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नृत्य समारोह: एक शाम नर्तकों के नाम

भगवान शिव के जीवन से जुड़े विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से नवरस की यह परिकल्पना एक नई दृष्टि और सृजनशीलता लिए हुई थी। इसमें नायक की बात की गई थी, इसलिए एक नयापन भी था। अनंत नवरस नृत्य रचना में भगवान शिव को बतौर नायक निरूपित किया गया। सो देवी मीनाक्षी से उनके विवाह के प्रसंग से नृत्य आरंभ हुआ।

तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

कथक केंद्र के विवेकानंद सभागार में अनंत नवरस नृत्य रचना पेश की गई। इस पेशकश की खासियत थी कि इसे नर्तकों ने पेश किया। इस नृत्य रचना की परिकल्पना संस्कृति कर्मी उषा आरके ने की थी। इस प्रस्तुति में नर्तक परिमल, पवित्र भट्ट, पार्श्वनाथ, मिथुन श्याम, हिमांशु श्रीवास्तव और सुहैल भान ने शिरकत की। भगवान शिव के जीवन से जुड़े विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से नवरस की यह परिकल्पना एक नई दृष्टि और सृजनशीलता लिए हुई थी। इसमें नायक की बात की गई थी, इसलिए एक नयापन भी था। अनंत नवरस नृत्य रचना में भगवान शिव को बतौर नायक निरूपित किया गया। सो देवी मीनाक्षी से उनके विवाह के प्रसंग से नृत्य आरंभ हुआ। शृंगार रस से भींनी इस नृत्य को मीनाक्षी कल्याणम नाम दिया गया था। नर्तक पवित्र भट्ट ने मोहक अंदाज में शिव के मनोभावों को मुखाभिनय और आंगिक अभिनय के जरिए निरूपित किया।

भरतनाट्यम नृत्य शैली में प्रस्तुत नृत्य रचना के अगले अंश में हास्य और वीभत्स रस को दर्शाया गया। इसे नर्तक पार्श्वनाथ ने ज्ञान फलम के जरिए पेश किया। अपने मूषक वाहन को लेकर पार्वर्ती पुत्र गणपति के भाव को इस अंश में दर्शाया गया। नर्तक ने गणपति की दशा देखकर, विनोदित शिव के भावों को सुंदर तरीके से दर्शाया। मूषक की गति को बहुत मनोरम तरीके से चित्रित किया। नर्तक पार्श्वनाथ ने गंगावतरण के माध्यम से नायक शिव के वीरत्व को अगली प्रस्तुति में पेश किया। वीर रस प्रधान यह प्रस्तुति मनोरम थी।

भरतनाट्यम नर्तक सुहैल भान ने भय के भाव को दर्शाया। इसके लिए उन्होंने शिव और भस्मासुर प्रसंग का चयन किया था। रचना तपचारीसिदा भस्मासुर राग भूपालम और आदि ताल में निबद्ध थी। उन्होंने तप में लीन भस्मासुर और वरदान देते शिप के भावों को अपनी प्रस्तुति में समाहित किया। वरदान पाते ही भस्मासुर भगवान शिव को ही भस्म करने के लिए उनके पीछे भागता है। इस दृश्य को नर्तक सुहैल ने काफी विस्तार से पेश किया। वहीं नर्तक हिमांशु श्रीवास्तव ने अद्भुत रस को अपने नृत्य में प्रदर्शित किया। कैलाश पर्वत पर नायक शिव अपने भक्त रावण को वीणा वादन सिखाते हैं। रावण अपने शरीर के अंग से रूद्र वीणा का निर्माण करता है, जिसके संगीत को सुनकर, भगवान शिव प्रसन्न हो जाते हैं। हिमांशु की यह प्रस्तुति प्रभावकारी थी।
भक्त नंदी की भक्ति से खुश होकर, करुण रस में डूबे शिव के भावों को नर्तक परिमल ने नृत्य में पिरोया। नंदी प्रतिदिन अपने ईष्ट के दर्शन के लिए मंदिर के सामने बैठ जाता था।

इस प्रसंग को परिमल ने बड़े महीन ताने-बाने से अपने नृत्य में पेश किया। जबकि वीभत्स और रौद्र रस को नर्तक मिथुन ने नृत्य में ढाला। उन्होंने सती प्रसंग और मारकंडेय प्रसंग के माध्यम से दर्शाया। रचना नमस्ते विश्वेश्वराय त्रिपुरांतकाय और महामृत्युंजय मंत्र के प्रयोग ने नृत्य को पराकाष्ठा प्रदान की। साथ ही, यमराज के चारी भेद और शिव के रौद्र रूप का विवेचन नर्तक मिथुन ने बहुत सुुंदर अंदाज में किया।
इस प्रस्तुति की संगीत परिकल्पना कार्तिक हेब्बार ने की थी जबकि, संगतकारों में शामिल थे-गायक सतीश वेंकटेश्वरन, मृदंगम वादक चंद्रशेखर और बांसुरीवादक रजत प्रसन्ना। अक्ष्या ने नटुवंगम पर संगत की।

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