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अयोध्या: रामनगरी में राम के नाम की सियासत का सच

जो भारतीय जनता पार्टी 1992 से अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का दम भरती रही है उसकी जुबान पर भी अब राम का नाम नहीं।

Author अयोध्या | December 6, 2016 4:44 AM
अयोध्या का एक राम मंदिर (Photo: PTI)

विवाह के उत्साह के नेपथ्य में एक गहन निराशा। हर एक निराश कि अगले ही दिन राम लला की प्रतिस्थापना के 24 वर्ष होने को हैं, लेकिन कहीं यह आभास नहीं कि मंदिर बनेगा। दो दिन पहले रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा आए। रेल पटरियों का शिलान्यास किया, लेकिन राम मंदिर का कोई जिक्र नहीं। कनक भवन व हनुमानगढ़ी में पूजा की, लेकिन राम लला के दर्शन को समय न निकाल पाए। बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर भी यहां मौजूद थे। वे तो कहीं भी जाने का समय नहीं निकाल पाए। राम मंदिर पर कुछ कहने का तो सवाल ही नहीं।

जो भारतीय जनता पार्टी 1992 से अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का दम भरती रही है उसकी जुबान पर भी अब राम का नाम नहीं। तब भी नहीं जबकि उत्तर प्रदेश में चुनाव होने जा रहा है। अयोध्या के अखाड़ों में इस पर घोर निराशा व्याप्त है। यह अलग बात है कि केंद्र के मंत्रियों के आने पर भीड़ उमड़ पड़ती है। आइए, अयोध्या के लोगों का दर्द जानते हैं।
राम मंदिर आंदोलन की अगुआई करने वाले महंत परमहंस के विश्वासपात्र व कट्टर अनुयायी गुड्डू मिश्रा का कहना है कि समस्या यह है कि लोग व नेता अपनी लाइन अपने नेता से लेते हैं। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी की जुबान से कभी राम मंदिर का नाम नहीं। ‘‘इस पर गहन क्षोभ है। यह हमें भी मालूम है कि मंदिर निर्माण अब सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार ही होगा, लेकिन पार्टी की इस मुद्दे के प्रति ऐसी उदासीनता ऐतिहासिक है। मंदिर के शिरोधार्य नेताओं को किनारे किया जा चुका है। मुद्दा अब विकास है तो भी मंदिर निर्माण का वादा क्या था?’’ मिश्रा ने कहा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री कुछ धर्मस्थलों में जा चुके हैं, लेकिन यहां नहीं आए हैं।

राम विवाह के लिए आए संजय श्रीवास्तव ने कहा,‘‘भाजपा इस मुद्दे को अपनी प्राथमिकता से नीचे सरका कर अपनी स्वार्थपरक राजनीति का भद्दा प्रदर्शन कर रही है। लाखों लोगों की आस्था को जिस तरह सत्ता हथियाने का हथियार बनाया गया वह शर्मनाक है।’’अयोध्या में लगभग सभी की भावना इससे मिलती-जुलती ही थी। किसी को अब यह विश्वास नहीं कि भाजपा मंदिर निर्माण के लिए गंभीर है। पार्टी घोषणापत्र में तो मंदिर निर्माण का वादा पहले ही प्राथमिकताओं में काफी नीचे सरक चुका है। ‘‘बुरा इस बात का है कि पार्टी चुनाव में तभी बोलेगी जब कुछ पूछा जाएगा। लेकिन अब पार्टी का चेहरा बेनकाब हो चुका है। लोगों को पता है कि इस पार्टी का मकसद महज वोट बटोरना है’’, यह कहना है चरणजीत राय का जो राम विवाह के लिए चार दिन से अयोध्या में डेरा जमाए हैं। अयोध्या के मंदिरों में कतारबद्ध लोगों की बातों का लब्बोलुआब यही है कि भाजपा के लिए अब राम मंदिर निर्माण महज एक चुनावी जुमला है। पार्टी में इस दिशा में कोई गंभीर प्रयास नहीं है और इसका कारण यही है कि केंद्रीय नेतृत्व ही न सिर्फ इस मुद्दे पर मौन है वरन अब यह उसकी प्राथमिकता भी नहीं।

 

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