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Jharkhand Assembly polls: सीएम रघुबर दास की इमेज ही बन गई बीजेपी के लिए सिरदर्द! सरकारी भर्तियों की कमी भी बनी वजह

Jharkhand Assembly polls: बीजेपी कार्यकर्ता मानते हैं कि लोगों में गुस्सा है, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि मोदी पार्टी का बेड़ा पार लगा देंगे और डबल इंजन का नारा काम जरूर करेगा।

Author रांची | Updated: December 8, 2019 8:11 AM
मुख्यमंत्री रघुवबर दास (फाइल फोटो)

Jharkhand Assembly polls: बीजेपी इस विधानसभा चुनाव में बार बार यह प्रचारित करती रही है कि झारखंड के विकास के लिए राज्य को डबल इंजन वाली सरकार की जरूरत है। डबल इंजन वाली सरकार यानी केंद्र में पीएम नरेंद्र मोदी और राज्य में सीएम रघुबर दास का शासन। रांची से लेकर जमशेदपुर और हजारीबाग से लेकर धनबाद तक में पार्टी की ओर से बड़े-बड़े होर्डिंग लगवाए गए हैं। इन पर मुस्कुराते रघुबर दास मोदी से हाथ मिलाते नजर आते हैं।

हालांकि, जमीन पर हालात कुछ और हैं। दास की छवि और उनकी कथित अक्खड़ कार्यशैली उनकी पार्टी को बेचैन कर रही है। दो चरण के मतदान हो चुके हैं जबकि तीन चरण के लिए वोटिंग बाकी है लेकिन साफ संकेत नहीं मिल रहे कि हवा किसके पक्ष में बह रही है। छह महीने पहले आम चुनाव में बीजेपी ने यहां 14 लोकसभा सीटों में से 12 पर जीत दर्ज की थी। दास की लोकप्रियता कम होते नजर आती है जबकि अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर आलोचना का शिकार मोदी सरकार अब भी अपनी चमक कायम रखे हुई है।

बीजेपी कार्यकर्ता मानते हैं कि लोगों में गुस्सा है, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि मोदी पार्टी का बेड़ा पार लगा देंगे और डबल इंजन का नारा काम जरूर करेगा। कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि लोग ‘खिचड़ी’ सरकार के बजाए स्थायित्व को चुनेंगे। रांची, रामगढ़, हजारीबाग, गिरिडीह, बोकारो, दुमका, धनबाद और जामतारा जैसे जिलों में दास के खिलाफ गुस्सा है। दास ने पैरा टीचर्स और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन से निपटने के लिए जो तरीका अपनाया, उसे लेकर यह गुस्सा है। इसके अलावा, झारखंड पब्लिक सर्विस कमिशन और झारखंड स्टाफ सिलेक्शन कमिशन की ओर से नए रिक्रूटमेंट की ‘कमी’ को लेकर भी नाराजगी है।

बता दें कि रांची की सड़कों पर हुए पैरा टीचर्स और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया था। घटना के दृश्य स्थानीय चैनलों के लाइव टेलिकास्ट के हिस्सा बने। दास सरकार द्वारा सीएनटी और एसपीटी एक्ट्स में बदलाव का कदम भी गैर आदिवासी क्षेत्रों में सुर्खियां बटोरने में असफल रहा। इसके अलावा, मॉब लिंचिंग और धर्मांतरण जैसे सांप्रदायिक रंग लिए मुद्दे भी बहस का हिस्सा नहीं बने। कांग्रेस ने भी इन मुद्दों पर रणनीतिक चुप्पी साधी रखी।

सिर्फ आर्टिकल 370 के खात्मे और अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की थोड़ी बहुत चर्चा हुई और इसके लिए तारीफ मोदी के खाते में गई। सारी चुनाव बहस स्थानीय प्रत्याशी, जातिगत समीकरण और जीने-खाने से जुड़े मुद्दों तक सीमित रही। दुमका में कुछ युवाओं की चर्चा का केंद्रबिंदु राज्य में सरकारी नौकरियां की हालात है। ये सभी कहते हैं कि वे बीजेपी समर्थक हैं, हालांकि यह भी कबूल करते हैं कि अपने वॉट्सएप ग्रुप में वे यह जरूर चर्चा करते हैं कि कैसे इस सरकार ने नई रिक्तियां भरने की दिशा में न के बराबर कदम उठाए हैं।

प्रणय सिंकू ग्रैजुएट हैं। वह कहते हैं, ‘एक बदलाव होना चाहिए। उन्हें कमियां का एहसास होना चाहिए। इसके बाद ही बेहतरी हो पाएगी। मोदी केंद्र सरकार के लिए सही व्यक्ति हैं। मैं उनके लिए वोट दिया है और दोबारा दूंगा। मैं एक बीजेपी समर्थक हूं। मेरा पूरा गांव भाजपाई है। हालांकि, यहां सरकार बीते 5 साल में जेपीएसी और जेएसएससी परीक्षाएं करवाने में असफल रही। मेरे जैसे युवा क्या करेंगे? करीब 19000 रिक्तियां हैं।’

गिरिडीह में एक राष्ट्रीय बैंक के क्रेडिट कार्ड डिविजन के मार्केटिंग विभाग में काम करने वाले सन्नी कुमार सिंह कहते हैं, ‘देखिए मोदी नंबर वन हैं। हमें उनसे कोई शिकायत नहीं है। वह राष्ट्र हित में काम कर रहे हैं। लेकिन आखिर में यही बात सामने आती है कि हमारे राज्य में कोई भर्तियां नहीं हैं, हमारा क्या भविष्य है?’ उनके मुताबिक, बीते 5 साल में सरकारी नौकरियों के नाम पर 24 हजार सब इंस्पेक्टरों की भर्तियां भर हुई हैं।

वहीं, आम चुनाव में बीजेपी को वोट देने वाले एक दुकानदार सचिन कुमार शॉ कहते हैं कि आम चुनाव और लोकसभा चुनाव में फर्क होता है। वह कहते हैं, ‘देखिए क्या होता है?’ बीजेपी नेता भी इस समस्या को मानते हैं। गिरिडीह जिले में बीजेपी के अनुसूचित जाति मोर्चा के मंडल अध्यक्ष तिलक कुमार दास कहते हैं, ‘पैरा टीचर नाराज हैं। लोग इस बात से भी नाराज हैं कि आंगनवाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं पर लाठीचार्ज हुआ। इस वजह से बीजेपी कुछ सीट हारेगी, लेकिन हम सरकार जरूर बनाएंगे।’

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