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दिल्ली के अंदेशे से BJP फिलहाल पीछे हटी कश्मीर में

विवेक सक्सेना दिल्ली के विधानसभा चुनाव के कारण ही भाजपा नेतृत्व को जम्मू-कश्मीर में सरकार के गठन को टालना पड़ गया। केंद्र की मोदी सरकार इन खुफिया रिपोर्टों से बहुत चिंतित थी कि अगर कोई न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाकर पीडीपी के साथ सरक ार बनाई गई तो भाजपा को दिल्ली के विधानसभा चुनाव में इसकी […]

Author January 13, 2015 10:55 AM
दिल्ली के विधानसभा चुनाव के कारण ही भाजपा नेतृत्व को जम्मू-कश्मीर में सरकार के गठन को टालना पड़ा (फोटो: भाषा)

विवेक सक्सेना

दिल्ली के विधानसभा चुनाव के कारण ही भाजपा नेतृत्व को जम्मू-कश्मीर में सरकार के गठन को टालना पड़ गया। केंद्र की मोदी सरकार इन खुफिया रिपोर्टों से बहुत चिंतित थी कि अगर कोई न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाकर पीडीपी के साथ सरक ार बनाई गई तो भाजपा को दिल्ली के विधानसभा चुनाव में इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

चुनाव नतीजे आने के एक पखवाड़ा बीत जाने कोे बाद भी जम्मू-कश्मीर में कोई सरकार इसलिए नहीं बन सकी थी कि भाजपा चाहती थी कि किसी को बहुमत न मिलने के कारण जो सरकार बने, उसमें उसकी भागीदारी हो। पहले वह डॉ जीतेंद्र सिंह को अपना मुख्यमंत्री बनाना चाहती थी, जिसके लिए पीडीपी किसी भी कीमत पर तैयार नहीं थी। वैसे हो सकता है कि सरकार बनने की स्थिति में वे उप मुख्यमंत्री बनाए जाएं। भाजपा की फितरत को जानने वाले मुफ्ती मोहम्मद सईद चाहते थे कि पहले न्यूनतम साझा कार्यक्रम बन जाए , उसके बाद ही सरकार बनाने पर विचार हो।

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सूत्रों के मुताबिक, इंटेलीजेंस ब्यूरो ने सरकार को भेजी अपनी रिपोर्ट में आगाह किया था कि जम्मू-कश्मीर में भाजपा जो रुख अपनाती आई है, अगर उसमें जरा भी ढील दी गई तो दिल्ली विधानसभा चुनाव में उसे इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। अगर अनुच्छेद 370 या अफस्पा कानून हटाए जाने सरीखे मुद्दों पर कोई नरमी बरती गई तो इससे भाजपा का पारंपरिक कट्टरपंथी वोट बैंक नाराज हो जाएगा। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया था कि बिजली, पानी व महंगाई बड़े मुद्दे हैं। इन पर चुप्पी साध लेने के कारण राजधानी में भाजपा का जनाधार घट रहा है। सरकारी कर्मचारियों का केंद्र की मोदी सरकार से मोहभंग होने लगा है। राजधानी के उसके सांसद समेत कमोबेश सभी नेताओं की छवि व कामकाज अच्छा नहीं है। पार्टी नेता बेहद मगरूर हो गए हैं व इस तरह से बरताव करने लगे हैं मानो कि उनकी सरकार बन चुकी हो। इसलिए जम्मू-कश्मीर में सत्ता में आने की पार्टी को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

इस रिपोर्ट की पुष्टि रविवार को रामलीला मैदान में मोदी की रैली में हो भी गई जहां लोकसभा चुनाव की सभाओं की तुलना में कहीं कम भीड़ जमा हुई। वह भी पहले जितनी उत्साही नहीं थी। इससे भी ज्यादा परेशान करने वाली खबर यह थी कि इस बार राजधानी के मुसलिम मतदाता को विकल्प मिल गया है और इक्का-दुक्का अपवाद को छोड़कर वे थोक में केजरीवाल को वोट देने का मन बना चुके हैं। सबसे अहम बात तो यह है कि राजधानी का पढ़ा-लिखा मतदाता भी यह सोच रहा है कि उसके हित में यही रहेगा कि राजधानी में आप की सरकार बन जाए जिससे केंद्र की मोदी सरकार दबाव में रहे व मोदी के डर से केजरीवाल ऊलजुलूल हरकतें न कर सकें।

पीडीपी के सूत्रों के मुताबिक, वे चाहते थे कि जो न्यूनतम साझा कार्यक्रम बने उसमें अनुच्छेद 370 पर किसी तरह की कोई बात न करने का प्रावधान किया जाए। इसके साथ ही पहले वहां से अशांत क्षेत्रों के लिए लागू अफस्पा कानून हटाया जाए या सरकार बनने के बाद किस्तों में उसे हटाने की बात कही जाए। मालूम हो कि दिसंबर में आए चुनाव नतीजों में 87 सदस्यीय विधानसभा में पीडीपी 28 सीटें हासिल करके सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी जबकि भाजपा 25 सीटें जीतकर दूसरे नंबर पर रही थी। नेशनल कांफ्रेंस को 15 व कांग्रेस को 12 सीटें मिली थीं। दो सीटों पर क्षेत्रीय दल के उम्मीदवार जीते थे जबकि बाकी सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी। वहां हर हालत में 19 जनवरी तक नई विधानसभा का गठन हो जाना चाहिए था क्योंकि उस दिन तक ही मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल था।

वहां 9 जनवरी को राज्यपाल शासन लागू करने की वजह यह बताई गई कि उमर अब्दुल्ला कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में तब तक काम करते रहने के लिए तैयार नहीं थे। यह स्वाभाविक था क्योंकि वे भाजपा को उसके खेल में क्यों मदद करते। इसके पहले भी 2002 में जब ऐसे ही हालात पैदा हुए थे व कांग्रेस व पीडीपी संख्या बल जुटाने में समय ले रहे थे, तब फारूक अब्दुल्ला ने कार्यवाहक मुख्यमंत्री बने रहने के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के अनुरोध को ठुकरा दिया था।

 

 

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