जाट हिंसा जांच: सरपंच-बुजुर्गों के घर में पुलिसवालों को छिपाने पड़े हथियार, फैसले लेने में नाकाम रहे अफसर - Jansatta
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जाट हिंसा जांच: सरपंच-बुजुर्गों के घर में पुलिसवालों को छिपाने पड़े हथियार, फैसले लेने में नाकाम रहे अफसर

हिंसा के दौरान कुछ सीनियर अफसरों ने अपनी शक्‍त‍ियां और अधिकार जूनियरों को सौंप दी तो कई अफसर केंद्र की चेतावनी के बावजूद वक्‍त पर कदम उठाने में नाकाम रहे।

Author चंडीगढ़ | April 19, 2016 7:31 AM
जाट आंदोलन के दौरान रोहतक में फ्लैग मार्च करते सेना के जवान। (फाइल फोटो)

हरियाणा में फरवरी महीने में हुए जाट आंदोलन के दौरान भड़की हिंसा और आगजनी के मामले की जांच कर रहे प्रका‍श सिंह पैनल को कई चौंकाने वाले तथ्‍य पता चले हैं। पैनल की रिपोर्ट में कई सीनियर अफसरों के अपने जिम्‍मेदारी से कथित तौर पर भागने या संदेहयुक्‍त फैसले लेने का जिक्र है। हिंसा के दौरान कुछ सीनियर अफसरों ने अपनी शक्‍त‍ियां और अधिकार जूनियरों को सौंप दी तो कई अफसर केंद्र की चेतावनी के बावजूद वक्‍त पर कदम उठाने में नाकाम रहे। बता दें कि जांच दल अपनी रिपोर्ट फाइनल करने के आखिरी दौर में है। द इंडियन एक्‍सप्रेस को इस जांच रिपोर्ट की जानकारी हासिल हुई है। जांच पैनल के सामने करीब 3000 गवाहों ने अपने बयान रिकॉर्ड कराए हैं।

पैनल ने पाया कि 19 फरवरी को हिंसा शुरू होने के तुरंत बाद सबसे ज्‍यादा प्रभावित जिलों में से एक में बतौर डिप्‍टी कमिश्‍नर तैनात एक आईएएस अफसर ने अपनी सभी आधिकारिक शक्‍त‍ियां अडिशनल डिप्‍टी कमिश्‍नर को सौंप दी। तीन दिन तक डिप्‍टी कमिश्‍नर घर से ही ऑपरेट करते रहे जबकि अडिशनल डिप्‍टी कमिश्‍नर ने डिस्‍ट्र‍िक्‍ट मजिस्‍ट्रेट की शक्‍तियों का इस्‍तेमाल किया। जब पैनल ने डिप्‍टी कमिश्नर से इस बारे में पूछा तो उन्‍होंने एक जूनियर को इन्‍चार्ज बनाए जाने के कदम को सही ठहराया। इसके अलावा, उन्‍होंने दोष जिले के पुलिस प्रमुख पर थोपने की कोशिश की। पता चला है कि डीसी ने पैनल को कहा, ”जंग के मैदान में पहले लेफ्टिनेंट जाते हैं, इसके बाद कैप्‍टन, इसके बाद मेजर, इसके बाद लेफ्टिनेंट कर्नल और इसके बाद कर्नल और ऐसा आगे भी होता है। जनरल खुद जंग के मैदान में नहीं उतरते।” एक्‍सप्रेस ने डीसी से उनका पक्ष जानना चाहा लेकिन उन्‍होंने कोई जवाब नहीं दिया।

पैनल ने रोहतक के तत्‍कालीन रोहतक आईजी श्रीकांत जाधव से उनके एक फैसले पर पूछताछ की। 19 फरवरी की शाम को जाधव ने झज्‍जर के डिस्‍ट्र‍िक्‍ट एसपी सुमित कुमार को झज्‍जर से सोनीपत बुलवा लिया था। सुमित कुमार अपने कई लोगों के साथ रोहतक के लिए रवाना हुए। उधर, झज्‍जर में प्रदर्शनकारियों ने जमकर बवाल मचाया। पैनल को पता चला कि सुमित कुमार ने वापस झज्‍जर जाने की कोशिश की, लेकिन 33 किमी की दूरी तय करने में उन्‍हें कई घंटे लगे क्‍योंकि प्रदर्शनकारियों ने मुख्‍य सड़कें खोद डाली थीं और रास्‍ते ब्‍लॉक कर दिए थे। बता दें कि हिंसा खत्‍म होने के बाद जाधव हरियाणा पुलिस के पहले अफसर थे, जिन्‍हें रोहतक से हटाया गया और बाद में उन्‍हें सस्‍पेंड भी कर दिया गया। पैनल ने आईजी जाधव के रोहतक से 20 और 21 फरवरी को गायब रहने पर भी सवाल उठाए। जाधव ने तर्क दिया कि एक सीनियर अफसर ने उन्‍हें जिले से बाहर भेज दिया था क्‍योंकि वे दलित थे और जाट उनको निशाना बना सकते थे।

जाट आंदोलन मामले से जुड़े अहम अधिकारियों के बयान से पता चलता है कि केंद्र सरकार ने राज्‍य सरकार को मुनक नहर को नुकसान पहुंचाए जाने से जुड़े कुछ ‘विशि‍ष्‍ट सूचनाएं’ दी थी। कैबिनेट सचिवालय ने ये इनपुट नहर को नुकसान पहुंचाए जाने के 24 घंटे पहले ही हरियाणा सरकार को दे दी थी। इसके बावजूद, सोनीपत में तैनात एक आईएएस अफसर मुनक नहर की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाए और बाद में 20 फरवरी को प्रदर्शनकारी इसे नुकसान पहुंचाने में कामयाब रहे। सेना को मुनक नहर पर कब्‍जा करने में दो दिन लगा। इसके अलावा, दिल्‍ली को पानी की सप्‍लाई सामान्‍य करने में कुछ और दिन लगे। नहर की मरम्‍मत आठ मार्च तक चलती रही।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने न केवल कंट्रोल रूम बनाया बल्‍क‍ि 19 फरवरी से 22 फरवरी के बीच नियमित तौर पर कम से कम दो मीटिंग की। 19 फरवरी को हिंसा शुरू हुई थी और 22 फरवरी को नहर पर नियंत्रण वापस पाया गया था। सूत्रों के मुताबिक, पैनल ने पाया कि गृह मंत्रालय की इस कवायद के बावजूद हरियाणा के अफसर सही फैसले लेने में नाकाम रहे। पैनल चीफ सेक्रेटरी, अडिशनल चीफ सेक्रेटरी (होम) और डीजीपी समेत कई अधिकारियों को कंट्रोल रूम बनाने में नाकाम रहने के लिए दोषी ठहरा सकता है। अगर यह कंट्रोल रूम बनता तो सभी जिले हिंसा और की गई कार्रवाई से जुड़ी अहम जानकारी उसे भेज सकते थे।

पैनल ने यह भी पाया कि हिंसा के वक्‍त पुलिस काफी हड़बड़ी में थी। पैनल को एक वायरलेस मैसेज मिला है, जो एक एसपी रैंक के अफसर ने अपने लोगों को भेजे थे। इसमें कहा गया था कि जाट प्रदर्शनकारियों की भीड़ पहुंचने से पहले पुलिस थानों में रखे हथियारों को जमा करके किसी ‘सुरक्षित जगह’ ले जाया जाए। हालांकि, यही एसपी ने कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों से मोर्चा लिया और उपद्रवियों द्वारा कई जगहों को जलाने से रोका। पैनल ने पाया कि पुलिस अफसरों ने अपने हथियार गांव के सरपंचों और बुजुर्गों के घर में छिपा दिया। बता दें कि 16 फरवरी को ही चुनाव खत्‍म हुए थे और चुनाव से पहले लोगों के जमा किए गए हथियार भी थाने में ही रखे हुए थे। वायरलेस मैसेज भेजने वाले एसपी ने हथियार छिपाने के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि रोहतक में एक हथियारों की दुकान पर हमला हुआ था, इसलिए ऐहतियाती कदम उठाने जरूरी थे।

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