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जयललिता के शपथ ग्रहण में छाई हरियाली, पेन से लेकर साड़ी तक सबकुछ हरे रंग में

16 मई को हुए विधानसभा चुनावों में अन्नाद्रमुक ने 134 सीटों पर विजय हासिल की है। 1984 के बाद यह पहला मौका है, जब किसी पार्टी को तमिलनाडु के मतदाताओं ने लगातार दूसरी बार मौका दिया हो।

Author नई दिल्‍ली | May 23, 2016 2:07 PM
984 के बाद यह पहला मौका है, जब किसी पार्टी को तमिलनाडु के मतदाताओं ने लगातार दूसरी बार मौका दिया हो। (ANI)

तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में जीत हासिल करने वाली एआईडीएमके की नेता जयललिता ने सोमवार को छठी बार मुख्‍यमंत्री पद की शपथ ली। इस खास मौके पर उन्‍होंने अपने पसंदीदा हरे रंग की साड़ी पहन रखी थी। हरे रंग से जयललिता का लगाव इस बात से समझा जा सकता है कि समारोह स्‍थल की सजावट में भी हरे रंग का इस्‍तेमाल किया गया था। राज्‍यपाल ने जयललिता को जो गुलदस्‍ता भेंट किया, उसका बाहरी आवरण भी हरे रंग का था।

जयललिता ने पद एवं गोपनीयता की शपथ लेने के बाद हरे रंग के पेन से कागजात पर दस्‍तखत किए। वे हरे रंग की अंगूठी पहनती हैं। समारोह में मौजूद जयललिता की सबसे करीबी मानी जाने वाली शशिकला भी हरे रंग के परिधान में मौजूद थी। कुछ पार्टी कार्यकत्रियों ने भी हर रंग की साड़ी पहन रखी थी।

16 मई को हुए विधानसभा चुनावों में अन्नाद्रमुक ने 134 सीटों पर विजय हासिल की है। 1984 के बाद यह पहला मौका है, जब किसी पार्टी को तमिलनाडु के मतदाताओं ने लगातार दूसरी बार मौका दिया हो।

जयललिता की पार्टी AIADMK की नींव 1972 में तमिल अभिनेता मरुधर गोपालन रामचंद्रन (एमजीआर) ने रखी थी। अपनी लोकप्रियता का फायदा उठाते हुए एमजीआर ने मजबूत राजन‍ैतिक पार्टी खड़ी की। एमजीआर 1977 में तमिलनाडु के मुख्‍यमंत्री बने और लगातार तीन बार मुख्‍यमंत्री बनने का गौरव हासिल किया। उनका निधन 1987 में हुआ था।

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एमजीआर के निधन के बाद यह पहला मौका है जब तमिलनाडु में कोई पार्टी लगातार दूसरी बार सत्‍ता में है। लेकिन जयललिता को एमजीआर का रिकॉर्ड तोड़ने के लिए लगातार चार बार सत्‍ता हासिल करनी होगी। मतलब उन्‍हें 2021 और 2026 में चुनाव जीतकर मुख्‍यमंत्री बनना होगा।

एमजीआर की मौत के बाद तमिलनाडु में कभी करुणानिधि की डीएमके सत्‍ता में रही, तो कभी जयललिता की एआईएडीएमके। इन चुनावों में जया की लगातार दूसरी जीत के साथ बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिला है।

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जयललिता के जीवन पर एमजीआर का बहुत प्रभाव माना जाता है। वे जयललिता के राजनैतिक गुरु थे। ऐसा कहा जाता है कि एमजीआर ही जयललिता को राजनीति में लेकर आए थे, लेकिन जयललिता कहती हैं कि उन्‍होंने अपनी मर्जी से राजनीति में कदम रखा।

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