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झारखंड विधानसभा चुनाव: आदिवासी राजनीति की पराजय

झारखंड विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद मैंने रांची में रहने वाले पत्रकारों से अनुरोध किया कि वे अपने प्रदेश के प्रमुख शहरों के नाम बताएं। या फिर उन जगहों के नाम बताएं, जिनसे झारखंड को पहचाना जाता है। रांची, जमशेदपुर (टाटा नगर), धनबाद, झरिया, हजारीबाग, रामगढ़, कोडरमा, बोकारो, देवघर, गिरिडीह तक आते-आते उनकी रफ्तार रुक […]

Author January 21, 2015 14:59 pm
झारखंड विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद मैंने रांची में रहने वाले पत्रकारों से अनुरोध किया कि वे अपने प्रदेश के प्रमुख शहरों के नाम बताएं। (फाइल फ़ोटो)

झारखंड विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद मैंने रांची में रहने वाले पत्रकारों से अनुरोध किया कि वे अपने प्रदेश के प्रमुख शहरों के नाम बताएं। या फिर उन जगहों के नाम बताएं, जिनसे झारखंड को पहचाना जाता है। रांची, जमशेदपुर (टाटा नगर), धनबाद, झरिया, हजारीबाग, रामगढ़, कोडरमा, बोकारो, देवघर, गिरिडीह तक आते-आते उनकी रफ्तार रुक गई। चुनाव नतीजे, शहरी क्षेत्र और आदिवासी उम्मीदवार विषय पर शोध प्रक्रिया के तहत ये सवाल पूछे गए थे।

जो नाम लिए गए हम उन्हें विकास की राह के रूप में भी देख सकते हैं। क्या झारखंडवासियों के लिए यही शहर हैं या उन्हें शहरोन्मुख विकास का विस्तार इन्हीं शहरों के रूप में दिखता है। शासन पद्धति के रूप में संसदीय लोकतंत्र का विकास और शहरों के रूप में सुख-सुविधाओं और धंधों के विकास के बीच सीधा रिश्ता है। झारखंड को आदिवासी बहुल प्रदेश कहा जाता है। लेकिन झारखंड में जो संसदीय लोकतंत्र का विकास दिख रहा है उसे उसके शहरी इलाकों के विधानसभा क्षेत्रों के चुनाव नतीजों पर एक नजर डाल कर देखा जाना चाहिए। इसका संबंध मौजूदा संसदीय लोकतंत्र में आदिवासियों के अस्तित्व से जुड़ा है। इन शहरी इलाकों वाले विधानसभा क्षेत्रों की उम्मीदवारों की सूची में झारखंड के आदिवासियों को खोजना मुश्किल है। नतीजा यह है कि शहरी विधानसभा क्षेत्रों से एक भी आदिवासी उम्मीदवार नहीं जीता है।

हम जैसे-जैसे शहरी विकास की तरफ बढ़े हैं, आदिवासी जंगलों की तरफ धकेले गए हैं। एशियाटिक सोसायटी ने माया दत्त द्वारा जमशेदपुर बनने की प्रक्रिया को लेकर किया गया एक अध्ययन छापा है। 1919 में सांकची की जगह जैसे-जैसे जमशेदपुर के पांव पसरते गए, वहां आदिवासियों का अस्तित्व मिटता गया। यह कोई अपवाद नहीं है। शहरी मॉडल के विकास के साथ आदिवासी खत्म होते हैं, यह लगभग स्थापित तथ्य है। देश भर में आदिवासी आबादी पर एक नजर डालें तो यह तस्वीर और साफ दिखने लगती है।

उत्तराखंड में आदिवासियों को वहां का मूलवासी कहा जाता है और वहां की मात्र दस प्रतिशत आबादी के बारे में सरकार का दावा है कि वह शहरी इलाकों में रहती है। झारखंड को लेकर एक दिलचस्प वाकया है। मशहूर वकील प्रशांत भूषण और मैं करीब चार साल पहले जमशेदपुर में विस्थापन के खतरे के खिलाफ एकजुट लोगों की एक सभा में भाग लेने गए। तब तक हमारे दिमाग में यही चल रहा था कि जमशेदपुर में अब आदिवासियों के अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है और वे अपने विस्थापन की अंतिम लड़ाई वहां लड़ रहे हैं। क्योंकि यह विस्थापन सभा खेती और दूसरे पेशे की जगहों से विस्थापन के खतरे को लेकर नहीं थी। बल्कि रहने के लिए बनाए गए कमरों और उसके मुहल्लों से विस्थापन के लिए थी।

खेती-बाड़ी की जमीन से विस्थापन तो इतिहास का हिस्सा हो गया। लेकिन यह भी हमारा भ्रम था। हम समय से काफी पीछे चल रहे थे। वहां आदिवासी का अस्तित्व हर मायने में कभी का खत्म हो चुका है। जमशेदपुर में जो लोग उस समय विस्थापन की समस्या से जूझ रहे थे वे ऐसे लोग थे जो 1919 के बाद से लगातार आदिवासियों के विस्थापन के साथ-साथ बसते चले गए। शहरी विकास का अर्थ तब हमें यह समझ में आया कि स्मार्ट सिटी का मतलब है कि जो विकास के इस युद्ध में सबसे कमजोर साबित हो चुके हैं, उनका विस्थापन होता है।

जाहिर है कि शहरोन्मुख संसदीय राजनीति में आदिवासी का एक मतदाता के रूप में नहीं बचे रहने का मतलब यह निकाला जा सकता है कि संसदीय लोकतंत्र को वे अपने अस्तित्व के लिए खतरे के रूप में देख सकते हैं।

पांच सौ चालीस सीटों की लोकसभा में पांच सौ स्मार्ट सिटी बनाने की परिकल्पना का अर्थ तो यही निकाला जा सकता है कि देश की संसदीय राजनीति से आदिवासी, यानी इस विकास आक्रमण में सबसे कमजोर साबित होने वाली जातियों के विलुप्त होने की घोषणा है।
इसी पृष्ठभूमि में झारखंड में पहला गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री बनने पर खुशियां जतार्इं और आदिवासी मुख्यमंत्री न होने के पक्ष में जो वजहें बताई जा रही हैं, उनका अध्ययन जरूरी लगता है। झारखंड में पहला गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री बनने का परिप्रेक्ष्य यह है कि वहां इस बार संसदीय लोकतंत्र में आदिवासी राजनीति की हार की घोषणा हुई है।

गैर-आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाए जाने का सबसे मजबूत तर्क है कि अब तक आदिवासियों के बीच से आने वाले मुख्यमंत्रियों ने आदिवासियों के लिए कुछ खास नहीं किया। पर सवाल है कि किस जाति और समुदाय के मुख्यमंत्री या नेतृत्व ने आदिवासियों के अस्तित्व को क्रमश: खत्म करने की विकास प्रक्रिया को रोका है?

जिन इलाकों की पहचान बड़ी तादाद में आदिवासियों की मौजूदगी वाले प्रदेश के रूप में की जाती है उनमें किस गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री ने उनके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाने वाली शासन पद्धति मूलक प्रक्रिया पर लगाम लगाई है? संसदीय लोकतंत्र में सरकार चलाने के लिए पार्टी को चुना जाता है। आदिवासी मुख्यमंत्री किस पार्टी से रहे हैं?

झारखंड में सबसे अधिक समय तक भाजपा की सरकार रही है। संसदीय सत्ता में किस जाति का मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं पाया गया है? गैर-आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाने के पीछे चिंता यह नहीं है कि आदिवासी मुख्यमंत्री ने आदिवासियों के लिए कुछ नहीं किया, बल्कि आदिवासी प्रतिनिधि के नेतृत्व में चलने वाली इस अंतिम सरकार की घोषणा करने की जल्दबाजी से निकला कुतर्क है।

अब तक संसदीय लोकतंत्र के झारखंड अध्याय में आदिवासी राजनीति मुख्य स्वर रहा है। विधानसभा चुनाव में इस मुख्य स्वर की मिलजुल कर पराजय सुनिश्चित की गई है। संसदीय राजनीति की दिशा की पहचान ऐसे ही मोड़ पर की जाती है। हिंदुत्व की पहले एक पार्टी थी, लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव से पहले ही संसदीय राजनीति हिंदुत्ववाद की तरफ झुकती चली गई। झारखंड में चुनाव लड़ने वाली किसी भी पार्टी के लिए प्रदेश में सत्ता का नेतृत्व गैर-आदिवासी की राजनीति की तरफ बढ़ गया है।

इस बात को पंजाब के संदर्भ में भी हम समझें। अकाली दल आंदोलनों की एक लंबी कड़ी से गुजरते हुए सिखों की पार्टी के रूप में खड़ा हुआ, लेकिन प्रकाश सिंह बादल ने उसे पंजाबी पार्टी में परिवर्तित कर दिया। नाम से अकाली पार्टी है। पंजाबी पार्टी के रूप में घोषणा में उसकी व्यापकता दिखाई देती है। लेकिन यह व्यापकता वर्चस्ववादी राजनीति का पर्याय है। इसीलिए यह अकारण नहीं है कि उसका मुख्य स्वर हिंदुत्व के साथ राजनीतिक रिश्ते में तब्दील हो गया है।

संसदीय राजनीति में अब तक क्या होता रहा है? कमजोर, गरीब, वंचित को उठाने की जिम्मेदारी अमीर, ताकतवर और सुविधा संपन्न प्रतिनिधियों ने ली। जब इसका सच सामने आया तो दूसरी तस्वीर तैयार मिली, जिसमें कमजोर, गरीब, वंचितों के बीच प्रतिनिधियों द्वारा अपने लोगों को मजबूत करने की कोशिश दिखी। लेकिन इन वर्गों के लिए दोनों तस्वीरों में एक ही तरह के नतीजे निकले। संसदीय राजनीति में गरीबों, कमजोरों के लिए दोनों तरह के तर्क थोपे गए थे। तीसरी तस्वीर यह भी दिखी कि प्रतिनिधि कमजोर, गरीब, वंचित दिखने वालों जैसे हों, लेकिन उससे मजबूत लोगों को और मजबूत करने का काम लिया गया। एक प्रतिनिधि हरकारे में तब्दील हो गया।

शहर जैसे-जैसे बढ़ रहे हैं और जमशेदपुर जैसे शहरों में कमजोर लोगों का विस्थापन बढ़ता देखा जा रहा है, संसदीय राजनीति में भी ऐसे विस्थापन की प्रक्रिया चल रही है।

दो अलग स्वभाव की प्रक्रियाएं एक साथ नहीं चल सकतीं। एक तरफ तो विकास मजबूत लोगों के लिए हो और राजनीति में प्रतिनिधि कमजोर लोगों के आएं। इस दौर को लगभग समाप्त माना जाना चाहिए। जिन प्रतिनिधियों के जरिए जल, जंगल, जमीन और दूसरे संसाधन छीनने का काम लिया जा रहा था, राजनीति में उनके विस्थापन का दौर चल पड़ा है। झारखंड में आदिवासी मुख्यमंत्री का न होना उनके संसदीय सत्ता से विस्थापन की एक प्रक्रिया का ही हिस्सा है।

मोहनदास करमचंद गांधी ने संसदीय लोकतंत्र में क्यों इस बात पर जोर दिया कि किसी दलित और उसमें भी महिला को राष्ट्रपति होना चाहिए। हाशिए पर खड़े लोगों को समानता की स्थिति में पहुंचाने के लिए संसदीय राजनीति को सबसे बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के दर्शन की यह उपज थी। यह बात तो पहले से की जाती रही है कि संसदीय राजनीति में वोट देने का अधिकार सबको है, लेकिन यह सबके पास सबका वोट लेने में निहित नहीं है। वोट तो वही लेगा, जो धन बल से ताकतवर होगा।

आदिवासी और दलित सबका वोट नहीं ले सकते, यह पैंसठ वर्ष के अनुभव से भी कहा जा सकता है। दुनिया की बनती महाशक्ति और सबसे बड़े लोकतंत्र के इस दावे के पीछे सच्चाई यह है कि पूरे देश से एक भी दलित और आदिवासी को गैर-दलितों, आदिवासियों के लिए सुरक्षित सीट से चुनवा लेना संभव नहीं है। झारखंड में शहर जैसे-जैसे बढ़ रहे हैं पहले आदिवासी घटे और उसके साथ उम्मीदवार घट रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी शायद आखिरी उम्मीदवार होंगे, जो कि ऐसे दो इलाकों से लड़े और वे पराजित हो गए।

झारखंड में आदिवासी नेतृत्व की जरूरत इसीलिए थी कि वह नेतृत्व कम से कम अपने आप को बनाए रखने के लिए आदिवासी हितों का राग अलापता रहता। हेमंत सोरेन ने अपने पूरे शासनकाल में भले खुद को आदिवासी प्रतिनिधि के रूप में अहसास दिलाने की कोशिश की हो, लेकिन पांच चरणों के चुनाव में ज्यों-ज्यों आदिवासी बहुल इलाके में मतदान के करीब बढ़ते गए त्यों-त्यों उन्हें आदिवासी हितों की बात शुरू करनी पड़ी।

इस तरह से कि गैर-आदिवासियों के खिलाफ उससे गुस्सा पैदा किया और चौबीस-अड़तालीस घंटे के गुस्से को वोट में तब्दील किया जा सकता है। हेमंत सोरेन ने दूसरी पार्टियों और उनके नेताओं की नकल से ही यह सीखा है कि आजकल किसी समुदाय, मत, के खिलाफ घृणा या नफरत की भावना से लैस बात करके ही अपना वोट बैंक बनाया जा सकता है। लेकिन अब उसकी भी जरूरत नहीं बची है। झारखंड में आदिवासी राजनीति पराजय की तरफ बढ़ी है और विधानसभा चुनाव के बाद गैर-आदिवासी के मुख्यमंत्री बनने की एक प्रक्रिया में इसकी घोषणा दिखती है।

 

अनिल चमड़िया

 

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