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जनसत्ता विशेष: रहना नहीं देस बिराना

विकास और आधुनिकता के आवेगी दौर में गरीबी और साधनहीनता किसी महंगी गाड़ी पर खरोंच की तरह है, जिसे देखकर कोई संवेदना नहीं उभरती बल्कि गुस्सा आता है ऐसा करने वालों की जहालत पर। आज जब कोरोना के संक्रमण ने जिंदगी को बचाने की चुनौती पूरी दुनिया में खड़ी कर दी है तो इस चुनौती से उन लोगों ने खुद को बाहर कर लिया, जिनके लिए जिंदगी से बड़ा संकट रोटी का है। उनके लिए इस महामारी से बचाव के लिए पूर्णबंदी जैसे आह्वान का भी कोई मतलब नहीं रहा। उनकी असली चिंता रोजी-रोटी है। शहरों ने उनकी इस चिंता से रातोंरात मुंह फेर लिया तो इन गरीबों ने भी शहर छोड़ने का फैसला कर लिया। गिरमिटिया दौर के बाद देश के हिस्से आई यह एक बड़ी त्रासदी है। दिलचस्प है कि श्रम और उसकी अस्मिता पर साहित्यकारों का तो ध्यान फिर भी गया है, पर मेहनतकशों की दुनिया में झांकने की इच्छाशक्ति सिनेमा जैसे सशक्त माध्यम से जुड़े लोगों में काफी कमजोर रही है। प्रवासी मजदूरों की दुनिया से जुड़े इन्हीं संवेदनात्मक विरोधाभासों पर रविवारी का सामयिक आयोजन।

घर जाने को बेकरार लोग।

आनंद भारती
दृश्य एक : कोरोना ने लाखों प्रवासी मजदूरों को अपने गांव लौटने के लिए बाध्य कर दिया। दिल्ली का आनंद विहार बस अड्डा उसका गवाह बना। सरकार के पूर्णबंदी के आदेश को धता बताकर वे तुरंत-फुरत घर पहुंच जाना चाहते थे। काम-धंधा बंद हो गया, नौकरी से मुक्तिमिल गई। मकान या झुग्गी मालिकों ने उनसे घर खाली करने के लिए कह दिया। जीने का विकल्प ढूंढने की कोशिश में विस्थापित जन-समुदाय मौत से लड़ने के लिए पैदल ही निकल पड़ा। अब चाहे जो भी होना हो पर अपने गांव-घर में ही हो।
दृश्य दो : साठ के दशक में बनी थी एक भोजपुरी फिल्म ‘हमार संसार’। उसमें गांव छोड़कर शहर की ओर जाते परिवार का ट्रेन में फिल्माया गया दृश्य हिलाकर रख देता है। भागती हुई ट्रेन के पीछे गांव-घर, खेत-खलिहान पीछे छूटते जा रहे हैं। किसान का एक बच्चा बार-बार एक ही वाक्य को दोहरा रहा है- ‘ए बाबु, गंउआ छूटल जाता, ए बाबु गंउआ छूटल जाता।’ इस दृश्य में नजीर हुसैन जो पीड़ा रचते हैं, वह कचोट कर रख देती है।

भिखारी की चिंता
दृश्य तीन : भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर ने अपने नाटक ‘बिदेसिया’ में इसी प्रवासी मजदूर की स्थिति और उसकी पत्नी के दर्द को उड़ेल कर रख दिया है। एक नौजवान अपनी लंबी बेरोजगारी और बदतर आर्थिक हालात से मुक्ति पाने के लिए चुपचाप कलकत्ता चला जाता है। वह अनागत सुख की कल्पना में डूब जाता है। कलकत्ता में वह एक दूसरी लड़की के मोह-जाल में फंस जाता है जबकि गांव में पत्नी अपने पति के आने के इंतजार में सूख रही है। उसकी पत्नी पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ता है। वह अपने पति के वियोग में रात-दिन रोती-कलपती और विलाप करती रहती है। उसे देखकर दर्शकों की आंखें फफक पड़ती हैं। उसका पति एक दिन लौटता तो जरूर है लेकिन सब कुछ लुट-लुटाकर।

क्षणभंगुर लेखन
इन तीनों हृदय-विदारक दृश्यों से जो एक ‘चैलेंज’ निकलता है, उसे आलोचक कर्मेंदु शिशिर के इन शब्दों में महसूस कर सकते हैं, जो उन्होंने ‘परिकथा’ में कहा है, ‘गांवों से शहरों की ओर पलायन को लेकर सृजनात्मकता की बहुत गुंजाइश है। आधुनिक कथाकारों को इस पर बहुत सजग और गंभीर होना चाहिए।’
प्रसिद्ध कथाकार रामधारी सिंह दिवाकर इसे विस्तार देते हुए कहते हैं, ‘खेद है कि हिंदी का कथाकार, कथाकारों की नई पीढ़ी बिल्कुल अनभिज्ञ है इससे। सोशल मीडिया पर भी कुछ नहीं। फैशन का युग है, फेसबुकिया लेखक भी घनेरों हैं, लेकिन उनके क्षणभंगुर लेखन में किसान-मजदूर नहीं हैं।’

प्रेम कथा तक सीमित
यह बात हैरान करने वाली है कि प्रवासी मजदूरों के जीवन का हाहाकार लोगों को परेशान क्यों नहीं करता है? राजनीति के लिए तो वे मजदूर बस इस्तेमाल की चीज हैं लेकिन सिनेमा को क्या हो गया? ऐसा तो नहीं कि फिल्मकार शायद जन-सरोकार या अपने सामाजिक दायित्व को समझने में असमर्थ हो गए हैं या ग्लैमर को बेचते-बेचते इस हाल में पहुंच गए हैं कि उन्हें गांव, किसान, मजदूर, पलायन, विस्थापन जैसी थीम दिखाई ही नहीं दे रही है। उन्हें सिर्फ बिजनेस याद रह गया है और या फिर उनका दिमाग ‘लव स्टोरी’ तक सीमित हो गया है। हालांकि ऐसा भी नहीं है।
चुनौती भी सौंदर्य भी
इधर, बड़ी संख्या में ‘आॅफ बीट’ फिल्में बन रही हैं और अपने व्यवसाय का झंडा ऊंचा करती हुई स्टारडम-परंपरा को भी बाहर धकेल रही हैं। इन फिल्मों में रचनात्मकता के सौंदर्य को भी बचाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन ऐसे फिल्मकारों का ध्यान विस्थापित और पलायन करने वाले लोगों पर नहीं जा रहा है।

फिल्मकार इतिहास से दुरुह पात्रों को निकालकर उन पर अपने एंगल से फिल्में भी बना रहे हैं, इससे किसी को एतराज भी नहीं है। बजट भी करोड़ों में चला जाता है। लेकिन जो हमारे आसपास मजदूरों का दर्द छितराया हुआ है, उसे अनदेखा किया जा रहा है। अगर खोजने जाएं तो कहानियों की कतार खड़ी हो जाएगी मगर मुश्किल है कि उन्हें विश्वास नहीं है कि उन प्रवासियों का दर्द भी बिक सकता है।

फिल्मकारों की भूल
ऐसी थीम की जब भी चर्चा होती है तो एक ही जवाब मिलता है कि यह तो भोजपुरी फिल्मों जैसी कहानी है। यह भी कि ऐसी फिल्मों को वितरक ही नहीं मिलेंगे। यह एक तरह की खुद की मानसिक गुलामी है और फिल्मकार भूल जाते हैं कि गुलामों का कोई इतिहास नहीं होता है। इतिहास बनता है स्वतंत्र चेतना से। यही चेतना थी कि ‘दो बीघा जमीन’, ‘काबुलीवाला’, ‘सगीना महतो’, ‘नमक हराम’, ‘काला पत्थर’, ‘गमन’ आदि के साथ ‘जागते रहो’ जैसी कुछ फिल्में बनीं, जो कामगारों या नौकरी की तलाश में भटकते मजदूरों के मुद्दे उठाती हैं।

विस्थापन और सिनेमा
अगर संपूर्णता में देखा जाए तो ‘दो बीघा जमीन’ के अलावा ऐसी कोई फिल्म अब तक नहीं बनी है, जो पलायन और विस्थापन की तकलीफ को सामने ला सके। इस मामले में बांग्ला फिल्म उद्योग ज्यादा संवेदनशील रहा है। ‘दो बीघा जमीन’, ‘काबुलीवाला’, ‘सगीना महतो’ पहले बांग्ला में ही बनी थी। बांग्ला की एक और फिल्म ‘पथेर पांचाली’ ने पलायन के दर्द को आंसुओं के साथ उकेरा था। महानगरों को बसाने, छोटे शहरों को रूप देने, कारखानों, उद्योगों और बिल्डिंगों को अपने पसीने के बल पर खड़ा करने वाले ये प्रवासी मजदूर आज भी हाशिए पर ही दिखाई दे रहे हैं। उनके दुख-दर्द, उनका संघर्षरत चेहरा और अपने घरों से हजारों किलोमीटर दूर रहने की उनकी पीड़ा फिल्मकारों को पीड़ित नहीं करती है।

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