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जयललिता ने रच दिया फिर इतिहास

अनिल बंसल नई दिल्ली। अन्नाद्रमुक सुप्रीमो और कुर्सी गंवा चुकी तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने फिर नया इतिहास रच दिया। उन्हें शनिवार को बंगलूर की अदालत ने घोषित आय से ज्यादा संपत्ति जुटाने यानी मुख्यमंत्री रहते भ्रष्टाचार का दोषी ठहराया था। सौ करोड़ रुपए के जुर्माने के अलावा चार साल कैद की सजा भी सुनाई […]

Author September 29, 2014 09:06 am
तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता। (फाइल फोटो)

अनिल बंसल

नई दिल्ली। अन्नाद्रमुक सुप्रीमो और कुर्सी गंवा चुकी तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने फिर नया इतिहास रच दिया। उन्हें शनिवार को बंगलूर की अदालत ने घोषित आय से ज्यादा संपत्ति जुटाने यानी मुख्यमंत्री रहते भ्रष्टाचार का दोषी ठहराया था। सौ करोड़ रुपए के जुर्माने के अलावा चार साल कैद की सजा भी सुनाई थी। सजा के फौरन बाद उन्हें हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया था। लेकिन जयललिता ने फिर भी इस्तीफा नहीं दिया। इस तरह जेल जाने वाली वे पहली मुख्यमंत्री बन गईं।

अतीत में मुख्यमंत्री रहते लालू यादव और शिबू सोरेन के भी जेल जाने की नौबत आई थी। पर उन्होंने इससे पहले ही इस्तीफा दे दिया था। मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री उमा भारती ने तो जेल जाने की नौबत आने से पहले ही महज नैतिकता के आधार पर कुर्सी छोड़ दी थी। एक आंदोलन के सिलसिले में कर्नाटक की अदालत में कई बार बुलावे पर भी हाजिर न होने के कारण उनका वारंट निकला था। हालांकि वे इस मामले में बाद में बरी भी हो गईं। लेकिन मुख्यमंत्री की हैसियत से आरोपी बन कर अदालत में पेश होना उन्हें स्वीकार नहीं था।

जयललिता के इस्तीफा न देने पर तो किसी को हैरानी नहीं होगी पर इस मामले में केंद्र सरकार की खामोशी पर जरूर हर कोई सवालिया निशान लगा रहा है। नियमानुसार अदालत से सजा मिलते ही जयललिता की विधानसभा की सदस्यता और मुख्यमंत्री की कुर्सी दोनों ही जाती रही। इस नाते राज्य में नए मुख्यमंत्री की नियुक्ति होने तक राज्यपाल को राष्ट्रपति शासन लागू करना चाहिए था। अन्यथा जयललिता को पहले ही इस्तीफा देकर नए नेता के चयन का रास्ता साफ करना चाहिए था। पर ऐसा नहीं हुआ। इससे एक सवाल उठा है कि जयललिता के जेल जाने के बाद तमिलनाडु का मुख्यमंत्री कौन था।

नियमानुसार इस मामले में राज्य के राज्यपाल को केंद्र से सलाह कर हस्तक्षेप करना चाहिए था। पर राज्यपाल रोसैया चुप्पी साधे रहे। ले-देकर जयललिता की विरोधी द्रमुक के नेताओं ने ही उनके इस्तीफे की मांग पर जोर दिया। जबकि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही मूक दर्शक बने संविधान का मखौल उड़ते देखते रहे। भाजपा के प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नकवी ने भी यह कह कर बचने की कोशिश की कि मामला अदालत से जुड़ा है जबकि अदालत अपना काम कर चुकी थी। अगला काम राज्यपाल और केंद्र को करना था। पर जयललिता के भाजपा से करीबी रिश्तों और राज्यसभा में उनकी पार्टी की ताकत को देखते हुए संवैधानिक संकट को बढ़ाया गया।

जहां तक जयललिता का सवाल है, वे इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुख्यमंत्री पद से बर्खास्त की जा चुकी हैं। तब तांसी जमीन घोटाले में दोषी ठहराते हुए अदालत ने उन्हें जेल की सजा सुनाई थी। इसकी वजह से उन्हें छह साल के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित कर दिया गया था। इसके बावजूद उन्होंने नामांकन पत्र दाखिल कर दिया जो स्वाभाविक तौर पर रद्द हो गया। चुनाव बाद उनकी पार्टी को बहुमत मिला तो विधायकों ने उन्हें ही नेता चुन लिया। उनके विरोधियों ने तत्कालीन राज्यपाल फातिमा बीवी से फरियाद की थी कि उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ न दिलाई जाए। दलील दी गई थी कि अगर वे सदन की सदस्यता के लिए योग्य नहीं हैं तो फिर मुख्यमंत्री पद के लिए योग्य कैसे हो सकती हैं?

सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जज बनने का इतिहास रचने वाली फातिमा बीवी ने राज्यपाल के पद की गरिमा गिरा दी थी। उनका तर्क था कि सदन का सदस्य हुए बिना भी तो कोई छह महीने तक मंत्री या मुख्यमंत्री रह ही सकता है। दूसरे वे मानती हैं कि विधायकों का बहुमत जिसके पक्ष में हो, उसे मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाना उनकी संवैधानिक मजबूरी है। जयललिता ने शपथ ली तो इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2001 में अहम फैसला सुनाते हुए जयललिता को मुख्यमंत्री पद से बर्खास्त कर दिया था। संविधान पीठ ने संवैधानिक व्यवस्था से साफ कर दिया था कि जो सदन का सदस्य बनने के लिए अयोग्य हो, मंत्री या मुख्यमंत्री हो ही नहीं सकता।

 

 

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