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झारखंड के इन गांवों में नहीं मिलता मिड-डे मील, भूख मिटाने को बच्चे खाते हैं चूहे और खरगोश

सरकारी कागजों में यहां स्कूल भी चल रहा है और बच्चों को मिड-डे मील भी दिया जा रहा है।

हाथ में चूहा लिए एक बच्ची। (Photo: Screen Grab from NDTV video)

देश के कई इलाकों में जहां मिड-डे मील खाने से बच्चों के बीमार पड़ने की खबरें आती रहती हैं। वहीं एक इलाका ऐसा भी है जहां मिड-डे मील मिलना तो दूर बच्चों को चूहे और खरगोश खाकर गुजारा करना पड़ रहा है। अंग्रेजी न्यूज चैनल एनडीटीवी की एक रिपोर्ट में ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां बच्चे तेज भूख में चूहे और खरगोश जैसी चीजें खा जाते हैं। इससे कई बच्चों को डायरिया हो सकता है, साथ ही बच्चों की जान भी जा सकती है। कहने को यहां मिड डे मील स्कीम भी चल रही है, लेकिन उसके पैसे कहां जा रहे हैं किसी को नहीं पता।

क्या है रिपोर्ट: NDTV every life counts capmaign के तहत चैनल की एक रिपोटर झारखंड के साहिबगंज जिले में पहुंचती हैं। यहां के राजमहल हिल इलाके में कम से कम दो स्कूल ऐसे हैं जहां ना तो शिक्षक थे और ना ही विद्यार्थी थे। चूहा गांव ने नाम से मशहूर एक गांव की छात्रा ने बताया कि मास्टर स्कूल आते ही नहीं। गांव के प्रधान ने बताया कि शुरुआत में 50-60 बच्चे आते थे, लेकिन जब टीचर ने ही आना कम कर दिया तो बच्चे भी कम होते चले गए। छात्रा ने बताया कि स्कूल से मिड डे मील भी नहीं मिलता और वह अपने भाई के साथ चिड़िया और खरगोश जैसी चीजों का शिकार करके उन्हें खाते हैं। कागजों में यहां स्कूल भी चल रहा है और मिड-डे मील दिया जा रहा है। लेकिन धरातल पर ऐसा कुछ नहीं है।

क्या कहते हैं सरकारी आंकड़े:
सरकारी आंकड़े कहते हैं कि चूंहा पहाड़ गांव में 119 स्टूडेंट पढ़ते हैं, जबकि जागोरी गांव में 53 विद्यार्थी। वहीं रिपोर्ट में जो सच्चाई सामने आई है उसके मुताबिक, चूंहा पहाड़ में केवल 50-60 छात्र और जागोरी में 15 विद्यार्थी पढ़ते हैं। झारखंड के उपभोक्ता मामलों के मंत्री सरयू रॉय ने कहा कि जिन दो स्कूलों की बात की जा रही है वहां स्कूल मैनेजमेंट कमेटी स्थानीय लोगों की है। मिड-डे मील चलाने के लिए इन्हीं लोगों के अकाउंट में पैसा भेजा जाता है।

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