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भारतीय राजनीति में नेतृत्व की जो कल्पना थी, उसके पर्याय थे अटलजी

भारतीय राजनीति में जो नेतृत्व की कल्पना की गई है, अटलजी उसके पर्याय थे। उन्हें देखकर राजनीति और राजनीतिकों के प्रति श्रद्धा पैदा होती थी। अटलजी जैसे लोगों ने राजनीति, जिसे लोग निकृष्ट स्थान कहते हैं, को उत्कृष्ट कार्य करने का स्थान बना दिया।

Author नई दिल्ली | August 14, 2019 6:40 AM
अटलजी जैसे लोगों ने राजनीति, जिसे लोग निकृष्ट स्थान कहते हैं, को उत्कृष्ट कार्य करने का स्थान बना दिया।

प्रभात झा

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना साल 1951 में की। भारतीय राजनीति में बहुत कम लोग ऐसे बचे थे जो अपने दल के जन्म से ही उसके विस्तार में लगे हों। जनसंघ की स्थापना के प्रारंभ से जो जुड़े थे, उनमें अग्रणी थे अटल बिहारी वाजपेयी। जनसंघ के संस्थापक डॉ मुखर्जी 23 जून 1953 को शहीद हो गए। उन्होंने परमिट तोड़कर जम्मू-कश्मीर में प्रवेश किया था। उनके साथ बतौर पत्रकार अटल बिहारी वाजपेयी गए थे। जब परमिट तोड़कर डॉ मुखर्जी जम्मू-कश्मीर पहुंचे तो उन्होंने अटलजी से कहा- ‘वाजपेयी गो बैक एंड टेल द पीपल आॅफ इंडिया डॉ मुखर्जी इन्टर्ड जम्मू-कश्मीर विदाउट परमिट।’ अटलजी यहीं से प्रारंभ हुए और कभी पलटकर नहीं देखा। इसी बीच 23 जून 1953 को डॉ मुखर्जी की, जो कश्मीर में नजरबंद थे, अचानक रहस्यमयी मौत हो गई। अटलजी पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में प्रारंभ में ही आ गए थे। वे उत्तर प्रदेश के संडीला में कुछ महीनों के लिए संघ के विस्तारक होकर भी गए थे। पर भारतीय जनसंघ की यात्रा जो उन्होंने उस समय शुरू की, वह कभी नहीं रुकी।

अटलजी मां सरस्वती के वरद पुत्र थे। उनकी वाणी में भारत का दर्शन होता था। उनकी वाणी उनकी पहचान बन गई। भारतीय राजनीति में वे पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपनी वाणी से जन-जन के मन मंदिर में अपना स्थान बनाया था। कठोर से कठोर बातों को वे शीतल वाणी से कहकर लोगों का मन जीत लेते थे। अपने प्रखर वक्तव्य और प्रभावी भाषण से अपने विचारों का कश्मीर से कन्याकुमारी तक प्रचार-प्रसार कर उन्होंने जनसंघ को स्थापित किया। भारत का अखंड प्रवास कर वे जनसंघ के दीये के प्रकाश को देश के कोने-कोने में ले गए। हम सभी सौभाग्यशाली हैं कि हमें उनके साथ काम करने का अवसर मिला। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से अपनी छोटी उम्र में संसद में बहस कर उन्होंने संसद में भी अपना विशिष्ट स्थान बनाया था। यही कारण था कि साल 1963 में पंडित नेहरूने सदन में अटलजी का ओजस्वी भाषण सुनकर कहा था ‘मै इस युवा में भारत का भविष्य देखता हूं’।

अटलजी कवि थे। लेखक थे। नेता थे और दार्शनिक थे। वे अति संवेदनशील थे। वे विचारों के प्रति प्रतिबद्ध रहे। पर विचारों को प्रकट करने में निडर भी रहे। उनकी आंखों के सामने पहले देश रहता था और दल बाद में आता था। अटलजी भारतीय राजनीति में विपक्ष की शान थे। सदैव विपक्ष में रहे पर देश का हर नागरिक यह कहता था कि अटलजी को एक न एक दिन प्रधानमंत्री बनना चाहिए। वे अपने दल में जितने लोकप्रिय थे, उससे भी अधिक अन्य खासकर विरोधी दलों में लोकप्रिय थे। विरोधी दलों के नेता यह कहते हुए सुने जाते थे कि काश हमारी पार्टी में कोई अटलजी होते। उनके समय में हार-जीत से ज्यादा महत्त्व राजनीति की मर्यादा और मानवता का था ।

अटलजी के जीवन का हर राजनीतिक प्रसंग हम भारतीयों का प्रेरणा देता है। वे जब स्वयं चुनाव हार गए और केवल दो सीटें भाजपा की आईं तब भी घबराए नहीं। उन्होंने कहा था कि हम चुनाव हारे हैं, मन नहीं हारे। अटलजी विपक्ष की राजनीति करते हुए तनाव में नहीं दिखे। अटलजी ‘मैं’ से दूर और ‘हम’ के करीब रहते थे। अजातशत्रु शब्द को उन्होंने प्यार से जिया। उनका कोई दुश्मन नहीं था। उन्होंने अपने जीवन से कभी झूठ नहीं बोला।
भारतीय राजनीति में आज तक वर्षों विपक्ष में रहते हुए अटलजी चिंतन, श्रद्धा के केंद्र देशवासियों के बीच बने, वैसा अब तक कोई दूसरा नहीं हुआ। विपक्ष की सत्ता में भूमिका, विपक्ष की सदन के भीतर भूमिका और विपक्ष की सड़कों पर कैसी भूमिका हो, को परिभाषित करने वाले भारत के अनूठे नेता थे अटलजी। भारतीय राजनीति में वर्षों विपक्ष में रहते हुए देश के प्रधानमंत्री बनने का सौभाग्य उन्हें मिला। वे भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बने जो गैर-कांग्रेसी थे। अटलजी

भारतीय संसद के गौरव थे। वे भारतीय राजनीति के अद्वितीय आदर्श थे। अटलजी की वैचारिक प्रतिबद्धता प्रणाम करने लायक थी। ढांचा टूटा, वे दुखी हो गए। पत्रकार उनसे मिलने गए। पत्रकारों ने पूछा कि अब आप क्या करेंगे। अटलजी ने कहा कि ढांचा गिरना दुखद है। पर मैं सदन में नरसिंह राव जी से यह अवश्य जानना चाहूंगा कि आखिर यह परिस्थिति क्यों बनी? क्या सरकार इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? अटलजी जनता पार्टी में थे। उन्होंने भारतीय जनसंघ का विलय लोकतंत्र के हित में आपातकाल के दौरान कर दिया।

यहां तक कि अपना चुनाव निशान भी छोड़ दिया। लेकिन कुछ वर्षों बाद जनता पार्टी के कुछ नेताओं ने दोहरी सदस्यता की बात उठा दी। यहां तक कह दिया कि जो जनसंघ के घटक के लोग जनता पार्टी में हैं, उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सदस्यता छोड़नी होगी। अटलजी ने आरंभ में इसे हलके से ले लिया और कहा की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भाई कोई सदस्यता नहीं होती है। पर जनता पार्टी के नेता नहीं माने। अटलजी और आडवाणीजी ने उस समय की जनता पार्टी के नेताओं को जो कहा वह उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता का अनमोल उदाहरण है। अटलजी ने कहा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमारी मातृ संस्था है। हम वहां से संस्कारित हुए हैं। हम राजनीति छोड़ सकते हैं, जनता पार्टी छोड़ सकते हैं, पर कभी भी संघ छोड़ने की बात नहीं कर सकते।

इसके बाद ही 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ। अटलजी पहले अध्यक्ष बने। उन्होंने भाजपा के मुंबई में हुए प्रथम सम्मेलन में कहा था-‘अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा’। आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह सच में भारत में ही नहीं, विश्व में भारत का परचम फहरा रहे हैं और अटलजी के भाजपा के प्रथम सम्मेलन में कही बात को पूरी तरह साकार कर रहे हैं। अटलजी काया से हमें छोड़कर गए, पर उनकी वैचारिक छाया के आंचल में हम सदैव पल्लवित होते रहेंगे। (लेखक राज्यसभा के सांसद हैं)

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