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अलविदा: शुक्रवार सुबह कृष्णा सोबती ने ली आखिरी सांस, खत्म हुआ साहस और स्वाभिमान के लेखन का ‘जिंदगीनामा’

जब साठ के दशक में मित्रो मरजानी लिखा था तो वह देश और काल से एक स्त्री कलम की मुठभेड़ थी। पुरुषों के बनाए साहित्यिक उपनिवेश में वर्जनाओं को तोड़ने का यह लेखिका का स्वतंत्रता संग्राम था।

Author January 26, 2019 8:18 AM
कृष्णा सोबती। इलस्ट्रेशन : इंडियन एक्सप्रेस

‘मैं उस सदी की पैदावार हूं जिसने बहुत कुछ दिया और बहुत कुछ छीन लिया। यानी एक थी आजादी और एक था विभाजन। मेरा मानना है कि लेखक सिर्फ अपनी लड़ाई नहीं लड़ता और न ही सिर्फ अपने दुख-दर्द और खुशी का लेखा-जोखा पेश करता है। लेखक को उगना होता है भिड़ना होता है हर मौसम और हर दौर से। नजदीक और दूर होते रिश्तों के साथ, रिश्तों के गुणा और भाग के साथ इतिहास के फैसलों के साथ’। भारत की आजादी और विभाजन जैसे ऐतिहासिक फैसलों से गुजरने और उससे सबकों को रचने वालीं कृष्णा सोबती का शुक्रवार सुबह निधन हो गया। अगले महीने 18 तारीख को 94 साल की होने वालीं कृष्णा सोबती पिछले दो महीने से बीमार थीं। एक निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। दिल्ली के निगम बोध घाट पर उनका अंतिम संस्कार हुआ।

18 फरवरी 1925 को मौजूदा पाकिस्तान में जन्मीं कृष्णा सोबती हमेशा कहती थीं कि जो मैंने देखा और जिया – वही लिखा। वे अपने समय का उत्पाद थीं जो बहुत आगे के समय के साथ भी मुठभेड़ कर रही थीं। साठ के दशक में जब ‘मित्रो मरजानी’ लिखा तो सोचने-समझने वालों के लिए नए दरवाजे खोले। साहित्य जगत सोबती को साहस और स्वाभिमान की अभिभावक कह सलाम करता रहा है। उनकी ‘मित्रो मरजानी’ की किरदार आज भी पितृसत्ता से मुकाबला कर रही है, अपने गढ़े और रचे गए अंदाज में। हिंदी साहित्य की यह कालजयी किरदार हर तरह के पाखंड के खिलाफ हल्ला बोल है। जब साठ के दशक में मित्रो मरजानी लिखा था तो वह देश और काल से एक स्त्री कलम की मुठभेड़ थी। पुरुषों के बनाए साहित्यिक उपनिवेश में वर्जनाओं को तोड़ने का यह लेखिका का स्वतंत्रता संग्राम था। उनकी रचनाओं में किरदारों का दोहराव नहीं होता था। हर उपन्यास का अपना अलग युद्ध-क्षेत्र था और उनके किरदार अलहदा योद्धा। उनका साहित्य वर्जनाओं से मुक्ति आंदोलन सरीखा ही था।

‘सूरजमुखी अंधेरे के’ उपन्यास एक ऐसी औरत के संघर्ष को सामने लाता है जो बलात्कार की शिकार थी। इसकी किरदार के जरिए सोबती अपने समय से बहुत आगे जाकर संवाद कर रही थीं। सोबती की स्त्रियां रुमानियत के ढर्रे से बाहर निकल जिंदगी के खुरदरेपन से मुकाबला करती हैं। ‘जिंदगीनामा’, ‘दिलो-दानिश’, ‘डार से बिछुड़ी’, ‘समय सरगम’ जैसे बड़े उपन्यास ‘ऐ लड़की’, ‘बादलों के घेरे’ जैसी कहानियां और तीन खंडों में ‘हम हशमत’ जैसा संस्मरण-रेखाचित्र-संग्रह देनेवालीं कृष्णा सोबती 94 साल की उम्र में भी पूरे होश और जोश से लिख रही थीं। ‘जिंदगीनामा’ पर कॉपीराइट को लेकर उनकी मकबूल लेखिका अमृता प्रीतम के साथ लंबी अदालती लड़ाई भी चली थी। हाल ही में उनका नया उपन्यास ‘चिन्ना’ आया था।

जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने कहा कि उनकी कृतियों के अनुवाद अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में हुए और सराहे गए। साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ सम्मान, साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता, हिंदी अकादमी दिल्ली के शलाका सम्मान आदि से सम्मानित कृष्णा जी उम्र के इस मुकाम पर भी रचनारत थीं और हाल-हाल तक ‘गुजरात पकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान’ और ‘मार्फत दिल्ली’ जैसी कृतियां हिंदी जगत को देती रहीं, यह किसी आश्चर्य से कम नहीं।

साहित्य अकादेमी के सचिव के श्रीनिवासराव ने कहा कि सोबती की रचना में आख्यान का तत्त्व प्रधानता से मौजूद रहा है और हिंदी-उर्दू का हिंदुस्तानी संस्कार आपकी भाषा और कहन के अंदाज को अनुपम बना देता है। उनकी रचनात्मक संवेदनशीलता स्त्रियों और मुसलिम समाज को बहुत आत्मीयता से स्पर्श करती हैं और उनके सम्यक संसार को अपनी सृजनात्मकता के केंद्र में ले आती हैं। दक्षिण एशियाई फलक पर साहित्य के परिदृश्य में कुरर्तुल ऐन हैदर, इस्मत चुगताई, अमृता प्रीतम जैसी दिग्गज पूर्ववर्ती लेखिकाओं से अलग, कृष्णा सोबती अपनी रचनाओं में एक विशिष्ट संवेदना, मुहावरे और बहुत स्थानिक पर्यावरण की खुशबू संजोए, हमें उद्वेलित, विचलित और रोमांचित करती हैं।

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