गढ़वाल राइफल्स के जवान जसवंत सिंह रावत 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान चीनी सैनिकों से लड़ते हुए शहीद हुए थे। उस समय उनकी उम्र महज 21 साल थी। कई दशकों के दौरान उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में उनके पैतृक गांव में बना घर धीरे-धीरे जर्जर हो गया। उनके परिवार के सदस्य भी वहां से दूसरी जगह चले गए थे।
अब इस घर को संग्रहालय में बदलने की तैयारी है जहां लोग जसवंत सिंह रावत के जीवन और उनकी सैन्य सेवा के बारे में जान सकेंगे। बीजेपी सांसद अनिल बलूनी ने सोमवार को यह जानकारी दी।
गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले बलूनी ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि उन्होंने पिछले हफ्ते पौड़ी गढ़वाल के बड़यूं गांव का दौरा किया था जहां जसवंत सिंह रावत का पैतृक घर है। बलूनी ने कहा, ”जब मैंने उनका घर देखने की बात कही तो पता चला कि वह पूरी तरह जर्जर हो चुका है। वहां कोई नहीं रहता था।” बलूनी के मुताबिक, गांव के लोगों ने उन्हें बताया कि रावत के परिवार के सदस्य वहां से चले गए हैं। स्थानीय लोग चाहते थे कि उनके पैतृक घर को सुरक्षित रखा जाए और उसे संग्रहालय में बदला जाए।
बलूनी ने कहा, ”घर की हालत देखने के बाद मुझे लगा कि इसे संग्रहालय में बदलना चाहिए। इसके बाद मैंने उनके भाई से फोन पर बात की क्योंकि परिवार की सहमति लेना जरूरी था।” उन्होंने बताया कि परिवार ने इसके लिए अपनी सहमति दे दी है।
प्रस्तावित संग्रहालय जसवंत सिंह रावत के पैतृक घर की जगह पर ही बनाया जाएगा। इसके लिए पहले एक व्यवहार्यता अध्ययन किया जाएगा और वास्तुकार से भी सलाह ली जाएगी।
बीजेपी सांसद ने बताया कि वह इस परियोजना के लिए सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLADS) के तहत मिलने वाली राशि का इस्तेमाल करने की योजना बना रहे हैं। संग्रहालय के लिए 17 नवंबर को शिलान्यास करने की तैयारी है। इसी तारीख को 64 साल पहले नूरानांग की लड़ाई में जसवंत सिंह रावत शहीद हुए थे।
बलूनी ने कहा, ”मेरा प्लान है कि उस दिन भूमि पूजन किया जाए।” बलूनी की योजना अरुणाचल प्रदेश के जसवंत गढ़ युद्ध स्मारक से मिट्टी लाकर संग्रहालय की नींव में डालने की भी है। यह स्मारक उसी जगह बनाया गया है जहां रावत ने चीनी सैनिकों से लड़ते हुए जान गंवाई थी।
उन्होंने कहा, ”मैं कुछ दिनों में तवांग जाऊंगा और वहां से मिट्टी लेकर आऊंगा। हम उस मिट्टी को घर की नींव में डालेंगे।”

21 की उम्र में शहीद हुए जसवंत सिंह
जसवंत गढ़ युद्ध स्मारक तवांग से करीब 24-25 किलोमीटर दूर है। यह स्मारक नूरानांग की लड़ाई में जसवंत सिंह रावत की भूमिका की याद में बनाया गया है। जसवंत सिंह रावत गढ़वाल राइफल्स की चौथी बटालियन में तैनात थे। वह 19 अगस्त 1960 को 19 साल की उम्र में सेना में भर्ती हुए थे। इसके दो साल बाद वह शहीद हो गए।
उस समय के नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (NEFA) (जो अब अरुणाचल प्रदेश है) में हुई नूरानांग की लड़ाई के दौरान रावत ने बेहद कठिन परिस्थितियों में चीनी सैनिकों का मुकाबला किया। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है।
बलूनी ने कहा कि गढ़वाल राइफल्स के इतिहास और परंपरा में जसवंत सिंह रावत की एक खास जगह है।
उन्होंने कहा, ”जब लोग जसवंत गढ़ जाते हैं तो वे भारतीय सेना को याद करते हैं। अगर आप उनकी कहानी पढ़ें तो पता चलता है कि उन्होंने वहां 72 घंटे तक पूरी चीनी सेना को रोके रखा। वह अकेले थे। 21 साल की उम्र में शहीद हो गए। गढ़वाल राइफल्स के लिए जसवंत सिंह सबसे बड़ा नाम हैं। सभी उन्हें जसवंत बाबा कहते हैं।”
बलूनी के मुताबिक, प्रस्तावित संग्रहालय में जसवंत सिंह रावत की याद और उनके बलिदान को सुरक्षित रखा जाएगा। यहां आने वाले लोगों को उनके जीवन और सैन्य सेवा के बारे में जानने का मौका मिलेगा।
उन्होंने बताया कि ग्रामीणों के सुझाव पर पैतृक घर तक पहुंचने वाले रास्ते को भी विकसित किया जाएगा। रास्ते पर जसवंत सिंह रावत के नाम का एक गेट भी बनाया जाएगा।
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