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झारखंड: इस जिले के 10,000 आदिवासियों पर राजद्रोह का केस, चुनाव बह‍िष्‍कार पर चल रहा व‍िचार

रिपोर्ट के अनुसार, इन 19 एफआईआर में से 14 एफआईआर में देशद्रोह के चार्ज लगाए गए हैं, जिनमें 10 हजार से ज्यादा लोगों को आरोपी बनाया गया है। जिन लोगों पर देशद्रोह के आरोप लगाए गए हैं, वह खूंटी जिले की कुल जनसंख्या का 2% हैं।

झारखंड चुनावों के दौरान पत्थलगड़ी का मुद्दा फिर गर्मा गया है। (file image/youtube/video grab)

झारखंड में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने हैं। इन चुनावों के लिए पांच चरण में मतदान होगा, जो कि 30 नवंबर से शुरु हो जाएगा। वहीं राज्य के खूंटी जिले के कई गांवों में इन चुनावों के बहिष्कार की चर्चा चल रही है। दरअसल पत्थलगड़ी परंपरा के तहत आदिवासी बहुल खूंटी जिले के कई गांव विरोध के तौर पर इन चुनावों का बहिष्कार करने पर विचार कर रहे हैं।

क्या है पत्थलगड़ी परंपराः पत्थलगड़ी परंपरा के तहत आदिवासी लोग अपने गांव के बाहर एक बड़ा सा पत्थर या शिलालेख गाड़ते हैं, जिस पर मौजा, सीमाना, ग्रामसभा और आदिवासियों के अधिकारों की जानकारी दी रहती है। आदिवासियों में इस परंपरा का पुराना इतिहास है और लोग वंशावली, पुरखे और मृत व्यक्ति की याद संजोए रखने के लिए भी पत्थलगड़ी करते हैं।

हालांकि इन दिनों आदिवासियों द्वारा पत्थलगड़ी कर संविधान में उन्हें प्रदत्त अधिकारों का उल्लेख किया जा रहा है। जिसके तहत संविधान की पांचवी अनुसूची के तहत आदिवासी क्षेत्रों में संसद या विधानमंडल का कोई भी सामान्य कानून लागू नहीं होगा। आदिवासी इलाकों में गैररुढि प्रथा के व्यक्तियों के मौलिक अधिकार लागू नहीं होंगे और उनके आदिवासी इलाकों में घूमने फिरने, रोजगार-कारोबार करने पर पूरी तरह से प्रतिबंध रहेगा। वोटर कार्ड और आधार कार्ड आदिवासी विरोधी दस्तावेज हैं और आदिवासी लोग भारत के आम नागरिक नहीं बल्कि मालिक हैं। संविधान के अनुच्छेद 13(3) के तहत रुढ़ि और प्रथा ही संविधान की शक्ति हैं।

पत्थलगड़ी की आड़ में स्वशासन के बढ़े मामलेः पत्थलगड़ी की यह परंपरा साल 2017 से सुर्खियों में है। खूंटी जिले में पत्थलगड़ी की इस परंपरा की आड़ में कई लोगों द्वारा आदिवासी इलाकों में स्वशासन को बढ़ावा दिया जा रहा है। आदिवासियों का कहना है कि वह पत्थलगड़ी से अपने भूमि अधिकारों की रक्षा कर रहे हैं। आदिवासियों का आरोप है कि सरकार सीएनटी एक्ट (छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट) में बदलाव कर रही है। बता दें कि सीएनटी एक्ट के तहत प्रावधान है कि एसटी और एससी की जमीन के ट्रांसफर पर प्रतिबंध है। हालांकि आदिवासी चाहें तो अपनी मर्जी से स्थानीय लोगों को यह जमीन बेच सकते हैं। आदिवासियों का कहना है कि सरकार सीएनटी एक्ट में बदलाव कर उनकी जमीन को उनसे पूछे बिना बड़ी कंपनियों को देना चाहती है!

इस पूरे मसले का असर ये हो रहा है कि सरकार और स्थानीय लोगों में टकराव बढ़ रहा है। बीते दिनों खबर आयी थी कि पत्थलगड़ी के चलते आदिवासी लोगों और पुलिस में टकराव की स्थिति बन गई थी। पुलिस का आरोप है कि इस दौरान आदिवासियों ने पुलिसकर्मियों को बंधक बना लिया था और फिर सुबह उन्हें छोड़ा।

सरकार सख्तः झारखंड में पत्थलगड़ी के चलते पुलिस ने सख्त रुख अपनाया है और इसे लेकर 19 एफआईआर दर्ज की हैं। ये एफआईआर जून 2017 से लेकर जुलाई 2018 के बीच हुई हैं। इनमें 11,200 लोगों को कानून व्यवस्था भंग करने के आरोपी बनाया गया है। स्क्रोल डॉट इन की एक रिपोर्ट के अनुसार, इन 19 एफआईआर में से 14 एफआईआर में देशद्रोह के चार्ज लगाए गए हैं, जिनमें 10 हजार से ज्यादा लोगों को आरोपी बनाया गया है। बता दें कि देशद्रोह के आरोप में दोषी साबित होने पर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। जिन लोगों पर देशद्रोह के आरोप लगाए गए हैं, वह खूंटी जिले की कुल जनसंख्या का 2% हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, एफआईआर में 132 लोगों को नामजद आरोपी बनाया गया है, वहीं 43 गांवों के प्रधानों को भी आरोपी बनाया गया है। बाकी लोग ‘अज्ञात’ है। स्थानीय आदिवासियों को डर है कि पुलिस किसी को भी इस मामले में फंसा सकती है। झारखंड सरकार का कहना है कि नक्सली पत्थलगड़ी की आड़ में आदिवासियों को बरगलाकर आतंक फैलाना चाहते हैं। बहरहाल झारखंड विधानसभा चुनावों के बीच पत्थलगड़ी का मुद्दा एक बार फिर गर्माया हुआ है।

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