वज के समान था सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपर की पट्टी पर केवल एक कमल था, किंतु सात तारे सप्तऋषियों को दर्शाते थे। यह ध्वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।

1917 में भारतीय राजनीतिक संघर्ष ने एक मोड़ लिया। एनी बीसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान तृतीय चित्रित ध्वज को फहराया। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में सात सितारे बने थे। ऊपरी किनारे पर बायीं ओर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।

कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में आंध्र प्रदेश के एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक झंडा बनाया (चौथा चित्र) और गांधी जी को दिया। यह दो रंगों का बना था। लाल और हरा रंग, जो दो प्रमुख समुदायों यानी हिंदू और मुसलिम का प्रतिनिधित्व करते थे। गांधीजी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए।

1931 तिरंगे के इतिहास में एक स्मरणीय वर्ष है। तिरंगा ध्वज को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया और इसे राष्ट्र-ध्वज के रूप में मान्यता मिली। यह ध्वज जो वर्तमान स्वरूप का पूर्वज है, केसरिया, सफेद और मध्य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था।

22 जुलाई, 1947 को संविधान सभा ने वर्तमान ध्वज को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया। स्वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग बने रहे। केवल ध्वज में चलते हुए चरखे के स्थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को स्थान दिया गया। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा ध्वज अंतत: स्वतंत्र भारत का तिरंगा ध्वज बना।

1951 में भारतीय मानक ब्यूरो (बीआइएस) ने पहली बार राष्ट्रध्वज के लिए कुछ नियम तय किए। 1968 में तिरंगा निर्माण के मानक तय किए गए। ये नियम अत्यंत कड़े हैं। केवल खादी या हाथ से काता गया कपड़ा ही झंडा बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। कपड़ा बुनने से लेकर झंडा बनने तक की प्रक्रिया में कई बार इसकी जांच की जाती है। झंडा बनाने के लिए दो तरह की खादी का प्रयोग किया जाता है।

एक वह खादी जिससे कपड़ा बनता है और दूसरा खादी-टाट। खादी के केवल कपास, रेशम और ऊन का प्रयोग किया जाता है। यहां तक कि इसकी बुनाई भी सामान्य बुनाई से भिन्न होती है। इसे केवल पूरे देश के एक दर्जन से भी कम लोग जानते हैं। केंद्र में अशोक चक्र को काढ़ा जाता है। उसके बाद इसे फिर परीक्षण के लिए भेजा जाता है। बीआइएस झंडे की जांच करता है, इसके बाद ही इसे फहराया जा सकता है।

पढें राष्ट्रीय (National News) खबरें, ताजा हिंदी समाचार (Latest Hindi News)के लिए डाउनलोड करें Hindi News App.