Jharkhand News: झारखंड के गढ़वा जिले से एक बेहद झकझोर देने वाली खबर सामने आई है। यहां एक गरीब आदिवासी परिवार बैंककर्मियों की असंवेदनशीलता का शिकार हो गया। एक बहू अपने 75 वर्षीय बीमार ससुर के इलाज के लिए बैंक खाते से मात्र 8,000 रुपये निकालने के लिए लगभग एक साल तक भटकता रही लेकिन बैंक की कागजी प्रक्रियाओं ने उसके पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया।
बैंक कर्मचारियों की कथित असंवेदनशीलता के कारण महिला को समय पर पैसे नहीं मिले और महिला के ससुर की मौत हो गई। इस दुखद घटना के बाद गुस्से में आए परिजनों ने शव को बैंक के सामने रखकर प्रदर्शन किया, जिसके बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं।
क्या है ये पूरा मामला?
दरअसल, यह मामला गढ़वा के बदगढ़ गांव का है। पीड़ित महिला फुलमणि लकरा के ससुर रतन लकरा तपेदिक (टीबी) से पीड़ित थे। उनके बैंक खाते में वृद्धावस्था पेंशन के 8,000 रुपये जमा थे, जिससे उनका इलाज होना था। पैसों की निकासी के लिए बैंक ने ई-केवाईसी अपडेट कराना अनिवार्य बताया था।
फुलमणि का आरोप है कि वे महीनों तक बैंक के चक्कर काटती रहीं। लंबी कतारों में खड़ी हुईं, लेकिन बैंक कर्मचारियों ने उनकी एक न सुनी। उल्टा उनके साथ बुरा बर्ताव किया गया और गुहार लगाने पर बैंक का दरवाजा मुंह पर बंद कर दिया गया। 6 जुलाई को पैसों के अभाव में इलाज न मिलने के कारण रतन लकरा का निधन हो गया।
दृष्टिहीन पति और 5 बच्चों की जिम्मेदारी
फुलमणि लकरा अपने परिवार की इकलौती कमाने वाली सदस्य हैं और दिहाड़ी मजदूरी करती हैं। उनके पति दृष्टिहीन हैं और घर में बुजुर्ग सास के अलावा पांच बच्चे भी हैं। फुलमणि ने बताया कि वह अपने ससुर को करीब 80 किलोमीटर दूर पलामू के डाल्टनगंज सदर अस्पताल में भर्ती कराना चाहती थीं।
एम्बुलेंस बुक करने के लिए ही उन्हें इन पैसों की सख्त जरूरत थी। ससुर की हालत देखने की मिन्नतें करने के बावजूद बैंक मैनेजर ने उनसे मिलने तक से मना कर दिया और कहा कि “साहब मीटिंग में हैं।”
बैंक सखी से लेकर कैशियर तक… हर जगह लगाई दौड़
नियमों के मुताबिक, गांवों में बिना बैंक जाए बुनियादी बैंकिंग सेवाएं देने के लिए ‘बैंक सखी’ नियुक्त की जाती हैं। फुलमणि के मुताबिक, उन्होंने बैंक सखी से लेकर संदेशवाहकों और कैशियरों तक, हर किसी से मदद मांगी, लेकिन किसी ने सही रास्ता नहीं दिखाया।
फूलमणि लकरा ने कहा, “मार्च से मैं लगातार दौड़ रही थी। बाद में एक अन्य ग्राहक ने मुझे बताया कि सिर्फ एक साधारण फॉर्म भरना था। जिस काम को बैंक एक दिन में करा सकता था, उसके लिए मुझे महीनों दौड़ाया गया।”
मुख्यमंत्री का एक्शन, अधिकारी बोले- “केवाईसी पहले ही हो चुकी थी”
बुजुर्ग की मौत के बाद जब परिजनों ने शव को बैंक के बाहर रखकर विरोध जताया, तो मामला मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन तक पहुंचा। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद तत्परता दिखाते हुए संदेशवाहक नंदलाल राम को निलंबित कर दिया गया है और शाखा प्रबंधक कृष्ण राम का तबादला कर दिया गया है।
हालांकि, इस मामले में प्रशासनिक और बैंक अधिकारियों का दावा थोड़ा अलग है। रांका के एसडीएम मोहम्मद परवेज़ ने शुरुआती जांच में बैंक स्तर पर कमियां तो मानीं, लेकिन कहा कि देरी को सीधे मौत से नहीं जोड़ा जा सकता क्योंकि केवाईसी प्रक्रिया 9 जून को ही पूरी हो चुकी थी।
वहीं बैंक के क्षेत्रीय प्रबंधक अरुण कुमार का कहना है कि परिवार को 9 जून को ही सूचित कर दिया गया था कि वे पैसे निकाल सकते हैं, लेकिन परिवार ने घर में शादी होने की वजह से आने में असमर्थता जताई थी।
व्यवस्था पर खड़े होते गंभीर सवाल
प्रशासनिक दावों और जांच के बीच बदगढ़ गांव का यह पीड़ित परिवार आज गहरे सदमे में है। ससुर को न बचा पाने का मलाल और बैंक के चक्करों ने उन्हें तोड़कर रख दिया है। यह घटना साफ तौर पर दर्शाती है कि बुजुर्गों और बीमारों की सुरक्षा के लिए बनाई गई डिजिटल और कागजी नौकरशाही कभी-कभी उन गरीब और निरक्षर लोगों के लिए ही सबसे बड़ी मुसीबत बन जाती है, जिनके कल्याण के लिए योजनाएं शुरू की जाती हैं।
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