लोकसभा में सोमवार को बजट सत्र के दौरान भारी हंगामा हुआ। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण का जिक्र करते ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तुरंत आपत्ति जताई। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू भी उनके समर्थन में आ गए। इसके चलते सदन की कार्यवाही कुछ देर के लिए बाधित रही। आइए जानते हैं कि आखिर उस किताब में ऐसा क्या है।

फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी में 2019 से 2022 तक सेना प्रमुख रहे जनरल नरवणे ने 31 अगस्त 2020 की रात पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर रेचिन ला में चीनी पीएलए टैंकों और सैनिकों की आवाजाही के बाद रक्षा मंत्री के साथ हुई बातचीत का जिक्र किया है। जनरल नरवणे का संस्मरण 2024 में प्रकाशित होना था, लेकिन पिछले दो सालों से इसका प्रकाशन रुका हुआ है। इसका कारण यह है कि सेना और रक्षा मंत्रालय इसकी गहन जांच कर रहे हैं।

31 अगस्त 2020 को क्या हुआ था?

दिसंबर 2023 में समाचार एजेंसी पीटीआई ने संस्मरण के कुछ अंश पब्लिश किए। इसकी एक रिपोर्ट में 31 अगस्त 2020 को रक्षा मंत्री सिंह के साथ जनरल नरवणे की बातचीत का हवाला दिया गया था। जनरल नरवणे को सबसे पहले नॉर्दन कमांड चीफ लेफ्टिनेंट जनरल वाईके जोशी का फोन आया। उन्होंने लिखा, “31 अगस्त की शाम 8:15 बजे, लेफ्टिनेंट जनरल जोशी ने मुझे फोन किया, वे काफी चिंतित थे। उन्होंने बताया कि पैदल सेना के समर्थन से चार टैंक धीरे-धीरे रेचिन ला की ओर बढ़ रहे थे। उन्होंने एक लाइटिंग वाला गोला दागा था, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। मुझे स्पष्ट आदेश थे कि जब तक पूरी तरह से रास्ता साफ न हो जाए तब तक गोलीबारी न करूं।”

जनरल नरवणे ने बताया कि इसके बाद उन्होंने रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री एस जयशंकर, एनएसए अजित डोभाल और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत को फोन किया। उन्होंने कहा, “मैंने हर एक से यही पूछा, ‘मुझे क्या आदेश मिले हैं?’ रात 9:10 बजे नॉर्दन कमांड से फिर फोन आया, टैंक आगे बढ़ते जा रहे थे और अब शिखर से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर थे।” नरवणे लिखते हैं, “मैंने रात 9:25 बजे फिर से रक्षा मंत्री को फोन किया, फिर जानकारी दी और एक बार फिर स्पष्ट निर्देश मांगे। स्थिति तनावपूर्ण थी। टेलीफोन लाइनें लगातार बज रही थीं।”

हॉटलाइन मैसेज एक्सचेंज हुए और पीएलए कमांडर मेजर जनरल लियू लिन ने सुझाव दिया कि दोनों पक्षों को आगे की कोई भी गतिविधि रोक देनी चाहिए और दोनों लोकल कमांडर को अगली सुबह 9:30 बजे दर्रे पर मिलना चाहिए। जनरल नरवणे का कहना है कि उन्होंने रात 10 बजे रक्षा मंत्री और एनएसए डोभाल को फोन करके यह जानकारी दी।

सारी जिम्मेदारी मुझ पर थी- जनरल नरवणे

जनरल नरवणे ने लिखा, “मैंने अभी फोन रखा ही था कि रात 10:10 बजे जो ने फिर से फोन किया। उसने बताया कि टैंक फिर से आगे बढ़ने लगे हैं और अब वे सिर्फ 500 मीटर दूर हैं।” मैंने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया , जिन्होंने कहा कि वे मुझसे संपर्क करेंगे और उन्होंने लगभग साढ़े दस बजे तक ऐसा कर दिया।

उन्होंने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री से बात की है और यह पूरी तरह से सैन्य फैसला है। पीएम ने कहा कि ‘जो उचित समझो वो करो’। मुझे एक मुश्किल स्थिति में डाल दिया गया था। इस खुली छूट के साथ, अब सारी जिम्मेदारी मुझ पर थी। मैंने गहरी सांस ली और कुछ मिनटों तक चुपचाप बैठा रहा। दीवार घड़ी की टिक-टिक के अलावा सब कुछ शांत था।

भारत और चीन के बीच सैन्य गतिरोध अप्रैल 2020 में शुरू हुआ और अक्टूबर 2024 तक जारी रहा। कई दौर की सैन्य और राजनयिक वार्ता के बाद दोनों देशों ने पूर्वी लद्दाख में एलएसी (LAC) के साथ पुराने तनाव वाले बिंदुओं से सैनिकों को पीछे हटाने पर आपसी सहमति जताई। अक्टूबर 2024 से पहले कुछ पेट्रोलिंग प्वाइंट पर सैनिकों को पीछे हटाया गया था।

गेंद रक्षा मंत्रालय और पब्लिशर के पाले में है- नरवणे

जनरल नरवणे ने इससे पहले इंडियन एक्सप्रेस को बताया था, “मुझे इस किताब को लिखने में आनंद आया और यही मायने रखता है। मुझे इसे लिखने से ही संतुष्टि मिली है।” अक्टूबर 2025 में कसौली में आयोजित खुशवंत सिंह साहित्य महोत्सव में एक सत्र के बाद उन्होंने कहा कि उनका काम किताब लिखना और उसे प्रकाशक को सौंपना था। प्रकाशक को ही रक्षा मंत्रालय से अनुमति लेनी थी। उन्होंने कहा, “उन्होंने (किताब) उन्हें दे दी है। अभी इसकी समीक्षा चल रही है।”

जनरल नरवणे ने आगे कहा कि पब्लिशर और रक्षा मंत्रालय लगातार संपर्क में थे। उन्होंने कहा, “इसलिए इस मामले में आगे कार्रवाई करना मेरा काम नहीं है। गेंद पब्लिशर और रक्षा मंत्रालय के पाले में है। लेकिन मुझे किताब लिखने में आनंद आया, चाहे अच्छा हो या बुरा। बस यही बात है। रक्षा मंत्रालय जब चाहे तब अनुमति दे सकता है।”

किताबों की पब्लिशिंग को लेकर क्या है नियम?

आर्म्ड फोर्स के सेवारत अधिकारियों और नौकरशाहों के लिए किताब पब्लिशिंग के लिए कुछ खास नियम लागू होते हैं। हालांकि, रिटायर्ड अधिकारियों के मामले में यह कुछ साफ नहीं है। आर्मी रूल, 1954 की धारा 21 में कहा गया है कि एक्ट के तहत कोई भी व्यक्ति किसी भी रूप में राजनीतिक प्रश्न या सेवा विषय से संबंधित किसी भी मामले को प्रकाशित नहीं करेगा या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रेस को सूचित नहीं करेगा या उसमें कोई सेवा संबंधी जानकारी शामिल नहीं करेगा।” इसके अलावा, केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना ऐसे सवाल या विषय पर या ऐसी जानकारी युक्त कोई किताब, पत्र, लेख या अन्य दस्तावेज पब्लिश करना या प्रकाशित करवाने पर पूरी तरह रोक है।

नियमों में साफ तौर से यह नहीं बताया गया है कि रिटायर रक्षा सेवा अधिकारियों को किताब प्रकाशित करते समय किस प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। लेकिन एक रक्षा सूत्र ने इंडियन एक्सप्रेस को बताते हुए सेंट्रल सिविल सर्विस (पेंशन) नियम, 1972 का हवाला दिया। इसे डीओपीटी विभाग ने जून 2021 में संशोधित किया था। संशोधित नियमों के मुताबिक, खुफिया या सुरक्षा संबंधी संगठनों में सेवा दे चुके रिटायर्ड सरकारी कर्मचारियों को रिटायरमेंट के बाद इजाजत के बिना संगठन से संबंधित कोई भी जानकारी पब्लिश करने से रोक दिया गया है। एक अधिकारी ने बताया कि भले ही सशस्त्र बल इन नियमों के दायरे में नहीं आते हैं, फिर भी इन संशोधित नियमों का पालन करना चाहिए। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…