जम्मू और कश्मीर सरकार ने कश्मीर के सभी सरकारी और निजी स्कूलों और कोचिंग सेंटरों के प्रमुखों को निर्देश दिया है कि वे अपने पुस्तकालयों, कार्यालयों, कक्षाओं और स्टाफ रूम में मौजूद किताबों की जांच करें। यह निर्देश किताबों में अनुचित या आपत्तिजनक सामग्री की जांच के लिए दिया गया। इसके अलावा, उन्हें अपने-अपने मुख्य या क्षेत्रीय शिक्षा अधिकारियों को एक प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है जिसमें यह प्रमाणित किया गया हो कि उनके शिक्षण संस्थान में मौजूद किसी भी किताब में कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं है।
यह कदम भाजपा द्वारा सरकारी स्कूलों द्वारा कुछ अलगाववादी नेताओं के कथित महिमामंडन के विरोध में पुस्तकों की खरीद के खिलाफ प्रदर्शन के कुछ दिनों बाद उठाया गया है । यह घटना जम्मू-कश्मीर गृह विभाग द्वारा अगस्त 2025 में कश्मीर पर लिखी गई 25 पुस्तकों के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगाने के लगभग एक साल बाद हुई है जिनमें अरुंधति रॉय और एजी नूरानी जैसे लेखकों की पुस्तकें भी शामिल हैं। विभाग का कहना था कि ये पुस्तकें अलगाववाद का प्रचार करती हैं।
विद्यालयों, कोचिंग को जारी किया गया यह निर्देश
यह आदेश 6 जुलाई को कश्मीर के विद्यालय शिक्षा निदेशक द्वारा जारी किया गया था। जिसमें कहा गया, “कश्मीर के विद्यालय शिक्षा निदेशालय के अधिकार क्षेत्र में संचालित होने वाले सभी सरकारी विद्यालयों, मान्यता प्राप्त निजी विद्यालयों और कोचिंग संस्थानों के संस्थााध्यक्षों को निर्देश दिया जाता है कि वे अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में उपलब्ध सभी पुस्तकों की व्यापक जांच करें जिसमें कार्यालय, कक्षाएं, स्टाफ कक्ष, विद्यालय पुस्तकालय शामिल हैं।”
‘किसी भी किताब में अनुचित या आपत्तिजनक सामग्री न हो’
आदेश में कहा गया है, “इस जांच का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी पुस्तक में अनुचित या आपत्तिजनक सामग्री न हो। इसमें ऐसी सामग्री शामिल है जो किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं का उल्लंघन कर सकती है, चाहे वह छात्रों के लिए अनुचित सामग्री हो, प्रचलित कानूनों के विरुद्ध सामग्री हो जिससे राष्ट्रीय हित को नुकसान पहुंच सकता है, शैक्षिक मूल्यों और स्थापित मानदंडों को प्रभावित कर सकता है।”
आदेश में कहा गया है कि अगर संस्थानों के प्रमुखों द्वारा किसी भी आपत्तिजनक सामग्री की पहचान की जाती है तो वे पुस्तक का टाइटल, लेखक, प्रकाशक, प्रकाशन का वर्ष और शैक्षणिक संस्थान के पास मौजूद पुस्तकों की संख्या जैसी विस्तृत जानकारी प्रदान करेंगे और इसे सात दिनों के भीतर उच्च अधिकारियों को जांच के लिए प्रस्तुत करेंगे।
मुख्य शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे संस्थानों के प्रमुखों द्वारा जारी किए गए प्रमाण पत्रों की व्यक्तिगत रूप से जांच और निगरानी करें और आठ दिनों के भीतर कश्मीर के स्कूल शिक्षा निदेशक को एक रिपोर्ट प्रस्तुत करें। आदेश में लिखा है, “इन निर्देशों के अनुपालन में किसी भी प्रकार की चूक को गंभीरता से लिया जाएगा और लागू नियमों के तहत दोषी अधिकारीयों के खिलाफ उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।”
जम्मू-कश्मीर की शिक्षा मंत्री सकीना इटू ने इसे सोची-समझी साजिश बताते हुए कहा था कि स्कूलों में ऐसी किताबें पहुंचाने में शामिल पाए जाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
पीडीपी ने बताया- इतिहास को मिटाने का प्रयास
पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के नेता वहीद पारा ने इसे हमारी सामूहिक स्मृति को फिर से लिखने का प्रयास बताया। पारा ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान कहा, “यह हमारी सामूहिक स्मृति को फिर से लिखने और हमारे अपने इतिहास को पाठ्यक्रम से मिटाने का प्रयास है। यह चयनात्मक शिक्षा को बढ़ावा देता है और भावी पीढ़ियों की प्रश्न पूछने, आलोचनात्मक रूप से सोचने और अपने अतीत को समझने की क्षमता को छीन लेता है।”
जम्मू और कश्मीर सरकार ने दो किताबों को लिया था वापस
इस महीने की शुरुआत में, जम्मू और कश्मीर सरकार ने अलगाववाद पर अनुचित सामग्री होने के आधार पर अपने स्कूल पुस्तकालयों से दो पुस्तकें वापस ले ली थीं। इसके तुरंत बाद, गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज होने के बाद, जम्मू-कश्मीर पुलिस की खुफिया शाखा ने पुस्तक के प्रकाशक के जम्मू स्थित परिसर में तलाशी ली। वापस ली गई किताबें, हिलाल अहमद और संतोष मीना द्वारा लिखित ‘जम्मू-कश्मीर के व्यक्तित्व और दिग्गज’ और डॉ. सुशांत गिरी द्वारा लिखित ‘जम्मू-कश्मीर के महान व्यक्तित्व’, ओबेरॉय बुक सर्विस, जम्मू और अनुराग प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई थीं और उच्च माध्यमिक कक्षाओं के लिए समग्र शिक्षा कार्यक्रम के तहत स्कूल पुस्तकालयों को दी गई थीं।
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