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राजपाट: शह और मात

पहली बार 2011 में ममता ने केंद्र को पश्चिम बंग नाम ही भेजा था। पर यूपीए सरकार ने खारिज तो कर ही दिया, वजह भी नहीं बताई। उसके बाद 2016 में फिर कवायद बेकार गई। तब ममता ने हिंदी, अंग्रेजी और बांग्ला तीनों भाषाओं के हिसाब से तीन अलग नाम सुझाए थे। जाहिर है कि उस सूरत में तो भ्रम ही फैलता। जो भी हो इस बार केंद्र ने अपनी तरफ से पश्चिम बंग सुझा कर बांग्लादेश जैसा हो जाने के आधार पर प्रस्ताव खारिज किया तो ममता ने उसे ही बना लिया सियासी मुद्दा।

Author November 17, 2018 7:44 AM
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (पीटीआई फाइल फोटो)

शेक्सपियर अंग्रेजी साहित्य के पर्याय सरीखे माने जाते हैं। उन्होंने कहा था कि नाम में कुछ नहीं रखा। लेकिन पश्चिम बंगाल में नाम के चक्कर में ही घमासान है। सात साल पहले सत्ता में आई थीं ममता बनर्जी। तब से तीन बार कोशिश कर चुकी हैं सूबे का नाम बदलने की। लेकिन हर बार केंद्र की सरकार कोई न कोई पेच फंसा देती हैं। पश्चिम बंगाल की जगह ममता को बांग्ला नाम भा रहा है। पर केंद्र उनके प्रस्ताव को लौटा कर सुझाव दे चुका है कि पश्चिम बंग चलेगा, बांग्ला नहीं। पड़ोसी बांग्लादेश से मिलता-जुलता नाम केंद्र सरकार को अखरता है। लेकिन ममता इस एतराज को ही केंद्र की भाजपा सरकार के अपने सूबे के साथ सौतेले बर्ताव के रूप में देख रही हैं। हैरानी की बात यह है कि पहली बार 2011 में ममता ने केंद्र को पश्चिम बंग नाम ही भेजा था। पर यूपीए सरकार ने खारिज तो कर ही दिया, वजह भी नहीं बताई।

उसके बाद 2016 में फिर कवायद बेकार गई। तब ममता ने हिंदी, अंग्रेजी और बांग्ला तीनों भाषाओं के हिसाब से तीन अलग नाम सुझाए थे। जाहिर है कि उस सूरत में तो भ्रम ही फैलता। जो भी हो इस बार केंद्र ने अपनी तरफ से पश्चिम बंग सुझा कर बांग्लादेश जैसा हो जाने के आधार पर प्रस्ताव खारिज किया तो ममता ने उसे ही बना लिया सियासी मुद्दा। खुलकर आरोप लगा रही हैं कि भाजपा न केवल ऐतिहासिक स्थलों और संस्थानों के नाम अपनी मर्जी से बदल रही है बल्कि शहरों के नाम भी उसने बेदर्दी से बदल दिए। फिर बंगाल के मामले में ही अलग रवैया क्यों? केंद्र की पड़ोसी बांग्लादेश के बहाने की गई आपत्ति पर ममता ने सवाल दाग दिया है कि पंजाब भी तो भारत और पाकिस्तान दोनों में है।

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