पश्चिम बंगाल चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का झालमुड़ी खाना चर्चा का विषय बन गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 24 घंटे के अंदर पीएम मोदी के उस वीडियो को 100 मिलियन से ज्यादा व्यूज मिले। जिस झालमुड़ी का स्वाद पीएम मोदी ने चखा, पश्चिम बंगाल के साथ भारत के कई दूसरे राज्यों में ये लोगों का पसंदीदा स्नैक है। बात चाहे उत्तर प्रदेश की हो, पंजाब की हो, झारखंड की हो या फिर ओडिशा, अलग-अलग नामों से प्रचलित यह स्नैक वहां भी खूब खाया जाता है।
इसको बनाना जितना आसान है, इसकी कीमत भी उतनी ही किफायती है। 10 से लेकर 20 रुपये तक में पेट भर झालमुड़ी लोगों को मिल जाती है। झालमुड़ी से लाखों लोगों का घर चलता है। जिन चीजों से मिलकर यह स्नैक तैयार होता है, वही उसकी असल इकोनॉमिक्स है। झालमुड़ी बनाने में मुख्य रूप से मुरमुरा, सरसों का तेल, बारीक कटी सब्जियां, भुनी मूंगफली, उबले आलू, हरी मिर्च और मसालों का इस्तेमाल होता है।
इसका मतलब है कि एक 20 रुपये की झालमुड़ी में किसानों से लेकर मजदूरों तक, व्यापारी से लेकर रेहड़ी वालों तक, सभी की मेहनत शामिल है। शुरुआत खेत में फसल की उगाई से होती है, फिर फैक्ट्री में प्रोसेसिंग और अंत में एक ठेले वाले तक उसकी सप्लाई पहुंचती है। इस पूरी प्रक्रिया को झालमुड़ी के उदाहरण से ही समझने की कोशिश करते हैं।
झालमुड़ी में सबसे मूल सामग्री मुरमुरा है जो चावल से बनता है। इस अकेले मुरमुरा बनने की प्रक्रिया में खेत में काम करने वाले मजदूर, राइस मिल में काम करने वाले मशीन ऑपरेटर,पैकिंग स्टाफ और ट्रांसपोर्ट सप्लाई में शामिल ड्राइवर्स को नौकरी मिलती है। इसी तरह सरसों का तेल भी झामुढ़ी में इस्तेमाल होता है। इसकी बनने की प्रक्रिया में भी किसान शामिल है, फिर फैक्ट्रियों में उसकी सफाई करने वाला मजदूर है और अंत में उनकी पैकेजिंग में शामिल दूसरे कारीगर।
यहां पर भी किसानों से लेकर फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूर, पैकेजिंग में शामिल स्टाफ और ट्रांसपोर्ट में इस्तेमाल हो रहे ड्राइवरों को नौकरी मिल रही है।
मसाले भी झालमुड़ी की एक बड़ी यूएसपी हैं जिनके बिना इस स्नैक का स्वाद ही नहीं आ सकता। यहां भी नमक उद्योग, मसाला उद्योग, पैकेजिंग इंडस्ट्री और ट्रांसपोर्ट-लॉजिस्टिक्स तक सब शामिल हैं।
झालमुड़ी की सप्लाई चेन तो समझ आ गई है, यह स्नैक देश के लाखों ठेले वालों की एक बड़ी आजीविका भी बन चुका है। केंद्रीय आवास और शहरी कार्य मंत्री हरदीप सिंह पुरी के मुताबिक भारत में 49.48 लाख रजिस्टर्ड स्ट्रीट वेंडर्स हैं। यहां भी सबसे ज्यादा स्ट्रीट वेंडर उत्तर प्रदेश में मौजूद हैं जिनकी संख्या 8.49 लाख से भी ज्यादा है। पश्चिम बंगाल में भी बड़ी संख्या में स्ट्रीट वेंडर्स मौजूद हैं, हालांकि जानकार मानते हैं कि बड़ी संख्या अब भी रजिस्ट्रेशन के दायरे से बाहर है।
यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि सभी स्ट्रीट वेंडर फूड आइटम नहीं बेचते हैं। कपड़े, घरेलू सामान और दूसरी चीजें भी बेची जाती हैं। लेकिन यहां ज्यादा बड़ी संख्या फूड स्ट्रीट वेंडर्स की होती है, शहरों में यह चलन और ज्यादा प्रबल दिख जाता है। यही वेंडर्स सड़कों पर झालमुड़ी जैसे नाश्ते बेचते हैं। उसी से उनका घर चलता है और दो वक्त की रोटी मिल पाती है।
झालमुड़ी को एक तरह से ‘रेल स्नैक’ भी कहा जा सकता है। प्लेटफॉर्म पर इंतजार करता यात्री हो या ट्रेन पकड़ने की जल्दी में भागता मुसाफिर, इसकी लोकप्रियता वहां भी साफ दिखती है। भारतीय रेलवे के 7,300 से ज्यादा स्टेशनों के नेटवर्क में ज्यादातर स्टेशनों पर यह स्नैक बड़ी संख्या में बिकता है। ऐसे में 10 से 20 रुपये में मिलने वाली यह झालमुड़ी रेल इकोनॉमी से भी गहराई से जुड़ी हुई है।
इसके ऊपर भारत जैसा देश चावल का एक बड़ा उत्पादक है, दुनिया में उसकी हिस्सेदारी 28 फीसदी के करीब बैठती है। भारत में चावल की खेती लगभग 50 से 52 मिलियन हेक्टेयर में होती है। ऐसे में अगर झालमुड़ी जैसा स्नैक ना बनाया जाए तो भारत के चावल का एक बड़ा हिस्सा कहां जाएगा, उसका इस्तेमाल कैसे होगा?
ऐसे में झालमुड़ी को सिर्फ एक 10 या 20 रुपये के नाश्ते के रूप में नहीं देखा जा सकता, यह भारत की असंगठित अर्थव्यवस्था का अहम अंग है जिसका कागजों में भले ही टर्नओवर ना दिखे, लेकिन लाखों लोगों का यह सहारा है।
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