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जानें-समझें: चिटफंड का धंधा, जाल काटने में कहां कोताही

चिटफंड एक्ट-1982 के मुताबिक चिटफंड स्कीम का मतलब होता है कि कोई शख्स या लोगों का समूह एक साथ समझौता करे। चिटफंड एक्ट 1982 के सेक्शन 61 के तहत चिट रजिस्ट्रार की नियुक्ति सरकार के द्वारा की जाती है। चिटफंड के मामलों में...

Author February 12, 2019 6:03 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

कोलकाता पुलिस के आयुक्त से सीबीआइ की पूछताछ की कवायद में चिटफंड घोटालों का मसला उभर आया है। पश्चिम बंगाल और ओडीशा में लाखों लोगों को लूटने की आरोपी चिट फंड कंपनियों-सारदा और रोज वैली का मुद्दा इन दिनों गरमाया हुआ है। ऐसी योजनाएं चलाने वालों पर अंकुश लगाने के लिए जांच एवं प्रवर्तन एजंसियों के अलावा सरकारी तंत्तर में स्वायत्त संस्थाएं केंद्रीय रिजर्व बैंक और सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड (सेबी) जैसी संस्थाएं भी हैं। फिर भी, लोगों की मेहनत की कमाई हजम करने वाली योजनाओं का बाजार मंदा नहीं पड़ा है। लोगों से सैकड़ों-हजारों करोड़ उगाहने के बाद जब धन की वापसी का समय आता है तब ऐसी कंपनियां अपनी दुकान बंद कर देती हैं। भारत में चिटफंड कंपनियों के जाल फैलाने का इतिहास 120 साल से भी ज्यादा पुराना है। आखिर इन पर पूरी तरह अंकुश लगाने में किस स्तर पर खामी रह जाती है? हाल में केंद्र सरकार ने चिटफंड कानून में कुछ संशोधन के प्रारूप को अंतिम रूप दिया है।

सरकार की ताजा कवायद क्या है: केंद्र सरकार ने ‘द बैनिंग ऑफ अनरेगुलेटेड डिपॉजिट स्कीम बिल, 2018’ में आधिकारिक संशोधनों के प्रारूप को अंतिम रूप दे दिया है। ‘द बैनिंग ऑफ अनरेगुलेटेड डिपॉजिट स्कीम बिल, 2018’ के कानून का रूप लेने के बाद जो भी जमा योजनाएं इस कानून के तहत पंजीकृत नहीं होंगी, वे अवैध हो जाएंगी। ऐसी कंपनियों के मालिक, एजंट और ब्रांड एंबेसडर के खिलाफ कार्रवाई होगी। उनकी संपत्ति बेचकर गरीबों की पूंजी वापस कराई जाएगी। इसके तहत अनियमित जमा राशि से संबंधित गतिविधियों पर पूर्ण रोक लग सकेगी। इसके साथ ही अनियमित जमा राशि लेने वाली योजना को बढ़ावा देने अथवा उनके संचालन के लिए सजा का प्रावधान होगा। संसद की वित्त मामलों की स्थायी समिति ने इस विधेयक के प्रावधानों के संबंध में अपनी रिपोर्ट दी थी। समिति की सिफारिशों के आधार पर ही सरकार ने संबंधित धाराओं में आधिकारिक संशोधन करने का फैसला किया। सरकार ने यह विधेयक 18 जुलाई, 2018 को संसद पेश किया था। इसके बाद इसे संसदीय समिति के पास भेज दिया गया था। संसदीय समिति ने तीन जनवरी, 2019 को ही रिपोर्ट दी थी। आम बजट 2016-17 में अवैध ढंग से जमा कराने की योजनाओं पर अंकुश लगाने के लिए केंद्रीय कानून बनाने की घोषणा की गई थी।

चिटफंड आखिर है क्या: चिटफंड एक्ट-1982 के मुताबिक चिटफंड स्कीम का मतलब होता है कि कोई शख्स या लोगों का समूह एक साथ समझौता करे। चिटफंड एक्ट 1982 के सेक्शन 61 के तहत चिट रजिस्ट्रार की नियुक्ति सरकार के द्वारा की जाती है। चिटफंड के मामलों में कार्रवाई और न्याय निर्धारण का अधिकार रजिस्ट्रार और राज्य सरकार का ही होता है। चिटफंड कंपनियां गैरबैंकिंग कंपनियों की श्रेणी में आती हैं। ऐसी कंपनियों को किसी खास योजना के तहत खास अवधि के लिए रिजर्व बैंक और सेबी की ओर से आम लोगों से मियादी (फिक्स्ड डिपाजिट) और रोजाना जमा (डेली डिपाजिट) जैसी योजनाओं के लिए धन उगाहने की अनुमति मिली होती है। जिन योजनाओं को दिखा कर अनुमति ली जाती है, वह तो ठीक होती हैं। लेकिन इजाजत मिलने के बाद ऐसी कंपनियां अपनी मूल योजना से इतर विभिन्न लुभावनी योजनाएं बना कर लोगों से धन उगाहना शुरू कर देती हैं।

कितना सघन है जाल: ओड़ीशा, पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा के पूर्वी गलियारे में पिछले एक दशक में दर्जनों की संख्या में कुकुरमुत्ते की तरह घोटालेबाज पैदा हुए और लोगों के करोड़ों डकार गए। रिजर्व बैंक के मुताबिक, अकेले बंगाल में दो सौ से ज्यादा छोटी-बड़ी चिटफंड कंपनियां सक्रिय हैं। सीबीआइ और प्रवर्तन निदेशालय का मानना है कि आठ साल के दौरान बंगाल में सारदा समेत कुल 194 संदिग्ध कंपनियों ने करोड़ों लोगों के 60,000 करोड़ रुपए से अधिक डकार लिए। घोटालों का बुलबुला फूटना शुरू हुआ तो पता चला कि रकम 60 हजार करोड़ से 10 गुना ज्यादा तक हो सकती है। चिटफंड कंपनियां दूरदराज के इलाकों में फैले हजारों एजेंटों के नेटवर्क के जरिए धन उगाहती हैं। इसके लिए खास कर मेहनतकश तबके को निशाना बनाया जाता है।
एजंटों को अच्छा-खासा कमीशन मिलता है। निवेशकों को ऐसे सब्जबाग दिखाए जाते हैं कि उन्हें लगता है मानो उनके दोनों हाथों में लड्डू हैं। ऐसी कंपनियां निवेश की रकम का 25 से 40 फीसदी तक एजेंट को कमीशन के तौर पर देती है।

आरबीआइ और सेबी की भूमिका: रिजर्व बैंक अधिनियम (आरबीआइ एक्ट 1934) की धारा 45-1 ए के मुताबिक कोई भी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी बिना आरबीआइ के पंजीकरण प्रमाण-पत्र के अपने कारोबार की शुरुआत नहीं कर सकती है। इसके लिए उस कंपनी के पास दो करोड़ रुपए की राशि का होना जरूरी है। हालांकि कुछ कंपनियां जैसे वेंचर कैपिटल फंड, मर्चेंट बैंकिंग कंपनी, स्टॉक ब्रोकिंग कंपनी आरबीआइ के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। लेकिन उन्हें भी सेबी (सिक्यूरिटीज एंड स्टॉक एक्सचेंज बोर्ड आॅफ इंडिया) से अनुमति लेना जरूरी है। गैर बैंकिंग कंपनी या चिटफंड कंपनी को आरबीआइ एक्ट के मुताबिक पंजीकरण के लिए कंपनी एक्ट 1956 की धारा के अंतर्गत भी पंजीकृत कराना होगा। सरकार ने चिटफंड के बारे में कुछ गाइडलाइन दे रखी है। सेबी ने चेतावनी जारी कर रखा है कि वह न किसी स्कीम या शेयर में निवेश की सलाह देता है और न ही किसी स्कीम लेने की सिफारिश करता है। आरबीआइ और बीमा नियमन एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) भी निवेशकों के लिए चेतावनी जारी करते रहे हैं। सेबी ने डेढ़ साल में 47 कंपनियों पर धोखाधड़ी के मामले चलाए हैं। भारत की दो बड़ी पोंजी योजनाओं सहारा और सारदा ने 66,895 करोड़ रुपयों का घोटाला किया है। इस कड़ी में सबसे नया नाम है पर्ल्स एग्रोटेक कारपोरेशन, जिसने 49,100 करोड़ रुपयों का चूना लगाया है। सेबी ने पिछले वित्त वर्ष में 224.6 करोड़ वसूले।

क्या कहते हैं जानकार
चिटफंड कंपनियां लोगों के जल्दी अमीर बनने के सपने की नींव पर अपना साम्राज्य खड़ा करती हैं। बढ़ती बेरोजगारी भी उनको पांव पसारने का सुनहरा मौका देती है।
– प्रोफेसर अजिताभ रॉयचौधरी, अर्थशास्त्री

ऐसी कंपनियों पर लगाम लगाने के लिए कानून और सख्त होना चाहिए और इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकारों को दे दी जानी चाहिए।
-दीपंकर दासगुप्ता, अर्थशास्त्री और भारतीय सांख्यिकी संस्थान के पूर्व प्रमुख

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