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20 सीटों वाली बस में 40 को स्‍टेशन छोड़ा, ट्रेन में भी तीन की सीट पर छह यात्री, खिड़की से दी सौ ग्राम खिचड़ी तो बोगी में मची लूट

P. Anand की रिपोर्ट: सरकार का कहना है कि श्रमिक ट्रेनों में लगभग पूरा खर्च वे ही कर रही है, लेकिन प्रवासी मजदूर इनमें पैसा वसूले जाने से लेकर खाने-पीने के इंतजाम न होने तक की शिकायत कर चुके हैं।

हैदराबाद | Updated: May 28, 2020 10:46 AM

P. Anand की रिपोर्ट

देश में कोरोनावायरस और लॉकडाउन का सबसे ज्यादा असर गरीब और प्रवासी मजदूरों पर ही पड़ा है। केंद्र सरकार की तरफ से इन्हें घर पहुंचाने के ऐलान के बावजूद अब तक इनकी समस्याओं में कोई कमी नहीं आई है। जहां सरकार लगातार दावा कर रही है कि वह श्रमिकों का पूरा खर्च उठा रही है, वहीं प्रवासी मजदूर अब तक इन ट्रेनों में सफर के लिए अवैध वसूली से लेकर खाने-पीने की सुविधाओं के न होने का आरोप लगा चुके हैं। इसी दौरान गुजरात की एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र ने भी सूरत से तेलंगाना जाने वाली एक श्रमिक ट्रेन में सफर किया और यात्रा के दौरान आने वाली कठिनाइयों और समस्याओं को साझा किया है।

छात्र ने अपना यात्रा वृत्तांत सुनाते हुए बताया- “मैं हैदराबाद का रहने वाला हूं और गुजरात के गांधीनगर में स्थित सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस की पढ़ाई कर रहा था। जब लॉकडाउन हुआ तो हमारा कैंपस बंद कर दिया गया और ज्यादातर लोग घर लौटे गए। हम कुछ छात्र ही हॉस्टलों में रह गए। चूंकि कैंटीन बंद हो गई थी, इसलिए खाने की समस्या लगातार बनी रही। आखिरकार तेलंगाना के दो अन्य लोगों ने मेरे साथ घर लौटने के बारे में सोचा।”

युवक ने बताया, “हमने नोडल अफसर के ऑफिस जाकर 23 मई को सूरत के उधना से तेलंगाना के वारंगल जाने वाली स्पेशल ट्रेन में जगह पक्की कर ली। 23 मई को हम तीन लोग अपने हॉस्टल से निकले। गांधीनगर के डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर ने हमें अहमदाबाद तक पहुंचाने के लिए एक गाड़ी का इंतजाम कर दिया था। यहां से हमारे साथ पांच लोग और शामिल हुए और हमें उधना भेजा गया, जहां स्क्रीनिंग के बाद हमें टिकट दिए जाने थे। स्क्रीनिंग में भरी गर्मी में भी एक घंटे का समय लग गया। इसके पूरे हो जाने के बाद हमसे बस में दोबारा बैठने के लिए कहा गया, लेकिन अब 20 सीटर बस में करीब 40 लोग सवार थे। सोशल डिस्टेंसिंग एक भद्दा मजाक लग रही थी। कई और बसें भी थीं, लेकिन वे सब खचाखच भरी।”

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“स्टेशन पर ड्राइवर ने बस से उतरकर पहले यात्रियों को बसों में ही लॉक कर दिया। लोगों को बसों से उतरने की इजाजत तभी थी, जब उन्हें ट्रेन तक पहुंचाना हो। इसके चलते सभी यात्री गर्मी में करीब दो घंटे तक बसों में बंद रहे। इस उमस भरी गर्मी में एक नवजात लगातार रो रहा था, जबकि उसकी मां उसे तेलुगु में लोरी सुनाकर चुप कराने की कोशिश में थी। ट्रेनों के टिकट का दाम सरकार ने 520 रुपए रखा, लेकिन हमने इसके लिए 700 रुपए तक चुकाए। इसके बाद भी ऐसी चीजें हों तो लोगों को गुस्सा आता है। लेकिन घर जाने की जल्दी में कोई क्या ही कर सकता है?”

व्यक्ति ने कहा, “आखिरकार दो घंटे बाद हमारी बसों के दरवाजे खुले और हमें प्लेटफॉर्म पर खड़ी एक ट्रेन में बिठाया गया। लोगों को डिब्बों में बिठाने का कोई तरीका नहीं था। प्लेटफॉर्म पर कई पुलिसवाले और अधिकारी थे, लेकिन कोई गिनती नहीं कर रहा था कि किस डिब्बे में कितने लोग हैं। आखिरकार रात 8:30 बजे हमारी ट्रेन रवाना हुई। हमें इंजन के पास के एक डिब्बे में जगह मिली।”

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“जिन डिब्बों में हमें सफर करवाया गया, उनमें रैक्सीन के बजाय हार्ड बेंच थीं। इसके अलावा ट्रेनों में न तो बर्थ और न ही यात्रियों को लिए सीट नंबर था। लोगों के बीच सीट को लेकर लड़ाइयां हो रही थीं। जहां बेंचों पर धूल जमी थी वहीं टॉयलेट भी बुरी तरह बदबू कर रहे थे। हालांकि, ट्रेन चलने के बाद थोड़ी राहत मिली। हमारे सामने ही कुछ लोग सीट के लिए झगड़ा कर रहे थे। ऐसे में जब उन्हें हमारी तरफ से सीट का प्रस्ताव मिला, तो लड़ाई शांत हुई, लेकिन इससे हमारी सीट पर एक साथ 6 लोग हो गए। मुझमें भी एक डर समा गया कि क्या होगा अगर मैं बीमार हो जाता हूं और कोरोनावायरस से संक्रमित पाया जाता हूं? क्या मैं इन स्थितियों में सफर कर अपने परिवारों को तो खतरे में नहीं डाल रहा?”

“कुछ देर बाद हमारे डिब्बे में खाने की खुश्बू आने लगी। हमारी यूनिवर्सिटी ने निकलते वक्त कुछ खाने का सामान दिया था, लेकिन उन्हें खत्म हुए काफी समय हो चुका था। रात का खाना खाने के बाद हम सब बात करने लगे। सभी अपनी लड़ाई भूलकर क्वारैंटाइन और घर जाने की बातों में मशगूल हो गए। जब सोने का समय आया तो जिसे जहां जगह मिली, वहीं सिर टिका कर सो गया। कुछ सीटों और दूसरों के आसपास लेट गए। मेरे दोस्तों ने कुछ समय बातें कर बिताया। इसके बाद एक सीट पर बारी-बारी से सोने लगे। यह काफी मुश्किल था, लेकिन हैदराबाद पहुंचकर अपने भाई और चाची से मिलने का ख्याल सुकून देने वाला था।”


“अगली सुबह लोगों का बाथरूमों के बाहर जमावड़ा लग गया। हमारे कंपार्टमेंट के दोनों बाथरूम इस्तेमाल करने लायक नहीं थे। सुबह 9 बजे जब ट्रेन महाराष्ट्र के अकोला पहुंची, तो अधिकारियों ने लोगों को कुछ केले और पानी की बोतलें दीं। इस दौरान भी लड़ाई छिड़ गई। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अफसर इस तरह का बर्ताव क्यों कर रहे हैं। यह बेइज्जती करने जैसा था। कुछ देर बाद ट्रेन फिर रुकी। यह रमजान का दिन था औ कुछ स्थानीय लोग हमारी ट्रेनों में आए और चावल और बिस्किट का पैकेट देकर गए। एक अन्य व्यक्ति ने हमारी बोतलें भर दीं। हमें काफी खुशी हुई।”

आगे के सफर के बारे में युवक ने कहा, “दोपहर करीब 12.30 बजे हमारी ट्रेन बल्हरशाह स्टेशन पर रुकी और रेलवे अधिकारियों ने खिड़की से हमें लंच पैकेट दिए। इसमें 100 ग्राम खिचड़ी और एक पानी की बोतल थी। इस खिचड़ी के लिए एक बार फिर ट्रेन में लड़ाई हुई और लोगों के बीच छीना-झपटी शुरू हो गई। शाम करीब 6.30 बजे हमारी ट्रेन आखिरकार वारंगल स्टेशन पहुंची। इससे पहले तक मुझे लगता था कि जिनके साथ मैं सफर कर रहा हूं, मैं उस भीड़ से अलग हूं। क्योंकि इनमें ज्यादातर दिहाड़ी मजदूर थे। लेकिन यह सफर बराबरी का था। जब हम ट्रेन से उतरे तो हम सब एक जैसे ही थे- गंदे और थके हुए। हमें सिर्फ अपने घर जाने का ही ख्याल था। सफर खत्म होने के बाद स्क्रीनिंग में एक घंटे से कुछ ज्यादा समय लगा और हमारे हाथों पर होम क्वारैंटाइन की मोहर लगाई गई। बसों से 10.30 बजे मैं अपने घर पहुंच गए। गांधीनगर से लाया गया मेरा सामान अभी भी घर के बाहर ही है।”

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